राजीव सचान। पिछले कई माह से मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में फेरबदल की खबरें आती हैं और फिर सन्नाटा छा जाता है। कहना कठिन है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल कब होगा और होगा भी या नहीं? इन सवालों का जवाब सरकार ही दे सकती है और वह देने से रही, लेकिन अब जब यह सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के तीसरे वर्ष में प्रवेश कर गई है, तब उसे न केवल आगामी आम चुनावों की चिंता करनी चाहिए, बल्कि आसन्न विधानसभा चुनावों की भी।

इसी के साथ उसे अपना शैथिल्य दूर करना चाहिए और अटके पड़े काम करने को भी प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि अगले लोकसभा चुनावों के पहले कम से कम एक दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं और इन चुनावों के नतीजे एक हद तक लोकसभा चुनाव के लिए माहौल बनाएंगे। पता नहीं विधानसभा चुनावों के नतीजे क्या होंगे और वे क्या माहौल बनाएंगे, लेकिन यह स्पष्ट ही है कि बीते कुछ समय से विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है और इसके चलते सत्तापक्ष कभी-कभी रक्षात्मक मुद्रा में भी आ जाता है।

विपक्ष के आक्रामक रवैये की शुरुआत संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन से हो गई थी। मानसून सत्र शुरू होने वाले दिन ही काकरोच जनता पार्टी का शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद मार्च होना था। दिल्ली पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी, फिर भी प्रदर्शनकारियों की भीड़ संसद की ओर जाने को आमादा थी। इसके नतीजे में हिंसा हुई। इसमें प्रदर्शनकारी भी पिटे और पुलिस भी, लेकिन नैरेटिव कुछ ऐसा बना कि पुलिस ने शांति का परिचय दे रही भीड़ पर बेवजह बल प्रयोग किया। इस नैरेटिव के चलते भी धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा। इस त्यागपत्र ने विपक्ष को उत्साहित किया और तबसे उसका उत्साह कायम ही है।

पिछले कुछ समय से मोदी सरकार विपक्ष के वोट चोरी के आरोप का सामना करने में लगी हुई है। विपक्ष मतदाता सूचियों के शुद्धीकरण यानी एसआइआर को वोट चोरी सिद्ध करने के लिए चाहे जो कहे, आमतौर पर आम लोगों के बीच यह भाव नहीं है कि चुनाव आयोग विपक्ष को हराने के लिए जानबूझकर उसके वोट काट रहा है। इस मामले में हर किसी को इंतजार है एसआइआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का, लेकिन इसके आसार कम ही हैं कि विपक्ष और खासकर कांग्रेस उसके फैसले को मानेगी। जो भी हो, मोदी मंत्रिमंडल के संभावित फेरबदल-विस्तार का भी इंतजार है। मंत्रिमंडल में आवश्यक हो चुके फेरबदल-विस्तार में वैसी ही देरी हो रही है, जैसी भाजपा के नए अध्यक्ष के चयन में हुई थी। भले ही मोदी सरकार के समर्थक उसके हर फैसले को मास्टरस्ट्रोक कहते हों, लेकिन वस्तुस्थिति यही नहीं।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार केवल इसलिए आवश्यक नहीं कि सरकार ने अपने इस कार्यकाल में उसमें कोई फेरबदल नहीं किया है। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि कई मंत्री त्यागपत्र दे चुके हैं या उन्हें देना पड़ा है। कुछ मंत्रियों के पास दूसरे मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार है। इनमें शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय भी हैं। कुछ मंत्रालयों का कामकाज सुस्ती का भी शिकार है। माना कि कुछ मंत्रालयों का बहुत महत्व नहीं होता, पर शिक्षा जैसे मंत्रालय को अतिरिक्त प्रभार के सहारे चलाना बिल्कुल भी ठीक नहीं।

शिक्षा मंत्रालय के पास व्यापक दायित्व हैं। इनमें एक दायित्व केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और शिक्षकों के रिक्त पद समय से भरना है। जानना कठिन है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के रिक्त पदों को भरने का काम क्यों अटका रहता है? विडंबना यह है कि कई संस्थान-निकाय भी ऐसे हैं, जिनमें रिक्त पड़े महत्वपूर्ण पदों को भरने में देरी का सवाल उठता रहता है। आखिर कड़े और बड़े फैसले लेने वाली सरकार अहम रिक्त पदों को भी भरने में विलंब क्यों करती है?

यह ठीक नहीं कि 12 बरस बाद भी कई ऐसे काम रुके पड़े हैं, जो अब तक हो जाने चाहिए थे। बतौर उदाहरण पुलिस और प्रशासनिक सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। प्रशासनिक सुधार न होने का एक बड़ा दुष्परिणाम यह है कि मोदी सरकार के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का दावा सही साबित नहीं हुआ। नौकरशाही का भ्रष्टाचार अब भी एक समस्या बना हुआ है और आम लोग उससे त्रस्त हैं। केंद्रीय नौकरशाही के शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम लगने का यह अर्थ नहीं कि मध्यम और निचले स्तर की नौकरशाही का भी भ्रष्टाचार नियंत्रित हो गया है।

केवल पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में ही सुधारों का इंतजार नहीं हो रहा है। न्यायिक सुधारों की भी व्यग्रता से प्रतीक्षा हो रही है, क्योंकि वे भी अटके पड़े हैं। निःसंदेह इसका एक कारण न्यायपालिका का रुख भी है, लेकिन सरकार को न्यायिक तंत्र में सुधार की नए सिरे से पहल तो करनी ही चाहिए। यह सही है कि मोदी सरकार ने 12 वर्ष में कई बड़े काम किए और राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 खत्म करने के भाजपा के दो बड़े एजेंडे पूरे हो गए, लेकिन आखिर क्या कारण है कि तीसरे बड़े एजेंडे यानी समान नागरिक संहिता का निर्माण राज्यवार किया जा रहा है? मोदी सरकार को नई ऊर्जा, नए उत्साह और नए नैरेटिव की जो आवश्यकता है, उसकी पूर्ति प्रतीक्षा सूची में पड़े काम करने से ही संभव है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)