नई दिल्‍ली स्‍पेशल डेस्‍क। कर्नाटक चुनाव के परिणामों ने कांग्रेस के भविष्‍य के लिए चिंता बढ़ा दी है। धीरे-धीरे कांग्रेस महज तीन राज्‍यों में सिमट कर रह गई है। ऐसे में यदि ये कहा जाए कि एक तरफ जहां पीएम नरेंद्र मोदी पार्टी को जिताते जा रहे हैं वहीं राहुल गांधी पार्टी को राज्यों में हराते जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि कहीं वह राष्‍ट्रीय पार्टी होने का तमगा भी न खो दे। आपको बता दें कि कांग्रेस बार-बार खुद को देश को आजाद कराने वाली पार्टी बताती आई है। लगभग हर रैली में कांग्रेस की तरफ से यह बात दोहराई जाती रही है कि उनकी पार्टी और नेताओं ने खून पसीना बहाकर देश को आजाद करवाया है। लेकिन अब इस पार्टी पर संकट के बादल छाए हुए हैं।

राहुल का फिर नहीं चला जादू

अभी ज्‍यादा लंबा समय नहीं गुजरा है जब सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी थी और पार्टी का राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष भी बनाया था। इसके बाद उन्‍होंने पार्टी के अंदर कई बड़े बदलाव भी किए और युवाओं को आगे आने की अपील भी की थी। उनका कहना था कि वह रैली में सबसे पीछे खड़े अपने कार्यकर्ताओं को आगे लाने की कवायद कर रहे हैं। लेकिन इतना सब होने और कहने पर भी वह जनता पर अपना जादू चलाने में पूरी तरह से विफल रहे हैं। गुजरात चुनाव में पार्टी ने पूरी ताकत झौंक दी थी, इसके बाद भी वहां पर पार्टी को सफलता हाथ नहीं लगी। इसके बाद उत्तर-पूर्व से भी पार्टी के हाथों एक राज्‍य निकल गया। हालांकि यहां पर मिजोरम में पार्टी सरकार बनाने में जरूर सफल हुई थी। लेकिन पार्टी के लिए उत्तर-पूर्व का आना या जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। ऐसा खुद पार्टी के नेताओं की तरफ से कहा गया था।

इन्‍होंने की वापसी

वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद यदि देश की राजनीतिक स्थिति पर गौर किया जाए तो दिल्‍ली और पश्चिम बंगाल में आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है। इसके अलावा कांग्रेस की ही यदि बात की जाए तो उसने पंजाब और पुडुचेरी में अपनी सरकार बनाई। हालांकि पंजाब में कांग्रेस ने उलटफेर करते हुए भाजपा के हाथों से पंजाब को छीना था।

कांग्रेस की चिंता

कर्नाटक ने कांग्रेस की चिंता को इसलिए भी बढ़ा दिया है क्‍योंकि इसी वर्ष राजस्‍थान समेत छत्तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश में चुनाव होने हैं। इसके अलावा इसी वर्ष के अंत या अगले वर्ष के शुरुआत में मिजोरम में भी चुनाव होने हैं। वहीं पार्टी के सामने 2019 में लोकसभा चुनाव खड़ा है। कनार्टक की ही यदि बात करें तो यहां पर पार्टी ने जिन्‍हें अपना सीएम प्रत्‍याशी बनाया था वहीं सिद्धारमैया चामुंडेश्‍वरी से हार चुके हैं। यह हार न सिर्फ सिद्धारमैया के लिए काफी बड़ी है बल्कि कांग्रेस के लिए भी काफी बड़ी है।

दक्षिण का द्वार

चुनाव से पहले यह माना जा रहा था कि क्‍योंकि सिद्धारमैया जमीन से जुड़े नेता हैं और एक लोकप्रिय नेता हैं लिहाजा भाजपा को उन्‍हें हराने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। हालांकि यदि कुछ पन्‍ने पलटे जाएं तो इस बात का अहसास हो जाता है कि सिद्धारमैया को पार्टी और अपनी हार का कहीं न कहीं एहसास हो गया था इसलिए ही उन्‍होंने दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ना तय किया था। शायद यही वजह थी कि उन्‍होंने इस बार ये भी ऐलान कर दिया था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। कर्नाटक के रूप में दूसरी बार दक्षिण में भाजपा के लिए द्वार खुल गया है। राजनीतिक जानकार इस बात से इंकार नहीं करते हैं कि इसका असर आने वाले चुनावों पर जरूर पड़ेगा।

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Posted By: Kamal Verma