नई दिल्‍ली [स्‍पेशल डेस्‍क]। कर्नाटक में एक बार फिर भाजपा ने जीत हासिल कर ये साबित कर दिया है कि देश में अब भी मोदी लहर बरकरार है। वहीं कर्नाटक के चुनाव परिणाम ने यह भी साबित हो गया है कि फिलहाल देश या राज्‍य की जनता कांग्रेस पर विश्‍वास नहीं कर रही है। यहां पर कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले काफी नुकसान उठाना पड़ा है वहीं भाजपा को पहले से फायदा हुआ है। दरअसल, इस हार या जीत के पीछे वह रणनीति है जो किसी की सफल हुई तो किसी की विफल रही। आपको बता दें कि कर्नाटक के चुनाव में भाजपा पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी थी।

चुनाव की रणनीति

वहीं कांग्रेस न सिर्फ अपनी रणनीति बनाने में विफल रही बल्कि जिस मजबूती और तैयारी के साथ उसको मैदान में उतरना चाहिए था वह भी नदारद थी। इसके अलावा चुनाव पूर्व गठबंधन का राग अलापना विपक्ष और खुद कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसकी वजह ये है कि इन सब से इस बात का बोध हो रहा है कि कांग्रेस और विपक्ष भाजपा का सामना करने के लिए कहीं से भी तैयार नहीं है। इसके अलावा कांग्रेस अपने रुख में बदलाव को भी तैयार नहीं है। यही वजह है कि पिछले दिनों जब पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बेनर्जी ने भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की ओर कदम बढ़ाया तो उन्‍होंने कांग्रेस को कम तवज्‍जो दी थी।

योगी आदित्‍यनाथ की अहम भूमिका

इस चुनाव में यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की भी अहम भूमिका रही। दरअसल, कर्नाटक में नाथ संप्रदाय का भी एक बड़ा तबका है और खुद यूपी के सीएम नाथ संप्रदाय के प्रमुख हैं। उन्‍होंने यहां पर जितनी रैलियां की उसका बड़ा फायदा भाजपा को मिला है। इस चुनाव प्रचार में योगी आदित्‍यनाथ ने करीब 33 विधानसभा सीटों पर प्रचार किया था, इन सभी पर पार्टी को फायदा हुआ है।

किसको कितने मिले वोट

यहां भाजपा को 104, कांग्रेस को 78, जदएस को 38 और को दो सीटें मिली हैं। इस चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत तो बढ़ा लेकिन इसके बावजूद यह सीटों में तब्‍दील नहीं हो सका। यहां कांग्रेस को 38 फीसद मत मिले। वहीं इस मामले में भाजपा दूसरे नंबर पर रही और उसको करीब 362 फीसद मत मिले। इसके अलावा जनता दल सेक्‍युलर को 183 फीसद और अन्‍यों को करीब 53 फीसद वोट मिले।

भाजपा के खाते में एक और राज्य

कर्नाटक की जीत के साथ ही अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा के खाते में एक और राज्य जुड़ गया है। अध्यक्ष बनने के बाद चार साल से भी कम समय में अमित शाह भाजपा को 14 राज्यों में सत्ता दिला चुके हैं और अब कर्नाटक भी उनमें शामिल होने जा रहा है। शाह के राजनीतिक नेतृत्व का ही कमाल है कि भाजपा आज देश के तीन चौथाई से अधिक भूभाग पर सत्ता में है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक की जीत का श्रेय राष्ट्रीय अध्यक्ष, उनकी टीम की रणनीति, मेहनत को दिया है। कर्नाटक की जीत सिर्फ चुनाव की घोषणा के बाद किए गए प्रचार-प्रसार का नतीजा नहीं है, बल्कि इसका श्रेय अमित शाह की पांच महीने की मेहनत और लंबी रणनीति को जाता है।

