Reels और Shorts की लत, कहीं आपके बच्चे का दिमाग भी तो नहीं कर रहा हैक? पहचानें ये 5 खतरे की घंटियां
आजकल बच्चों से लेकर बड़ों तक का ज्यादातर समय सोशल मीडिया पर बीतता है। इसका असर बच्चों के अटेंशन स्पैन पर भी पड़ता है, जिसके कारण वे किसी भी काम पर फोक ...और पढ़ें
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क्या आपका बच्चा भी दिनभर सोशल मीडिया स्क्रॉल करता है? (Picture Courtesy: Freepik)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के डिजिटल युग में, बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन होना एक आम बात हो गई है। एंटरटेनमेंट हो या पढ़ाई अब हर काम के लिए बच्चे फोन पर ही निर्भर होते हैं। हालांकि, अब बच्चों का ज्यादातर समय सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हुए बीतता है। 15-30 सेकंड के रील्स और शॉट्स ने बच्चों को ‘इंस्टेंट डोपामाइन’ की आदत लगा दी है।
सोशल मीडिया के ओवर एक्सपोजर का असर बच्चों के अटेंशन स्पैन यानी फोकस करने की क्षमता पर नजर आ रहा है। अगर आपके बच्चे में भी ये 5 लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो इन्हें खतरे की घंटी समझें और बच्चों की सोशल मीडिया का टाइम कम करने पर ध्यान दें। आइए जानें इन लक्षणों के बारे में।
तुरंत डिस्ट्रैक्ट हो जाना
सोशल मीडिया पर कंटेंट इतनी तेजी से बदलता है कि बच्चों का दिमाग हर कुछ सेकंड में नई चीज खोजने लगता है। अगर आपका बच्चा होमवर्क करते समय या आपसे बात करते समय हर दो मिनट में फोन चेक करता है या खिड़की के बाहर देखने लगता है, तो समझ लीजिए कि उसका दिमाग अब लंबे समय तक एक चीज पर टिकने की क्षमता खो रहा है।
काम को बाद के लिए टालना
अटेंशन स्पैन कम होने का एक बड़ा लक्षण है 'टालमटोल'। जब बच्चों को किसी ऐसे काम का सामना करना पड़ता है जिसमें मानसिक मेहनत लगती है, जैसे- मैथ्स के सवाल हल करना, तो उनका दिमाग उस तनाव से बचने के लिए सोशल मीडिया की ओर भागता है। वे अक्सर कहते हैं, ‘बस 5 मिनट और देख लूं, फिर करता हूं।’ यह 5 मिनट घंटों में बदल जाता है।
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(Picture Courtesy: Freepik)
काम पर फोकस न कर पाना
रील्स और शॉर्ट्स के युग में बच्चों का धैर्य खत्म होता जा रहा है। अगर किसी काम का रिजल्ट उन्हें 60 सेकंड के भीतर नहीं मिलता, तो वे ऊबने लगते हैं। चाहे वह कोई कहानी सुनना हो, बोर्ड गेम खेलना हो या कोई छोटा-सा प्रोजेक्ट पूरा करना हो, अगर वे एक मिनट से ज्यादा उस पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं, तो यह डिजिटल ओवर-एक्सपोजर का सीधा असर है।
लिखने-पढ़ने में परेशानी
डीप रीडिंग के लिए स्थिरता की जरूरत होती है। सोशल मीडिया के आदी बच्चे अक्सर लंबे पैराग्राफ पढ़ने के बजाय सिर्फ 'स्कैन' करने लगते हैं। उन्हें शब्दों को समझने और वाक्यों को समझने में परेशानी होती है। लिखने के दौरान भी उनका ध्यान बार-बार भटकता है, जिससे उनकी लिखावट और व्याकरण से जुड़ी गलतियां बढ़ने लगती हैं।
समय का ध्यान न रहना
क्या आपका बच्चा फोन हाथ में लेते ही दुनिया को भूल जाता है? इसे 'टाइम ब्लाइंडनेस' कहते हैं। सोशल मीडिया एल्गोरिदम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि कंज्यूमर को समय बीतने का अहसास ही न हो। अगर बच्चा खाना खाने, सोने या खेलने का समय भूलकर घंटों स्क्रीन से चिपका रहता है, तो यह उसके मानसिक विकास के लिए चिंताजनक है।
इससे बचने के लिए क्या करें?
इस समस्या का समाधान पूरी तरह से तकनीक पर प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि 'डिजिटल डिसिप्लिन' सिखाना है-
- नो-स्क्रीन जोन- खाना खाते समय और सोने से एक घंटा पहले फोन पूरी तरह से बंद करें।
- हॉबी विकसित करें- पेंटिंग, रीडिंग या खेल-कूद जैसी एक्टिविटीज को बढ़ावा दें जिनमें लंबे समय तक ध्यान लगाने की जरूरत होती है।

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