जागरण संपादकीय: मजबूत होते घुसपैठियों के मददगार, अवैध बांग्लादेशियों पर जल्द लेना होगा फैसला
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने के अभियान की सफलता के बारे में कुछ कहना कठिन है क्योंकि दिल्ली से लेकर मुंबई तक ऐसे अभियान कई बार चलाए गए लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा। ऐसा नतीजा इसलिए रहा क्योंकि अवैध बांग्लादेशियों को निकालना न तो राष्ट्रीय प्रतिबद्धता बन पाया और न ही राष्ट्रहित का विषय।
राजीव सचान। नए वर्ष के प्रारंभ में कोलकाता से आई खबरों के अनुसार मालदा, उत्तर 24 परगना और नादिया जिले से घुसपैठ की कोशिश कर रहे बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को पकड़कर वापस भेजा गया। तब बीएसएफ के प्रवक्ता ने बताया था कि घुसपैठ करने वालों से पूछताछ में पता चला कि ज्यादातर हाउसकीपिंग और मजदूरी के लिए मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जाने की फिराक में थे।
बांग्लादेश से केवल बंगाल के रास्ते ही घुसपैठ नहीं होती। घुसपैठ के रास्ते त्रिपुरा, असम और मेघालय भी हैं। पता नहीं अभिनेता सैफ अली खान को चाकू मारकर घायल करने वाला मोहम्मद शरीफुल इस्लाम किस रास्ते भारत में घुसा, लेकिन मुंबई पुलिस ने इसकी पुष्टि कर दी है कि वह बांग्लादेशी ही है। वह करीब छह-सात माह पहले चोरी-छिपे भारत आया था।
सैफ अली खान के घर में घुसकर उन पर हमला करने के कुछ दिन पहले तक वह थाणे और वर्ली में हाउसकीपिंग का काम करता था। इसका मतलब है कि बीएसएफ प्रवक्ता बिल्कुल सही कह रहे थे कि घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी मजदूरी और हाउसकीपिंग का काम करने के लिए भारत आ रहे हैं। इन घुसपैठियों में शरीफुल इस्लाम जैसे अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी हो सकते हैं और वे भी, जो आतंकी संगठनों से जुड़े हैं।
चिंताजनक केवल यह नहीं है कि बांग्लादेश से घुसपैठ करने वाले फर्जी नाम और पहचान पत्र हासिल कर देश के विभिन्न हिस्सों में और यहां तक कि बंगाल और असम से दूर दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद तक में अपना ठिकाना बना लेते हैं, बल्कि यह भी है कि उनकी पहचान और पकड़ मुश्किल से हो पाती है। इससे भी मुश्किल होता है उन्हें वापस भेजना। एक समस्या यह भी है कि ज्यादातर राजनीतिक दल और उनकी राज्य सरकारें अवैध तरीके से बांग्लादेश से आए लोगों को निकालने की कभी चिंता नहीं करतीं।
उलटे वे हर ऐसी कोशिश का विरोध करती हैं। पता नहीं क्यों अधिकांश राजनीतिक दल यह माने बैठे हैं कि यदि अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की पहल की गई तो भारत के मुस्लिम नाराज हो जाएंगे और इससे उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान होगा। अभी जब दिल्ली में बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान का अभियान चला तो कई दलों ने किंतु-परंतु के साथ यही कहने की कोशिश की कि यह केवल चुनावी स्टंट है।
यह तय मानिए कि यदि सैफ अली खान पर हमले के बाद महाराष्ट्र सरकार की ओर से बांग्लादेशियों को निकालने की पहल की जाती है तो उसका किसी न किसी बहाने विरोध होगा। यह इसके बाद भी होगा कि मुंबई में अवैध बांग्लादेशियों की अच्छी-खासी संख्या होने का अंदेशा है।
सैफ अली खान का हमलावर मुंबई में वर्ली के जिस इलाके में रहता था, वहां के लोगों की शिकायत है कि उनके यहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी रह रहे हैं और वे उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं। यहां के लोगों ने कुछ दिनों पहले अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर एक रैली भी निकाली थी।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने के अभियान की सफलता के बारे में कुछ कहना कठिन है, क्योंकि दिल्ली से लेकर मुंबई तक ऐसे अभियान कई बार चलाए गए, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा। ऐसा नतीजा इसलिए रहा, क्योंकि अवैध बांग्लादेशियों को निकालना न तो राष्ट्रीय प्रतिबद्धता बन पाया और न ही राष्ट्रहित का विषय।
1998 में जब केंद्र में वाजपेयी सरकार थी और महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की तो महाराष्ट्र पुलिस ने अवैध बांग्लादेशियों को निकालने का अभियान छेड़ा था। इस अभियान पर बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने यह कहते हुए आसमान सिर पर उठा लिया था कि बांग्लादेशियों के नाम पर बंगाल के लोगों को मुंबई से बाहर किया जा रहा है।
उस समय यानी आज से 27 बरस पहले विभिन्न स्रोतों के आधार पर यह बताया जा रहा था कि देश में करीब एक करोड़ बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं। आज उनकी संख्या कितनी होगी, किसी को पता नहीं, क्योंकि बांग्लादेश से घुसपैठ तो कभी थमी नहीं। जो पता है, वह यह कि उन्होंने बंगाल और असम के कई इलाकों में आबादी का संतुलन बिगाड़ दिया है।
इन राज्यों के कई विधानसभा क्षेत्रों में वे निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। साफ है कि बांग्लादेश से घुसपैठ केवल सामाजिक ताने-बाने को ही छिन्न-भिन्न करने वाली नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डालने वाली है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि भाजपा सरकारों की ओर से प्रायः यह कहा जाता है कि वे अवैध बांग्लादेशियों को निकालने का अभियान चलाएंगी, क्योंकि अभी तक तो ऐसा कोई अभियान कायदे से चला ही नहीं।
आधे-अधूरे मन से ऐसा अभियान चलाने का नतीजा यह होता है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ उनकी घुसपैठ कराने और उन्हें फर्जी पहचान पत्रों से लैस करने वालों का दुस्साहस बढ़ता है। वे पहले से ज्यादा संगठित और सतर्क होकर यह काम करते हैं। यह एक सच है कि शरीफुल इस्लाम फर्जी पहचान पत्र से विजय दास बनने और मुंबई में एक बार चोरी के कारण काम से निकाले जाने के बाद भी फिर से काम पाने में सफल रहा। इसका मतलब है कि वह तंत्र कहीं मजबूत है, जो घुसपैठियों को लाने, उन्हें छिपाने और काम देने का कार्य कर रहा है।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)
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