विचार: ट्रंप की हार से अच्छे दिनों की आस
अमेरिका में बदले राजनीतिक हालात के कारण निवेशकों को भारत में बढ़ी दिलचस्पी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दीवाली के उपहार जैसी है।
HighLights
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की पार्टी को मिली हार।
भारतीय शेयर बाजार में उछाल, तेल की कीमतों में कमी।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में सुधार की नई संभावनाएं।
संजय गुप्त। शेयर बाजार में पिछले दिनों आया उछाल भारतीय निवेशकों के लिए दीपावली के उपहार की तरह है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन की हार से तेल के दाम कम हुए। इसका लाभ भारत को मिलेगा। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में एआइ कंपनियों के तेजी से बनते डाटा सेंटर एक मुद्दा बन गए थे, क्योंकि उनमें बिजली और पानी की अधिक खपत होती है। इसका अमेरिकी नागरिक विरोध कर रहे थे। उनकी चिंताओं को डेमोक्रेटिक पार्टी ने भुनाया। डेमोक्रेट का संसद के दोनों सदनों में नियंत्रण होने के बाद माना जा रहा है कि एआइ कंपनियों के डाटा सेंटरों के लिए नियम सख्त होंगे। इससे अमेरिका में एआइ कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई।
इसके नतीजे में अन्य देशों के भी शेयर बाजार गिरे, लेकिन भारत में ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि निवेशकों को यह संदेश गया कि जोखिम वाले एआइ शेयरों से पैसा निकालकर उसे भारत में लगाना एक सुरक्षित विकल्प है, क्योंकि अमेरिका, ताइवान आदि की कंपनियां चिप्स, सर्वर और डाटा सेंटर पर अरबों डालर का जो पूंजीगत खर्च कर रही हैं, उसके रिटर्न पर सवाल उठने लगे हैं। इसके उलट भारतीय आइटी एवं सर्विस सेक्टर का माडल ऐसा है कि उसका डाटा सेंटर या चिप निर्माण से जुड़े जोखिमों से वास्ता नहीं। इसी कारण अन्य देशों के शेयर बाजारों जैसा भारतीय शेयर बाजार में नहीं हुआ। अमेरिका में बदले राजनीतिक हालात के कारण निवेशकों की भारत को लेकर बढ़ी दिलचस्पी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छी खबर है। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि यह खबर सुख-समृद्धि के त्योहार दीपावली के पहले आई।
पिछले कुछ समय में भारत में मध्य वर्ग की संख्या तेजी से बढ़ी है। इस वर्ग का एक हिस्स शेयर बाजार में म्यूचुअल फंडों के जरिये निवेश करता है। शेयर बाजार में लंबे समय से छाई अनिश्चितता से इन निवेशकों की नींद उड़ी हुई थी। इस अनिश्चितता का एक प्रमुख कारण ट्रंप की नीतियां थीं। उनकी ओर से ईरान के खिलाफ जो युद्ध छेड़ा गया, उसके चलते पश्चिम एशिया से ऊर्जा का निर्यात करने वाला होर्मुज समुद्री मार्ग बाधित हो गया। इससे पेट्रोल, डीजल, गैस आदि के दाम बढ़े और इसका बुरा असर विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ा। इसके अलावा ईरान पर लगाम लगाने के लिए ट्रंप ने उसके साथ-साथ उससे व्यापार करने वाले देशों पर जो प्रतिबंध लगाए, उनके कारण भी आर्थिक समस्याएं बढ़ीं।
मध्यावधि चुनाव में ट्रंप को लगे झटके से विश्व में अस्थिरता कम होने की जो उम्मीद बढ़ी, उसका भी भारत के शेयर बाजार पर सकारात्मक असर पड़ा। इसके अलावा ट्रंप को लगे झटके से अमेरिका और भारत के रिश्ते सामान्य होने की जो संभावना बढ़ी, उसने भी भारतीय कारोबार जगत को उत्साहित किया। ट्रंप व्यापार समझौते को लेकर अड़ियल रवैया अपनाए हुए थे, पर भारत उनके दबाव का प्रतिकार करता रहा। चूंकि डेमोक्रेट ट्रंप की टैरिफ नीति के विरोधी हैं और भारत का महत्व समझते हैं, इसलिए वे ट्रंप पर दबाव बना सकते हैं कि अटके पड़े व्यापार समझौते को शीघ्र अंतिम रूप दें। यदि ऐसा हो जाता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को और बल मिलेगा।
