जागरण संपादकीय: बेलगाम हुआ प्रदूषण
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण और ट्रैफिक जाम पर चिंता जताई है, जिसका मुख्य कारण वाहनों का धुआं और सड़कों पर अतिक्रमण है।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण पर अधिकारियों की शिथिलता पर सवाल उठाए।
वाहन धुआं, ट्रैफिक जाम, अतिक्रमण प्रदूषण के प्रमुख कारण।
उत्तर भारत के शहरों में जहरीली हवा से लोग जूझ रहे।
आशा की जानी चाहिए कि दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के अन्य शहरों की प्रदूषण रोधी एजेंसियों के साथ स्थानीय निकाय और साथ ही पुलिस सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को गंभीरता से लेगी कि प्रदूषण का प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में भारी ट्रैफिक जाम पर यह जो प्रश्न किया कि आखिर प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, उसका अधिकारियों के पास शायद ही कोई ठोस उत्तर हो, क्योंकि तमाम उपायों के बाद भी उत्तर भारत में वायु प्रदूषण ने गंभीर रूप ले लिया है।
यह एक त्रासदी ही है कि जब लोग सबसे बड़ा उत्सव मनाने जा रहे हैं, तब वे विषाक्त हवा से जूझ रहे हैं। दीवाली पर जब गरीबों को रोजी-रोटी कमाने का अतिरिक्त अवसर मिलता है, तब उन्हें जाम के कारण ऐसा करने में परेशानी उठाने के साथ घातक किस्म के प्रदूषण का भी सामना करना पड़ रहा है।
इसका सामना अन्य लोग भी कर रहे हैं। जो स्थिति दिल्ली-एनसीआर में है, वही शेष उत्तर भारत में भी। अब तो उत्तर भारत के छोटे शहर भी प्रदूषण से त्रस्त रहने लगे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि एक तो प्रदूषण रोधी सभी उपायों पर एक साथ काम नहीं किया जाता और दूसरे, तभी चेता जाता है, जब हवा विषैली हो जाती है।
वाहनों का धुआं, पराली दहन, कूड़ा-कर्कट जलना, सड़कों और निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल की रोकथाम न करना प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।
समझना कठिन है कि ट्रैफिक जाम जैसे प्रदूषण के बड़े कारणों को दूर करने में भी शिथिलता क्यों दिखाई जा रही है? अनेक अध्ययन यह बता चुके हैं कि वायु प्रदूषण में वाहनों के उत्सर्जन की एक बड़ी भूमिका है। जब वाहन धीमी गति से चलते हैं, तो वे कहीं घातक किस्म का उत्सर्जन करते हैं।
समस्या यह है कि उत्तर भारत का करीब-करीब हर शहर ट्रैफिक जाम से त्रस्त है। ट्रैफिक जाम का बड़ा कारण सड़कों पर अतिक्रमण है। सड़कों पर फुटपाथ या तो हैं नहीं और यदि हैं तो वे दुकानों में तब्दील हो चुके हैं।
चूंकि इन दुकानों के सामने वाहन खड़े रहते हैं, इसलिए सड़कें और संकरी हो जाती हैं। इसके चलते वाहन रेंगने को बाध्य होते हैं और वे कहीं अधिक विषाक्त धुआं छोड़ते हैं। चूंकि इसकी कोई परवाह नहीं करता कि सड़कों पर अतिक्रमण न हो, फुटपाथों पर कब्जा न हो और आटो, रिक्शा, बस आदि जहां-तहां अपना स्टापेज न बना लें, इसलिए सड़कों पर अराजकता ही दिखाई देती है।
यह त्योहारों पर और अधिक बढ़ जाती है। बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि कोई पाबंदी काम नहीं आएगी और हम जितने ज्यादा आदेश जारी करेंगे, उनके उल्लंघन के मामले उतने ही बढ़ेंगे।


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