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    केरल में भी सत्‍ता से बाहर हुई कांग्रेस, जानें- क्‍या हैं कारण

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Thu, 19 May 2016 05:25 PM (IST)

    बड़ी-बड़ी जीत का दावा करने वाली कांग्रेस केरल में भी अपनी सरकार को नहीं बचा सकी। इसके पीछे कई कारण रहे जिनकी वजह से कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा।

    नई दिल्ली (जेएनएन)। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस एक बार फिर पस्त हो गई है। हालांकि अभी पुडुचेरी में कुछ उम्मीद अभी बाकी है, लेकिन यह सच है कि कांग्रेस के वनवास केे वनवास की अवधि अभी खत्म नहीं हुुई है। यदि केरल की बात की जाए तो यहां पर उसकी यूडीएफ के साथ गठबंधन सरकार थी, जिसे जनता ने नकार दिया हैै। यहां पर एलडीएफ को जनता ने सत्ता पर बिठाकर साफ कर दिया है कि उसेे कांग्रेस नहीं चाहिए। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही जादू कहा जाएगा कि यहां पर भी भाजपा के लिए अब द्वार खुल गए हैं। यहां भाजपा ने भी अपना खाता खोल लिया है।

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    कांग्रेस-यूडीएफ की हार के बाद दोनों दलों के नेताओं के बीच इस हार को लेकर मंथन होना स्वभाविक है। लेकिन यहां पर कुछ चीजेंं बेहद स्पष्ट हैं जिनकी वजह इस गठबंधन की हार हुई। इनमें सबसे बड़ी वजह यहां पर हुआ जाॅब स्कैम था। इसके अलावा सोलर स्कैम से भी पार्टी अपना दामन दागदार होने से नहीं बचा सकी। घोटालों का दौर यहां तक ही नहीं रुका। इन सभी के बीच केरल के मुख्यमंत्री पर लगे निजी आरोपों का भी असर इस चुनाव पर पड़ा है। मौजूदा विधानसभा चुनाव मेंं इस गठबंधन के विरोधियों ने कांग्रेस के केंद्र में रहते हुए सामने अाए बड़े घोटालों को भी इसमें भुनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहींं छोड़ी।

    नाकाम साबित हुआ हाथ-हथौड़ा को साथ लाने का प्रयोग

    केरल मे कांग्रेस के केवल यही एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने राज्य के मुखिया के तौर पर अपना समय पूरा किया है। इससे पहले आर शंकर, के करुणाकरण और एके एंटनी को बीच में ही हटना पड़ा था। वर्ष 2011 में कांग्रेस एडीएफ गठबंधन को 140 विधानसभा सीटों मेंं से 72 सीटें मिली थी। ओमान चांडी दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। पहली बार वह अगस्त 2004 से मई 2004 तक और दूसरी बार मई 2011 से लेकर 2016 तक राज्य के सीएम पद पर रहे। इसके अलावा वह राज्य में विपक्ष के नेता भी रहे।

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