हृदयनारायण दीक्षित। शंकराचार्य भारत की अनोखी त्याग परंपरा का विस्तार हैं। आदि शंकराचार्य ने विश्व दर्शन को अद्वैत दर्शन से समृद्ध किया। अल्प आयु में ही उन्होंने 11 प्रमुख उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्र का भाष्य किया। सांस्कृतिक एकता के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। बौद्ध एवं अन्य विद्वानों से उनका शास्त्रार्थ हुआ। उन्हें सभी स्थानों पर विजय मिली।

शंकराचार्य के भ्रमण को उस समय दिग्विजय कहा गया। उन्होंने सांस्कृतिक विचारधारा को प्रवाहमान बनाने के लिए चार मठों की स्थापना की। कर्नाटक में शृंगेरी, उत्तराखंड में जोशीमठ, ओडिशा में पुरी और गुजरात में द्वारका। उनके चार विद्वान शिष्यों ने मठों का नेतृत्व किया। उन्होंने चारों वेदों को प्रतिष्ठा दी।

सभी मठों को एक वेद से जोड़ा-शृंगेरी पीठ, कर्नाटक-यजुर्वेद, द्वारका पीठ, गुजरात-सामवेद, पुरी पीठ, ओडिशा-ऋग्वेद, ज्योतिर्मठ, उत्तराखंड-अथर्ववेद। वे द्रष्टा थे। अद्वैत वेदांत उनका दर्शन था। डॉ. एस. राधाकृष्णन ने उन्हें असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति बताया था।

दुर्भाग्य से आधुनिक काल के शंकराचार्य अपने कार्य व्यवहार से निराश करते हैं। वे प्रेरित नहीं करते। उत्साह और उल्लास नहीं देते। वे व्यापक हिंदू समाज को कोई ठोस एवं प्रभावी दिशा नहीं देते। इन दिनों स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रशासन और शासन से विवाद के कारण लगातार चर्चा में हैं। इस विवाद की शुरुआत प्रयागराज में माघ मेले में स्थानीय प्रशासन के बीच टकराव से हुई थी। मौनी अमावस्या पर्व पर स्वामी जी पारंपरिक पालकी से स्नान के लिए निकले।

प्रशासन ने उनका ध्यान भीड़ प्रबंधन की ओर आकर्षित किया और उनसे पैदल चलने का अनुरोध किया। इसके बाद उनके अनुयायियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। आचार्य के अनुयायियों के अनुसार शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार हुआ। स्वामी जी ने इसे शंकराचार्य का अपमान बताया और बिना स्नान किए लौट आए। प्रशासन ने स्वामी जी को लिखित चेतावनी दी। नोटिस में उन पर सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन आदेश का उल्लेख करते हुए पूछा गया कि वे अपने शिविर के बाहर बोर्ड पर शंकराचार्य शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं?

पता नहीं इस विवाद का पटाक्षेप कैसे और कब होगा, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि हम भारत के लोग साधु-संतों को सम्मान से देखते हैं। गीता में संन्यासी की परिभाषा है, ‘जो इच्छारहित है, सभी द्वंद्वों से मुक्त है, वही संन्यासी है।’ आदि शंकराचार्य ऐसे ही दार्शनिक संन्यासी थे। साधना की सिद्धि प्राप्त संत हैं। महतत्व के बोध वाला महंत है, लेकिन आज के शंकराचार्य संभवतः ऐसा नहीं मानते। वे स्वयं के सम्मान के लिए झगड़ा करते हैं। कोर्ट-कचहरी में पदों की लड़ाई लड़ते हैं।

ऐसा पहले से भी होता आ रहा है। मठों-पीठों की संपदा को लेकर भी झगड़े होते रहे हैं और वे अंग्रेजी राज में ही प्रिवि काउंसिल तक जा चुके थे। पीवी काणे ने ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में लिखा है कि मठों में अधिकार क्षेत्र आदि को लेकर झगड़े होते रहे हैं।

प्रथम शंकराचार्य ने मठों के संचालन के लिए ‘मठाम्नाय महानुशासन‘ की नियमावली बनाई थी। मठाम्नाय का अर्थ है महानुशासन। शंकराचार्य दर्शन और अध्यात्म के परम विद्वान थे। उन्होंने काम करते हुए अनुभव कर लिया था कि सांसारिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन में संलग्न व्यक्ति धर्म प्रचार का कार्य नहीं कर सकेगा। इसलिए उन्होंने संसार त्यागी सुयोग्य ब्रह्म पारायण संन्यासियों को धर्म प्रचार का कार्य सौंपा और सबके लिए अनुशासन पालन का नियम बनाया। शंकराचार्यों को उससे शासित होना चाहिए। आश्चर्य है कि हमारे शंकराचार्य कुंभ या अन्य अवसरों पर पहले स्नान के लिए झगड़ते हैं। राजनीतिक मामलों में वक्तव्य देते हैं। धार्मिक मामलों को राजनीतिक रंग देते हैं।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन अंतरराष्ट्रीय उत्सव था, लेकिन यह आयोजन राजनीतिक बहस का हिस्सा बना। इसका कारण कुछ शंकराचार्यों के बयान रहे। उनके बयानों से विपक्षी दलों को मसाला मिला। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन को लेकर सबसे ज्यादा मुखर रहे। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री ही मूर्ति स्थापित करेंगे तो शंकराचार्य क्या वहां ताली बजाने के लिए बैठेंगे? अयोध्या और प्रयागराज के संदर्भ तो ताजा हैं।

एक समय ज्योतिष्ठ पीठ बद्रिका आश्रम के शंकराचार्य का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सिविल जज ने वासुदेवानंद को स्वयं को शंकराचार्य घोषित करने पर रोक लगा दी थी। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा के समय भी केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल भीम शंकर और शंकराचार्य स्वरूपानंद टकरा गए थे। एक शंकराचार्य ने साईं बाबा पर लगातार हमले किए।

जागृत समाज में आप जबरदस्ती सम्मान नहीं ले सकते। सम्मान का इच्छुक व्यक्ति राष्ट्र के जीवन मूल्यों के अनुसार जीवन-यापन करता है। समाज हर गतिविधि को ध्यान से देखता है। कोई यों ही आदि शंकराचार्य की तरह सुविख्यात नहीं हो जाता। उसे तप और साधना की अग्नि में स्वयं को तपाना होता है। वह इतिहास से सामग्री लेता है। अनुकरणीय तत्व छांटता है। वह सबको प्रेरित करता है, लेकिन कुछ शंकराचार्यों के कार्य और व्यवहार से देश और विशेष रूप से हिंदू समाज निराश हुआ है। शंकराचार्य संस्था यूरोप के पोप जैसी नहीं है। हिंदू शंकराचार्यों सहित देश की सभी धार्मिक परंपराओं का आदर करते हैं। शंकराचार्य नए समाज की आवश्यकता समझें। वे भारत के धर्म, अध्यात्म की परंपरा को व्यक्तिगत अहमान्यता से मुक्त होकर नए आकाश और नए पंख दें।

देश के सामने आदि शंकराचार्य का प्रेरक व्यक्तित्व है। उन आदर्शों के विपरीत आचरण समाज को दुखी करता है। सभी साधु, संत और महंत हिंदू मन की पुकार सुनें। हिंदू समाज को दार्शनिक और प्रगतिशील वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला समाज बनाने के लिए मार्गदर्शन करें। धर्म-दर्शन के स्तर पर विश्ववारा बनाने का दायित्व पूरा करने के लिए अगुआई करें, ताकि भारत की प्रतिष्ठा और बढ़े।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)