डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी। आधुनिक समाज साक्षरता, शिक्षा और अनुसंधान का परिणाम है। आज हमारी जो भी तरक्की हुई है वह शिक्षा का ही परिणाम है। माचिस की तीली से लेकर स्मार्टफोन तक शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान का ही नतीजा है। लेकिन जैसे-जैसे समाज ने डिजिटलाइजेशन के आगमन के साथ प्रगति की है, आम जनता की शिक्षा की जरूरतें भी बदल गई हैं। समकालीन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हर कुछ दशक के बाद एक नई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति तैयार की जाती रही है ताकि उन बदली हुई आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। अब तक भारत ने इस तरह के तीन सुधार देखे हैं, पहला 1968 में, दूसरा 1986 में और तीसरा हाल ही में इसे अंजाम दिया गया है।

ज्ञान के क्षेत्र में महाशक्ति: देखा जाए तो समग्र शिक्षा के लिए लंबे समय से चली आ रही आवश्यकता को स्वीकार करते हुए नई शिक्षा नीति शिक्षा के सार्वभौमिकरण और व्यावसायिक अध्ययन के अवसर प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करती है। जहां पहले शिक्षा का फोकस लोगों को साक्षर बनाना और उन्हें सुरक्षित नौकरियां दिलाने में मदद करना था, वहीं नई नीति गुणवत्ता, नवाचार और अनुसंधान पर आधारित है, जिसका उद्देश्य भारत को ज्ञान के क्षेत्र में महाशक्ति बनाना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की एक प्रमुख विशेषता कक्षा पांच तक के छात्रों के लिए कोई भाषा-अवरोध नहीं है। कक्षा पांच तक पढ़ाने का माध्यम मातृभाषा में होगा। शिक्षकों को एक विशेष भाषा माध्यम तक सीमित नहीं करके, राष्ट्रीय शैक्षिक नीति बहुभाषावाद, शिक्षण और सीखने में भाषा की शक्ति को बढ़ावा देगा। छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को स्कूल के स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा। भारत की अन्य स्थानीय भाषाएं और साहित्य भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगे।

माध्यमिक स्तर पर कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं का विकल्प भी छात्रों को दिया जाएगा। छठी के छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाएगी और इसमें इंटर्नशिप को भी शामिल किया जाएगा। राष्ट्रीय शैक्षिक नीति का उद्देश्य पाठ्यक्रम को लचीला बनाना है ताकि छात्रों के पास शैक्षिक पाठ्यक्रमों का चयन करने का विकल्प हो और वे अपनी योग्यता व रुचियों के अनुसार जीवन में अपने लिए आगे का रास्ता स्वयं चुन सकते हैं।

समावेशी और निष्पक्ष शिक्षा: सामाजिक न्याय और समानता प्राप्त करने के लिए शिक्षा सबसे बड़ी कुंजी है। समावेशी और निष्पक्ष शिक्षा एक समावेशी समुदाय को गढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सपने देखने, उसे साकार करने और देश के विकास में अपना योगदान देने का अधिकार है। मानकीकृत और सार्वभौमिक साधनों को सुनिश्चित करने के संदर्भ में एक व्यापक शोध किया गया जिससे प्राप्त आंकड़ों से यह पता चला कि देश के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में सामाजिक और आíथक रूप से वंचित समूहों का अनुपात काफी बड़ा है।

इसके अलावा ऐसे भौगोलिक इलाकों की पहचान उन आकांक्षी जिलों के रूप में की गई है जिन्हें अपने शैक्षिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। इसलिए इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कि किसी भी बच्चे को जन्म या पृष्ठभूमि की परिस्थितियों के कारण सीखने के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, इस नीति में यह प्रस्तावित किया गया है कि उन क्षेत्रों को विशेष शिक्षा क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। ये क्षेत्र समग्र रूप से भारत को विकास के पथ पर ले जाने के लिए अधिक सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से सभी योजनाओं और नीतियों को कार्यान्वित करने का प्रयास करेंगे।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि राष्ट्र एक साथ आगे बढ़ता रहे और प्रत्येक व्यक्ति आत्मनिर्भर और सशक्त बने, सरकार ने यह तय किया है कि उच्च शिक्षा के लिए भी समानता का समावेश हो। एक प्रतिष्ठित संस्थान से हासिल की गई शिक्षा से लोगों को ऐसे कई अवसर मिल सकते हैं जो समाज के सभी वर्गो के लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। नई शिक्षा नीति विशेष शिक्षा क्षेत्र पर खास जोर देने के साथ सभी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में काम करती है। इस नीति ने उच्च शिक्षण संस्थानों से फीस कम करने और यहां तक कि सामाजिक रूप पिछड़े व आíथक दृष्टिकोण से कमजोर तबके के छात्रों को अधिक वित्तीय सहायता तथा छात्रवृत्ति प्रदान करने का आग्रह किया है ताकि प्रत्येक छात्र को अवसर मिल सके।

कौशल आधारित नजरिये से देखा जाए तो नई शिक्षा नीति एक ऐसी पीढ़ी को तैयार करने में सक्षम है जो विशेषज्ञता और कौशल से बेहतर रूप से सुसज्जित होगी। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ अपनी विनिर्माण इकाइयों को भारत में स्थानांतरित करने के लिए सरकार को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि देश की जनता के पास सामयिक कौशल हो। विनिर्माण इकाइयों की मजबूती के लिहाज से तो यह देश को सक्षम बनाता ही है, इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भरोसा भी बढ़ेगा और साथ ही मेक इन इंडिया अभियान को भी यह आगे बढ़ाएगा।

अनुसंधान की संस्कृति को प्रोत्साहन देने के लिए एक नए राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन का गठन ठोस प्रमाण है कि भारत संपूर्ण पीढ़ी को सक्षम बनाने की दिशा में काम करेगा जो देश को सही मायने में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक साबित होगा। राष्ट्रीय शैक्षिक नीति सामथ्र्य, गुणवत्ता और जवाबदेही के आधारभूत स्तंभों पर आधारित है। बोर्ड परीक्षाओं और स्नातक पाठ्यक्रमों के मूल्यांकन, समीक्षा और विश्लेषण के लिए नई मूल्यांकन प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाएगा। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नौकरी प्राप्त करने की दिशा में ही अधिकतम जोर दिया जाता है, जबकि इसमें छात्र के बहुआयामी विकास के साथ चरित्र निर्माण पर भी जोर दिया जाएगा।

[एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, जेएनयू]