राज कुमार सिंह। दक्षिण भारत में अक्सर राजनीतिक हित साधने के लिए हिंदी विरोध को एक कारगर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब लगता है कि महाराष्ट्र की बारी है। जिन अहिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी बोलने-समझने वाले ही नहीं, हिंदी लिखनेवाले भी बड़ी संख्या में मिल जाते हैं, उनमें महाराष्ट्र अग्रणी है।

मूलत: मराठीभाषी हिंदी साहित्यकारों और पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है। जिस हिंदी सिनेमा की हिंदी भाषा के प्रसार में बड़ी भूमिका की बात कही जाती है, उसका केंद्र महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई ही है। मराठी मूल के असंख्य लोगों ने फिल्म निर्माण से लेकर अभिनय तक, हिंदी सिनेमा में बड़ा नाम कमाया है।

दादा साहेब फाल्के को भारतीय फिल्म उद्योग का पितामह कहा जाता है। देश का सबसे प्रतिष्ठित फिल्म सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के अवार्ड’ उन्हीं की स्मृति में दिया जाता है। क्या वी. शांताराम के बिना हिंदी सिनेमा की कहानी कही जा सकती है? यह फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है।

महाराष्ट्र में अब त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने के फैसले को हिंदी थोपना बता कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। नई शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, जिनमें से दो भारतीय और तीसरी विदेशी होगी। नई शिक्षा नीति के अनुरूप ही त्रिभाषा फार्मूले को लागू करते हुए महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक मराठी, हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाए जाने का फैसला लिया। इसका खासकर शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा जोरदार विरोध शुरू हो गया।

संकीर्ण राजनीति प्रेरित अतार्किक विरोध के आगे झुकते हुए महायुति सरकार ने अपने आदेश में संशोधन भी कर दिया कि विद्यार्थी मराठी और अंग्रेजी के साथ तीसरी भाषा के रूप में हिंदी के बजाय कोई अन्य भारतीय भाषा भी चुन सकते हैं। इसके बावजूद महाराष्ट्र में हिंदी विरोध थमता नहीं दिख रहा। उद्धव की शिवसेना और राज की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अब मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने के विरोध में संयुक्त विरोध प्रदर्शन करने जा रही हैं।

अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए उद्धव और राज ठाकरे की तरह शरद पवार भी मराठी अस्मिता के भावनात्मक मुद्दे को भुनाने का मौका नहीं चूकना चाहते। हिंदी विरोधी प्रदर्शन को उन्होंने भी समर्थन का एलान कर दिया है। ऐसा ही दबाव अन्य विपक्षी दलों पर भी नजर आ रहा है, क्योंकि ऐसे भावनात्मक मुद्दे हमारी चुनावी राजनीति में वास्तविक मुद्दों पर भारी पड़ते रहे हैं।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने आरोप लगाया है कि अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में नई शिक्षा नीति को मंजूरी देने वाले उद्धव ठाकरे बीएमसी समेत आगामी नगर निगम चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए ही हिंदी विरोध को हवा दे रहे हैं। सच यह भी है कि बाला साहब ठाकरे द्वारा गठित शिवसेना की पहचान शुरू में हिंदी भाषा तथा गैर मराठी प्रवासियों के विरोधी की ही रही। मराठी अस्मिता के नाम पर ही शिवसेना ने महाराष्ट्र में अपने पैर पसारे, लेकिन पहले भाजपा से गठबंधन और फिर उससे तकरार के बाद कांग्रेस-राकांपा के साथ महा विकास अघाड़ी सरकार बनाने से वह पहचान धूमिल होती गई।

अब जबकि राज ठाकरे के साथ ही उद्धव ठाकरे के समक्ष भी राजनीतिक भविष्य का संकट खड़ा हो गया है, तब दोनों मिलकर हिंदी विरोध के जरिये मराठी अस्मिता के मुद्दे को धार दे कर पुनरुत्थान की कोशिश कर रहे हैं। पिछले साल विधानसभा चुनाव के बाद दोनों ठाकरे भाइयों में एकता की चर्चाएं लगातार चलती रही हैं। हिंदी विरोध के रूप में उन्हें मनचाहा मुद्दा भी मिल गया है। बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश में भाषाई संकीर्णता का यह मुद्दा कितना कारगर होगा, इसकी पहली परीक्षा बृहद मुंबई महापालिका यानी बीएमसी समेत कुछ नगर निगमों के निकट भविष्य में होनेवाले चुनावों में होगी। बीएमसी पर सभी दलों की नजर इसलिए भी रहती है कि उसका बजट देश के कई राज्यों से बड़ा है। आम धारणा है कि बीएमसी पर काबिज दल के लिए महाराष्ट्र में राजनीति करना आसान हो जाता है।

महाराष्ट्र में हिंदी विरोध के मूल में सस्ती राजनीति ही है। अपने मुद्दों की नाकामी से जनाधार गंवा चुके राजनीतिक दलों और नेताओं को लगता है कि मराठी अस्मिता के जांचे-परखे पुराने दांव से शायद भविष्य में उनकी चुनावी नैया पार लग जाएगी, लेकिन संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए वे जो कीमत चुकाने पर आमादा हैं, वह राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सामाजिक सौहार्द पर भारी पड़ सकती है। ऐसे में महाराष्ट्र के जागरूक नागरिकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

जन साधारण को समझाना होगा कि नई शिक्षा नीति के अनुरूप पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी पढ़ाए जाने को हिंदी थोपना बता कर विरोध कर रहे राजनीतिक दलों और नेताओं ने राज्य में कभी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का विरोध नहीं किया। बेशक वैश्विक गांव की परिकल्पना के इस दौर में किसी विदेशी भाषा का विरोध भी समझदारी नहीं, पर एक ही विशाल भाषा परिवार की सदस्य भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने की साजिश तो देश के प्रति अक्षम्य अपराध है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)