रोहतक/ उन्नाव, [अरुण शर्मा/अशोक तिवारी]। यह फर्श से अर्श पर पहुंचने, निराशा के अंधकार से निकलकर उजियारा फैलाने की कहानी है। वास्‍तव में यह असली कर्मयोगी की विकास यात्रा है। गरीब पिता किसी तरह दो वक्‍त की रोटी का जुगाड़ करने के साथ बच्‍चों को पढ़ा-लिखा रहे थे। ऐसे में वह दसवीं कक्षा में फेल हाे गया तो नाराज पिता ने डांटा। इस पर घर से भाग गए और उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव के अपने गांव से हरियाणा के रोहतक एक जानकार के यहां आ गए। यहां खूब मुसीबतें झेलीं, कई रातें भूखे रहे, लेकिन इरादा कुछ खास करने का था। नतीजा यह कि आज उनका तीन देशों में कारोबार है। सबसे बड़ी बात- कामयाबी के बाद भी संस्‍कार नहीं भूले। बुजुर्ग पिता की बात उनके लिए पत्‍थर की लकीर है।

राेहतक के नामी नट बोल्‍ट उद्ममी राज सिंह पटेल ने कामयाबी की नई कहानी लिखी, लेकिन संस्‍कार नहीं भूले

हम बात कर रहे हैं रो‍हतक के नट-बोल्‍ट कारोबारी राज सिंह पटेल की। उत्‍तर प्रदेश के उन्नाव के एक गांव के रहने वाले राज सिंह पटेल की कहानी बेहद अनोखी है और हौसले व जज्‍बे की उड़ान वाली है। उनका संघर्ष और कामयाबी किसी फिल्मी सरीखी है। उनकी कहानी बताती है कि किसी क्लास में फेल होने पर बेहतर भविष्य की राहें बंद नहीं हो जातीं। नई चुनौती यहीं से शुरू होती है। जो खुद को साबित करता है वह सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचता है।

उन्नाव के राज सिंह पटेल की कंपनी का सालाना पांच करोड़ का टर्नओवर

रोहतक में संघर्ष के दौरान नट-बोल्ट की एक कंपनी में खराद की मशीन पर काम किया। बाद में 75 हजार रुपये का कर्जा लेकर खुद की मशीनों से जॉब वर्क शुरू किया। अपनी कंपनी तक खड़ी की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। कभी पाई-पाई को मोहताज रहे राज सिंह अपनी कहानी सुनाते हुए भावुक हो गए।

राज सिंह के पिता सुंदरलाल किसान हैं। पिता के लिए पांच भाई और एक बहन की परवरिश करना मुश्किल था। 1986 की उस घटना को जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बताते हुए राज सिंह ने कहा कि दसवीं का परिणाम उम्मीद के विपरीत आया। डांट पड़ी तो आठ-दस दिन खाना तक नहीं खाया।

घर से भागकर एक जानकार के पास रोहतक पहुंचे और खराद की मशीन पर काम करने लगे। कई बार ऐसे भी मौके आए जब भूखे पेट सोना पड़ा। नौ वर्ष ऐसे ही बीत गए, लेकिन वह हमेशा सोचते रहे कुछ अपना करना है।  कुछ अलग करने है। 1995 में आइडिया आया कि खुद का काम शुरू किया जाए। जिस नट-बोल्ट फैक्टरी में कार्य करते थे वहीं किराये पर मशीनें लेकर जॉब वर्क का कार्य शुरू किया। खुद काम करते। पत्‍नी आशा पटेल पार्ट गिनने, पैकिंग करने व दूसरे कार्यों में सहयोग करतीं। जिंदगी की गाड़ी दौडऩे लगी।

18 लाख की मशीन साढ़े तीन लाख में बना डाली

सन 1999 में खुद की मशीनें लगाने की ठानी, इसलिए सस्ती मशीनों की तलाश में ताइवान चले गए। 2003 में अन्य मशीनें लगाकर कार्य शुरू किया। 2007 से अमेरिका से मशीनें लाए। 2011 में फिर से ताइवान गए। उस दौरान 18 लाख की मशीन खरीदी। वह मशीन कैसे बनाई जा रही थी, इसकी वीडियो क्लिप बनाकर लाए। बाद में साढ़े तीन लाख रुपये खर्च करके खुद ही एक आटोमेटिक मशीन तैयार कर दी जो अधिकांश कार्य निपटा देती है। मार्केट में उस मशीन की कीमत कई गुना तक थी। राज सिंह कहते हैं कि सरकार यदि मदद मिले तो वह नट-बोल्ट की सस्ती और आटोमेटिक मशीनें तैयार कर सकते हैं।

