कांग्रेस की राह और मुश्किल, कैसे लगेेगी यूपी-पंजाब की नैया पार
केरल, तमिलनाडु, प.बंगाल और असम में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के लिए आने वाला समय कड़ी परीक्षा लेने वाला है। देखना दिलचस्प होगा कि वह पंजाब-यूपी में कैसे अपनी नैया पार लगा सकेगी।
नई दिल्ली (कमल कान्त वर्मा)। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से कांग्रेस केवल अपना पुडुचेरी का ही घर बचाने में सफल होती दिखाई दे रही है। इसके अलावा केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम मेंं उसको हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस के लिए यह खतरे की घंटी हैै। ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होना है। इसको लेकर कांग्रेस काफी जद्दोजहद कर रही है। लेकिन अब उसको इससे भी कहीं ज्यादा कोशिश करनी होगी। फिलहाल तो वह अपने ही अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद में लगी हुई है, उसमें भी वह कामयाब होती दिखाई नहीं देे रही है।
केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडुु और असम में हार से पहले वह देश का दिल कहे जानेे वाली दिल्ली का अपना गढ़ बुरी तरह से हारी थी। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में वह किनारे से ही अपने घर को बचा पाने मेंं सफल हाेे सकी थी। वहीं उत्तराखंड का हाल सभी को अच्छे से पता है। कुल मिलाकर कांग्रेस की यह लगातार नवीं बड़ी हार है। इसमें कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार भी शामिल है। कांग्रेस के लिए हर हार ही मंथन का कारण बनती है, लेकिन आज तक हुए इतने मंथन के बाद भी वह अपनी हार का सही कारण तलाशने में नाकाम साबित हुई है।
केरल में भी सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस, जानें- क्या हैं कारण
जरा याद करें वर्ष 2004 का लोकसभा चुनाव जिसमें कांग्रेस के गठबंधन वाले यूपीए ने जीत दर्ज कर केंद्र में सरकार बनाई थी। उस वक्त कांग्रेस का चेहरा सोनिया गांधी थीं। लेकिन यूपीए 2 के बाद कांग्रेस के अंदर परिवर्तन आया और राहुल गांधी की सक्रिय राजनीति में एंट्री हुई। आंकड़ों पर यदि नजर डाली जाए तो यहां से ही कांग्रेस का बुरा दौर भी शुरू हो गया। राहुल गांधी के चेहरे के साथ कांग्रेस दिल्ली में पूरी तरह से खत्म हो गई। इसके बाद लोकसभा चुनाव में उसकी करारी हार हुई। इतना ही नहीं इसी दौरान महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा में भी उसको हार का सामना करना पड़ा। इससे भी पहले केंद्र में कांग्रेस के रहने के बावजूद वह पंजाब में हार गई।
नाकाम साबित हुआ हाथ-हथौड़ा को साथ लाने का प्रयोग
कांग्रेस के लिए अभी आने वाले दिन और भी सख्त परीक्षा लेने वाले हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले चुनाव इसकी एक अगली कड़ी के तौर पर उसके सामने आने वाले हैं। हालांकि इसके लिए उसने तैयारी शुरू कर दी है, बावजूद इसके उसकी राहें आसान नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1989 कांग्रेस वनवास झेल रही है। 1998 में उसने यहां की राजनीतिक जमीन को पूरी तरह से खो दिया था। इसके बाद वह यहां पर वह दहाई का अंक भी बामुश्किल पा सकी है। ऐसे में मौजूदा समय में मिली चार राज्यों की हार उसके लिए उसकी बर्बादी का कारण बन सकती है। हालांकि उत्तर प्रदेश कांग्रेस को भी यह पता है कि उत्तर प्रदेश में उसकी दोबारा एंट्री लगभग नामुमकिन है। इस लिहाज से उसके लिए पंजाब में अपना अस्तित्व बचाए रखना ज्यादा बड़ी प्राथमिकता होगी।
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