विचार: लोकतांत्रिक एवं गणतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दृष्टिकोण से लेकर पीएम मोदी की 'सबका साथ, सबका विकास' नीति तक की यात्रा का वर्णन किया। लेख में श्रम संहिताओं, स्टार्टअप इंडिया, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना और नारी शक्ति वंदन अधिनियम जैसी पहलों के माध्यम से सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और नागरिक कल्याण पर जोर दिया गया है, जो भारतीय गणतंत्र की सतत यात्रा को मजबूत करते हैं।
HighLights
राजनाथ सिंह। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 16 मई, 1952 को पहली लोकसभा को संबोधित करते हुए संसद सदस्यों को उनके लोकतांत्रिक दायित्वों की गंभीरता का स्मरण कराया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि संविधान लागू होते ही राष्ट्रपति के निर्वाचन और पहले आम चुनाव के साथ स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का प्रथम चरण पूरा हो चुका है और देश अब ऐसे दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है, जिसमें कोई विराम नहीं होगा।
वस्तुत:, संविधान और लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था के केंद्र में ‘हम भारत के लोग’ हैं और उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान का ही ध्येय है। यह ध्येय सदैव भारत की राजनीतिक चेतना का अभिन्न अंग रहा है। प्राचीन भारत में ‘योग-क्षेम’ का सिद्धांत व्यक्ति के कल्याण और सुरक्षा से जुड़ा हुआ था। महात्मा गांधी के सर्वोदय के विचार के केंद्र में भी सभी का उत्थान है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ के सिद्धांत भी व्यक्ति के संपूर्ण विकास और वंचित वर्गों के उत्थान पर केंद्रित हैं। विकास के केंद्र में नागरिकों को रखने की यह परंपरा वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति ‘सबका साथ, सबका विकास’ में भी निहित है। वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जनता केंद्रित शासन व्यवस्था का यह सोच सरकार की नीतियों और कार्यों में स्पष्ट दिखता है। इससे संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति को गति और शक्ति मिली है।
संविधान में उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत राज्य पर श्रमिकों के लिए मानवीय और न्यायपूर्ण परिस्थितियां सुनिश्चित करने का दायित्व है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने हाल में ही 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में पिरोया है। यह श्रमिकों के लिए बेहतर आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। संविधान राज्य को निर्देश देता है कि वह आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे।
इस उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है, जब समाज के प्रत्येक वर्ग को शिक्षा और रोजगार के समान अवसर उपलब्ध हों। पिछले कुछ वर्षों में लिए गए कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के चलते आज अवसरों की यह समानता हर स्तर पर बढ़ी है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण स्टार्टअप इंडिया जैसी पहल है, जिसके हाल ही में दस वर्ष पूरे हुए हैं। इसके अंतर्गत प्रदान किए जाने वाले नीतिगत सहयोग, आर्थिक मदद और मेंटरशिप के माध्यम से आज किसी भी व्यक्ति के लिए कोई उद्योग शुरू करना बहुत सुगम हुआ है।
आर्थिक प्रगति तभी समावेशी बनती है, जब अवसरों की समानता हो। यह आय असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले 12 वर्षों में सभी आर्थिक नीतियां इसी विचार से प्रेरित रही हैं। इसी का परिणाम है कि आज भारत की आर्थिक प्रगति का लाभ प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से पहुंच रहा है। विश्व बैंक के ‘स्प्रिंग 2025 पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ के अनुसार भारत ने पिछले दशक में 17.1 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी की रेखा से बाहर निकाला है। सामाजिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी आरक्षण का लाभ दिया गया है।
केंद्र सरकार ने समावेशी विकास के साथ-साथ लोगों के लिए गरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने पर भी निरंतर ध्यान केंद्रित किया है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 जैसे कानूनों के माध्यम से सामाजिक न्याय को और मजबूती मिली है। गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने की इसी भावना का एक अच्छा उदाहरण स्वच्छ भारत मिशन भी है। जनकल्याण की यही भावना प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ और ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ जैसी पहलों में भी साफ दिखती है। अन्न योजना के तहत 80 करोड़ से अधिक लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का आह्वान किया था, तो वह केवल अर्थव्यवस्था के स्तर तक ही सीमित नहीं था, बल्कि नागरिकों के भीतर आत्मनिर्भरता की भावना बढ़ाने का भी प्रयास था। इसलिए मुद्रा योजना और स्किल इंडिया मिशन जैसी पहलों के माध्यम से नागरिकों को स्वावलंबी और उद्यमशील बनाने पर बल दिया गया है। इन योजनाओं के केंद्र में आत्मनिर्भर नागरिक बनाना है, जो आत्मनिर्भर भारत का आधार भी बन रहे हैं।
इसी क्रम में आयुष्मान भारत योजना एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को बहुत लाभ हुआ है, जो संसाधनों के अभाव में अच्छी स्वास्थ्य सेवा से वंचित थे। इसी तरह जन-धन योजना ने बड़ी संख्या में नागरिकों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़कर वित्तीय सुरक्षा प्रदान की है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान किया गया है। इस अधिनियम में लोकतंत्र के तीनों सिद्धांत सशक्त अभिव्यक्ति पाते हैं, क्योंकि विधायी संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने से संप्रभुता का सामाजिक आधार तो बढ़ेगा ही और नीति-निर्माण भी ज्यादा समावेशी होगा।
लोकतांत्रिक सिद्धांतों के मूल में समाहित जन-कल्याण एक सतत दायित्व है, जिसे हर पीढ़ी को अपने समय में निभाना पड़ता है। गणतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती सिर्फ इस बात पर ही निर्भर नहीं है कि उसकी संस्थाएं कितनी मजबूत और दीर्घजीवी हैं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि शासन व्यवस्था जनता के जीवन में कैसा बदलाव लाती है। हमें यह स्मरण रखना है कि भारतीय गणतंत्र की यात्रा सतत जारी रहनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है। यह 77वां गणतंत्र दिवस सिर्फ इस दायित्व को स्मरण करने का ही अवसर नहीं है, बल्कि उससे आगे बढ़ कर यह संकल्प लेने का भी है कि हम भारत के लोग अपने लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों को और अधिक गहराई से आत्मसात करें, उन्हें आचरण में उतारें और सुनिश्चित करें कि शासन की हर दिशा और हर निर्णय के केंद्र में जनता और उसका कल्याण ही सर्वोपरि रहे।
(लेखक रक्षामंत्री हैं)










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