57,135 किलोमीटर की यात्रा

गुजरात चुनाव के तत्काल बाद ही वे कर्नाटक की रणनीति में जुट गए थे। यहां उनकी भागीदारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिसंबर से चुनाव प्रचार खत्म होने यानी 10 मई तक वे कर्नाटक में 57,135 किलोमीटर की यात्रा कर चुके थे। इस दौरान कुल 34 दिनों तक कर्नाटक में गुजारने वाले शाह ने 30 में से 29 जिलों में प्रवास किया। कुल 59 जनसभाएं और 25 रोडशो भी किए। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का पत्ता साफ कर दक्षिण में भाजपा को ताकतवर बनाने वाले अमित शाह की टीम के कई प्रमुख नेताओं ने अलगअलग मोर्चों पर कमान संभाली थी। इनमें शाह टीम के प्रमुख नेता प्रकाश जावड़ेकर, पीयूष गोयल और भूपेंद्र यादव कर्नाटक में ही जमे हुए थे। चुनाव के दौरान ये नेता वहीं के हो गये थे।

कर्नाटक के रण में भाजपा की जीत के खास कारण :-

मोदी मैजिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार में उतरने से पहले भाजपा की हालत पतली थी। मोदी ने ताबड़तोड़ 21 रैलियां करके हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया। 12.

सोशल इंजीनियरिंग

भाजपा लिंगायत समुदाय,आदिवासियों, दलितों के साथ ही ओबीसी को जोड़ने में भी सफल रही। जहां मोदी ने प्रचार के दौरान दलित और आदिवासियों का मुद्दा उठाया, वहीं भाजपा ने उप्र केमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जरियेहिंदुत्व कार्ड खेला।

एकजुटता

येद्दयुरप्पा और श्रीरामुलू की वापसी फायदेमंद रही। 2013 के चुनाव में भाजपा से अलग हो गए येद्दयुरप्पा की पार्टी ने 10 और श्रीरामुलू की पार्टी ने तीन फीसद वोट काटे थे। दोनों की वापसी से पार्टी का वोट शेयर बढ़ गया।

रेड्डी बंधुओं पर दांव

अवैध खनन में आरोपित जनार्दन रेड्डी पर दांव लगाना सफल रहा। रेड्डी बंधु के परिजनों और उनके करीबियों को भाजपा ने टिकट दिए। रेड्डी बंधु को बेल्लारी के निकट की सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी। दांव सफल रहा।

लिंगायत का भरोसा कायम

16 फीसद वोट वाले लिंगायत के मजबूत गढ़ माने जाने वाले सेंट्रल कर्नाटक में भाजपा के लिए परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे।

कर्नाटक के रण में कांग्रेस की हार के कुछ खास कारण :-

सत्ता विरोधी भावना

कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के नेतृत्व में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा और इंदिरा कैंटीन जैसे कार्ड के बावजूद मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। भाजपा ने राज्य में भ्रष्टाचार और केंद्र की योजनाओं लागू न करने जैसे मुद्दों पर राज्य सरकार को घेरने में सफल रही।

मोदी का जवाब नहीं

मोदी अकेले ही राहुल गांधी से लेकर सिद्दरमैया तक से जुबानी जंग में लोहा लेते रहे। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन मोदी की काट वह नहीं निकाल सके।

बसपा और एनसीपी से दूरी

कांग्रेस को भाजपा विरोधी मतों के एनसीपी और जेडीएस में बंटने का भी नुकसान हुआ। बसपा व एनसीपी 2019 के लोस चुनावों के लिए गैर भाजपा, गैर कांग्रेसी थर्ड फ्रंट बनाने में जुटी हैं।

गुटबाजी

चुनाव में मुख्यमंत्री सिद्दरमैया को खुली छूट मिलने से कई नेता खफा थे। टिकट बंटवारे में भी सिद्दरमैया की ही चली।

लिंगायत कार्ड

कांग्रेस ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का कार्ड चला था। 76 सीटों पर दखल रखने वाले लिंगायतों को लुभाने की यह कोशिश भारी पड़ी। मोदी व अमित शाह लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि यह कदम हिंदू धर्म को बांटने वाला है।

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By Kamal Verma