बैंग्लुरु। कर्नाटक चुनाव नतीजों के रुझान कांग्रेस की दलित राजनीति पर गहरी चोट कर रहे हैं। यहां की 23 दलित बाहुल्य सीटों पर भाजपा आगे चल रही है, जबकि कांग्रेस 20 सीटों पर आगे चल रही है। ये सब कुछ ऐसे वक्त में हो रहा है, जब कांग्रेस की ओर से भाजपा पर एंटी दलित होने का आरोप लगाया गया है। कर्नाटक में दलितों के वोटबैंक को साधने के लिए मैदान में जेडीएस और उसकी सहयोगी पार्टी बसपा थी। इसके बावजूद दलितों ने अपना विश्वास भाजपा में दिखाया है।

कर्नाटक चुनाव में दलितों का भाजपा को वोट दिखाता है कि वो अब वह कांग्रेस की पुरानी दलित राजनीति से किनारा कर रहे हैं। दलितों के इस बदले मूड को शायद कांग्रेस पहले भाप गई थी, इसी वजह से सिद्दारमैया की ओर से दलित के लिए सीएम की कुर्सी छोड़ने की बात कही गई थी। इस तरह से वो जेडीएस को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि उनकी ये कोशिश मौजूदा परिदृश्य में बेकार चली गई। क्योंकि भाजपा को किसी के बहुमत जरुरत नहीं पड़ेगी। मामले में सदानंद गौड़ा ने भी स्पष्ट किया कि उनकी ओर से जेडीएस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं किया जाएगा। 

उलटा पड़ा कांग्रेस का दांव

कर्नाटक की ही यदि बात करें तो चुनाव से कुछ पहले ही यहां पर कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय को विशेष दर्जा देने का ऐलान किया था। कांग्रेस का मानना था कि इससे उसे चुनाव में बढ़त मिलेगी। लेकिन उसका यह दांव भी उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने उन जगहों पर बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है, जहां पर लिंगायत का दबदबा था। वहीं भाजपा ने इन जगहों पर बेहतद प्रदर्शन किया है। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस के उस दांव को खारिज कर दिया है जिसमें उसने समाज को बांटने की राजनीतिक चाल चली थी।

कर्नाटक के परिणाम भाजपा के लिए मिशन 2019 का रास्ता साफ करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यहां से आने वाले परिणाम कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। आपको बता दें कि कांग्रेस ने वर्ष 2014 के बाद से महज दो राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब हुई है। इनमें एक पंजाब और दूसरी पुडुचेरी है।
 

 

Posted By: Kamal Verma