 

सुबह छह बजे से रात 11 बजे तक ड्यूटी करते

पुराने दिनों की यादें ताजा होते ही राज सिंह की आंखे नम हो जाती हैं। उन्होंने कहा है कि उन्नाव से रोहतक पहुंचने पर हिसार रोड स्थित एक फैक्ट्री में जानकार के साथ खराद की मशीन पर काम करने लगे। दो साल तक संघर्ष चलता रहा। कई बार ऐसे भी मौके आए जब भूखे पेट सोना पड़ा। 1988 में एक फैक्ट्री में नौकरी मिली।

वह बताते हैं कि सुबह छह बजे से रात 10-11 बजे तक ड्यूटी करते। 1995 में आइडिया आया कि खुद का काम शुरू किया जाए। जिस नट-बोल्ट फैक्ट्री में कार्य करते थे वहीं किराए पर मशीनें लेकर कार्य शुरू किया। राज सिंह दिन-रात मेहनत करते। पत्नी आशा पटेल पार्ट गिनने, पैकिंग करने व दूसरे कार्यों में सहयोग करतीं।

सस्ती मशीनें देश में बनें तभी उद्योग पकड़ेगा रफ्तार

राज सिंह कहते हैं कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ताइवान और चीन में नट-बोल्ट की मशीनें तैयार होती हैं। सरकार को सुझाव दिया है कि यदि मदद मिले तो वह नट-बोल्ट की सस्ती और ऑटोमैटिक मशीनें तैयार कर सकते हैं। इनका कहना है कि मशीनें देश में न बनने के कारण नए उद्योग लगाने में लोग दिलचस्पी नहीं लेते।

कहा- चीन की मशीनरी सबसे खराब

देश में उद्यमियों को सस्ती और बेहतर मशीनें तैयार करने के लिए भी प्रेरित किया है। राज सिंह का दावा है कि चीन की मशीनें सबसे खराब होती हैं, लेकिन सस्ते के फेर में कई बार उद्यमी वहां से मशीनें लाने के लिए मजबूर होते हैं। इन्होंने सुझाव दिया है कि बड़ी, मध्यम और छोटी मशीनें तैयार हों तो गांव स्तर पर उद्योग खड़े होंगे।

भावुक पिता बोले- बेटे ने वो कर दिखाया जो यहां आज तक किसी ने नहीं किया

उधर, उन्नाव के गांव शिवपुर (अचलगंज) में उनके  88 साल के बुजुर्ग पिता सुंदरलाल पटेल के चेहरे की चमक बन चुकी है। वह  34 साल पुरानी घटना को भावुक होकर बताते हैं। सुंदरलाल कहते हैं, मेरे हिस्से में इतनी जमीन नहीं थी कि अपने पांच बेटे, एक बेटी समेत आठ लोगों का परिवार पाल सकता। इसी कारण खेती के साथ लकडिय़ां काटकर बेचा करता था। बच्चों को पढ़ाने की भरसक कोशिश कर रहा था, लेकिन राज का मन पढाई में नहीं लगता था। दसवीं में फेल होने पर मैंन डांटा तो घर से भाग गया। काफी समय बाद मालूम चला कि वह हरियाणा में नौकरी कर रहा है। लेकिन, आज उसने वो कर दिखाया, जो हमारे यहां कोई न कर सका। घर छोड़कर भी उसने संस्कार नहीं छोड़े। शादी भी हमारी मर्जी से यहीं आकर की।

गांव के 12 युवकों को लाए रोहतक, जमा लिया रोहतक में कारोबार

छह भाई-बहनों में चौथे नंबर के राज के सबसे बड़े भाई जय सिंह बताते हैं, कारोबार जमाने के बाद वह गांव के 12 युवकों को साथ ले गया। काम सिखाया। इन्हीं में शिव बाबू, विकास बाबू व राजू रोहतक में ही अपना कारोबार जमा चुके हैं। जब भी मौका मिलता है राज घर आते-जाते रहते हैं। सबकी मदद भी करते हैं।

राज ने चमियानी स्थित कुल देवता के मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया है। मां भी कुछ दिन पहले ही राज के पास रहकर गांव लौटी हैं। राज के तीन भाई गांव में ही खेती करते हैं। एक भाई को साथ ले गए। आज वह भी मुंबई में नट-बोल्ट का कारोबार कर रहे हैं। गांव के राम समुझ, अनिल पटेल, शाकिर अली अपने दोस्त राज को युवाओं का प्रेरणा स्रोत बताते हैं।

 

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