अवधेश कुमार। हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा कि अपनी नकारात्मक राजनीति के चलते कांग्रेस अगले 30 वर्षों तक केंद्र की सत्ता में वापस नहीं आ सकती। उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस की आलोचना की, लेकिन उनका कोई शब्द अमर्यादित या अपमानजनक नहीं था। दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पटना के एक कार्यक्रम में अपने एक कार्यकर्ता के टोकने पर गुस्से में कहा, 'मोदी का बाप भी जाएगा...।' प्रसंग यह था कि जब उन्होंने कहा कि मोदी जेल जाएंगे तो उक्त कार्यकर्ता ने टिप्पणी की कि मोदी तब तक कहीं नहीं जाने वाले, जब तक उनके खिलाफ बगावत नहीं होगी। खरगे जैसे वरिष्ठ नेता की भाषा से पार्टी के राजनीतिक सोच पर सवाल उठते हैं। दुख की बात यह रही कि कांग्रेस के किसी नेता ने इस बयान पर खेद नहीं जताया, बल्कि उसके बचाव में तर्क दिए।

संसदीय लोकतंत्र में नेता अपने राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करते हैं, उन पर हमला बोलते हैं और अभियान चलाते हैं, लेकिन शब्दों की मर्यादा नहीं लांघते और न ही उनके परिवार तक जाते हैं। किसी भी दल को चुनाव जीतने के लिए संगठन मजबूत करने और जनता का विश्वास जीतने की जरूरत होती है। इसके लिए जनहित के मुद्दे उठाने, सकारात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करने और नेतृत्व की ऐसी छवि बनाने की आवश्यकता होती है, जिससे मतदाताओं को लगे कि उसके नेतृत्व में देश अधिक सुरक्षित रहेगा। कांग्रेस की रणनीति इससे अलग दिखाई देती है।

चुनावों में हार-जीत होती रहती है। जनसंघ की स्थापना से लेकर सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा को अपनी विचारधारा और कार्यशैली के आधार पर लंबा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन चुनावी हार के बाद उसने सत्तापक्ष के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने या चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा पर हमला करने का अभियान नहीं चलाया, लेकिन राहुल और उनके साथी जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह पहले कभी नहीं देखी गई। कांग्रेस की समस्या यह है कि उसने 2014 से अब तक अपनी चुनावी हार का ईमानदारी से विश्लेषण नहीं किया। विश्लेषण से संगठन, नीति, नेतृत्व, रणनीति और वक्तव्यों की कमजोरियां सामने आतीं और उन्हें दूर करने की कोशिश हो सकती थी। कांग्रेस के अनुभवी और विवेकशील नेता राहुल और उनके करीबियों द्वारा किनारे कर दिए गए हैं या वे स्वयं हाशिए पर पहुंच गए हैं। आज राहुल के रणनीतिकार और सलाहकार वामपंथी, समाजवादी, एनजीओ और इस्लामवादी विचारधारा से जुड़े देश-विदेश के लोग हैं।

हाल में दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे के घर हुई माक संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाए गए जन महाभियोग में राहुल के साथ योगेंद्र यादव, नेहा बोरा भी दिखाई दिए। जनता से संवाद पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन माक पार्लियामेंट जैसे आयोजन तो वामपंथी तथा एनजीओ की कार्यशैली का हिस्सा रहे हैं। एक समय दुनिया भर में कम्युनिस्ट नेता सरकारों और संपन्न वर्ग के खिलाफ लोगों में असंतोष पैदा कर हिंसा और उथल-पुथल के जरिये सत्ता हासिल करने की कोशिश करते थे। राहुल गांधी संसदीय राजनीति करते हुए वैसी ही स्थिति पैदा करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। वे कभी 'चौकीदार चोर है' का नारा लगवाते हैं तो कभी ईवीएम, एसआइआर और वोट चोरी का मुद्दा भाषा की मर्यादा की अनदेखी कर उठाते हैं।

वे और उनके सहयोगी इन मुद्दों को जिस रूप में पेश करते हैं, जमीनी स्तर पर वैसी स्थिति दिखाई नहीं देती। वैचारिक स्पष्टता के अभाव में चुनावी हार से नाराज होकर वे और उनके साथी मर्यादा की सीमा लांघते हैं। लगता है कांग्रेस में मोदी, भाजपा या आरएसएस के विरुद्ध जो जितनी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करेगा, उसे उतना ही अधिक महत्व मिलेगा। स्वयं राहुल ने 2019 के चुनाव से पहले कहा था कि कुछ दिनों में मोदी बाहर निकलेगा तो लोग डंडों से उसकी पिटाई करेंगे। अब वे कह रहे हैं कि मोदी, अमित शाह और ज्ञानेश कुमार को जेल जाना होगा। ऐसे बयानों की लंबी शृंखला है। खरगे प्रधानमंत्री को रावण, जहरीला नाग आदि कह चुके हैं। पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री के पिता का नाम लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी।

निःसंदेह भाजपा से भी गलतियां होती हैं। उम्मीदवारों के चयन, मुद्दों और जातीय समीकरणों के मामले में उससे गलतियां हुई हैं। लोकसभा चुनाव में कई राज्यों में उसे झटका लगा, लेकिन उसने हार का विश्लेषण किया, सुधार किए और कई विधानसभा चुनावों में सफलता हासिल की। दलों में अपनी गलतियों के परिणाम भुगतने के बाद अपनी कमजोरियों का विश्लेषण कर बदलाव करने का साहस होना चाहिए। हार का दोष विरोधियों या संवैधानिक संस्थाओं पर मढ़ने से किसी पार्टी की स्थिति नहीं बदल सकती, लेकिन राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस मध्यमार्ग छोड़कर अति वामपंथ की ओर बढ़ चुकी है। हालांकि भाजपा के मजबूत रहने तक ऐसी स्थिति पैदा करना संभव नहीं होगा, जिसमें राहुल प्रधानमंत्री के विरुद्ध चोर, देशद्रोही जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल कर और चुनाव आयोग एवं अन्य संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ माहौल बनाकर वामपंथी और एनजीओ शैली में लोगों के बीच असंतोष एवं विद्रोह पैदा कर सकें।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)