वैसे अभी यह स्पष्ट नहीं कि मध्यावधि चुनावों में हार के बाद ट्रंप का रवैया बदलेगा, क्योंकि वह मनमानी करने के लिए जाने जाते हैं। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के फेर में ऐसे कदम उठाए, जिनका उलटा असर हुआ। ट्रंप ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि उनकी मनमानी टैरिफ नीति से उनके ही कमजोर और मध्य वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जहां मित्र देशों पर भी मनमाना टैरिफ थोपने से अमेरिका में आवश्यक वस्तुओं के मूल्य बढ़े, वहीं ईरान के खिलाफ मोर्चा खोलने से पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ गए। ट्रंप ने एक तरह से अमेरिका के साथ अन्य देशों में भी महंगाई बढ़ाने का काम किया। प्रवासियों के खिलाफ सख्ती बरतने की ट्रंप की नीति ने भी तमाम अमेरिकियों को नाराज किया। ट्रंप प्रशासन वैध रूप से अमेरिका आए दूसरे देशों के लोगों को जिस तरह तंग करता रहा, उससे ट्रंप के वे कट्टर समर्थक तो खुश हुए, जो यह मान रहे कि ऐसी ही नीतियां अमेरिका को फिर से महान बनाएंगी, लेकिन अमेरिकी समाज का एक हिस्सा उनके खिलाफ हो गया, क्योंकि वह यह जानता है कि अमेरिका की उन्नति में प्रवासियों का बड़ा योगदान है।
इन प्रवासियों में भारतीय प्रमुख हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने उनके प्रति भी बैर भाव दिखाया। इसके चलते वे भारतीय भी उनके खिलाफ हो गए, जिन्होंने दो साल पहले उनका समर्थन किया था। हालांकि कई लोग मान रहे हैं कि अब ट्रंप नरम पड़ेंगे, लेकिन उनके व्यक्तित्व को देखते हुए इसमें संदेह है कि वह अपना रवैया सुधारेंगे। अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को असीमित अधिकार देता है। ट्रंप संकेत दे रहे हैं कि वे अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करेंगे। वे वीटो पावर के सहारे इसलिए मनमानी जारी रख सकते हैं, क्योंकि उस पर लगाम तब लग सकती थी, जब डेमोक्रेटिक पार्टी को संसद में दो तिहाई बहुमत मिल जाता। चूंकि ऐसा नहीं हुआ, इसलिए ट्रंप अपने शेष दो वर्ष के कार्यकाल में विश्व की मुसीबतें और बढ़ा सकते हैं।
ट्रंप ईरान के साथ टकराव वाले हालात और अधिक समय तक बनाए रखने की स्थिति में नहीं, क्योंकि उनके वे सहयोगी इस हालात से बेचैन हैं, जिन्हें अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता है। इनमें उप राष्ट्रपति जेडी वेंस भी हैं। उन्होंने मध्यावधि चुनाव में हार के लिए ईरान युद्ध को जिम्मेदार माना। ट्रंप ने उनकी राय खारिज तो नहीं की, लेकिन अपनी ईरान नीति का बचाव किया। अमेरिका के लोकतांत्रिक इतिहास में ट्रंप ऐसे राष्ट्रपति के रूप में सामने आए, जिन्होंने अमेरिकी हितों से अधिक निजी वित्तीय हितों को आगे रखा। वे अपने लिए शांति का नोबेल पुरस्कार तो चाहते रहे, लेकिन विश्व को अस्थिर करते रहे। चूंकि यह समय ही बताएगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी का दबाव और रिपब्लिकन नेताओं की अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता ट्रंप को सही राह पर ला पाती है या नहीं, इसलिए भारत को सतर्क रहना होगा।





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