डॉ.सुरजीत सिंह। दिसंबर 2025 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में मान्यता मिलने के बाद भारत के पास दीपावली को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन महोत्सव के रूप में विकसित करने का स्वर्णिम अवसर है।

अयोध्या का दीपोत्सव, वाराणसी की देव दीपावली, जयपुर के रोशनी से जगमगाते बाजार, उदयपुर के प्रकाशित महल और देशभर की विशिष्ट दीपावली परंपराएं पर्यटन के प्रमुख आकर्षण हैं। यदि इन आयोजनों को एक साझा राष्ट्रीय ब्रांड के तहत जोड़कर पांच से सात दिन का अंतरराष्ट्रीय दीपावली महोत्सव आयोजित किए जाएं, तो स्थानीय कलाकारों के साथ उनके बनाए देशी उत्पादों को प्रोत्साहन मिलेगा और उनकी वैश्विक पहचान भी बनेगी।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रकाश कला प्रदर्शनियों, पारंपरिक खानपान, हस्तशिल्प मेलों और फोटोग्राफी के माध्यम से ‘वोकल फार लोकल’ की भावना भी साकार होगी। नवरात्रि और दीपावली के त्योहारी सीजन में खुदरा कारोबार 3.75 लाख करोड़ से 4.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचता है। दीपावली को वैश्विक पहचान मिलने से यह आंकड़ा पांच लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है।

दुनिया के कई देशों ने अपने स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों को वैश्विक ब्रांड बनाकर अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां दी हैं। ब्राजील के पांच से छह दिन चलने वाले रियो कार्निवाल में 15 से 20 लाख घरेलू और विदेशी पर्यटक शामिल होते हैं, जो 10,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करते हैं। जर्मनी के 16 दिवसीय ओक्टोबरफेस्ट से म्यूनिख को करीब 11,000 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष राजस्व मिलता है।

आयरलैंड ने सेंट पैट्रिक दिवस को वैश्विक सांस्कृतिक ब्रांड के रूप में स्थापित किया है। इसी तरह जापान का स्नो फेस्टिवल, थाईलैंड का लैंटर्न फेस्टिवल, स्पेन का ला टोमाटीना और बेल्जियम का टुमारोलैंड अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के प्रमुख आकर्षण बन चुके हैं। भारत विविधताओं और उत्सवों का देश है।

दीपावली, होली, दशहरा, दुर्गा पूजा, मकर संक्रांति, ओणम और कुंभ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक जुड़ाव के प्रतीक हैं। यदि इन क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पर्वों को वैश्विक ब्रांड के रूप में विकसित कर पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए, तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन उद्योग और सूक्ष्म उद्यमों को नई गति मिल सकती है। इससे विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ विदेशी मुद्रा आय और रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी। 

भारत में ‘एक राज्य, एक अंतरराष्ट्रीय महोत्सव’ की अवधारणा पर काम किए जाने की आवश्यकता है। असम के बिहू को अंतरराष्ट्रीय लोक संस्कृति एवं नृत्य महोत्सव, गुजरात के रण उत्सव को अंतरराष्ट्रीय डेजर्ट फेस्टिवल, नगालैंड के हार्नबिल महोत्सव को अंतरराष्ट्रीय जनजातीय संस्कृति उत्सव, राजस्थान के पुष्कर मेले को अंतरराष्ट्रीय मरुस्थलीय एवं पशु मेले, कर्नाटक के मैसूर दशहरे को अंतरराष्ट्रीय विरासत महोत्सव, केरल के ओणम को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक एवं नौका उत्सव और पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को अंतरराष्ट्रीय कला एवं प्रकाश महोत्सव के रूप में विकसित किया जा सकता है।

इसी तरह महाराष्ट्र का गणेशोत्सव, तमिलनाडु का पोंगल, पंजाब की बैसाखी, बिहार का सोनपुर मेला, छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा, मध्य प्रदेश का खजुराहो नृत्य महोत्सव, ओडिशा का कोणार्क नृत्य महोत्सव, हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा और उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात एवं फूलदेई भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के प्रमुख आकर्षण बन सकते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय परंपराओं, कला, खानपान, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच प्रदान करना भी होना चाहिए।

भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए एक राष्ट्रीय महोत्सव कैलेंडर तैयार किया जाना चाहिए। दुनिया भर में बसे 3.2 करोड़ एनआरआइ भारत के सांस्कृतिक राजदूत हैं। ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ एप के माध्यम से पासपोर्ट पैकेज में छूट, सिंगल-विंडो बुकिंग, लाइव गाइड और रूट मैप जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराकर होमकमिंग टूरिज्म में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की जा सकती है। यह नई पीढ़ी के एनआरआइ बच्चों को भारतीय परंपराओं, हस्तशिल्प और अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

विदेशी पर्यटकों को होटलों तक सीमित रखने के बजाय ग्रामीण परिवारों के साथ त्योहार मनाने, पारंपरिक भोजन बनाने और स्थानीय रीति-रिवाजों को सीखने के अवसर दिए जाने चाहिए। इसके लिए एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाने की जरूरत है, जिसमें पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, राज्य सरकारों, निजी पर्यटन उद्योग, होटल एसोसिएशन और स्थानीय निकायों की साझेदारी हो।

प्रत्येक राज्य अपने प्रमुख उत्सव का चयन कर उसे पांच से सात दिन के अंतरराष्ट्रीय महोत्सव के रूप में विकसित करे। भारत के दूतावासों, अंतरराष्ट्रीय टूर आपरेटरों, डिजिटल मीडिया और विदेशी पर्यटन प्रदर्शनियों के माध्यम से इन आयोजनों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। भारतीय त्योहारों का अंतरराष्ट्रीयकरण केवल पर्यटन को बढ़ावा देने का माध्यम नहीं, बल्कि समावेशी आर्थिक विकास को गति देने की प्रभावी कुंजी भी बन सकता है।
(लेखक अर्थशास्त्री हैं)