एबीजी शिपयार्ड घोटाला यही बता रहा है कि देश के बैंकिंग प्रबंधन में अभी भी कई खामियां व्याप्त हैं
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके वित्तीय क्षेत्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। बैंकों को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है लेकिन पिछले एक दशक से भारतीय बैंक कठिन दौर से गुजर रहे हैं क्योंकि बैंक घोटाले बैंकों पर भारी दबाव डाल रहे हैं
ब्रजेश कुमार तिवारी। पिछले दिनों एक और बैंकिंग घोटाला सामने आया और यह पता चला कि सूरत की एबीजी शिपयार्ड कंपनी ने विभिन्न बैैंकों से लगभग 22 हजार करोड़ रुपये का लोन फर्जी तरीके से ले रखा था। सीबीआइ के अनुसार एबीजी शिपयार्ड घोटाला 2005 से 2012 के बीच हुआ। इस मामले में उसने पहली बार आठ नवंबर, 2019 को केस दर्ज किया था। इसी मामले में एक नया केस इसी सात फरवरी को नए सिरे से दर्ज किया और फिर संबंधित लोगों से पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का उत्थान और पतन काफी हद तक उसके वित्तीय क्षेत्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। इसी वजह से बैंकों को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन पिछले एक दशक से भारतीय बैंक कठिन दौर से गुजर रहे हैं, क्योंकि एक के बाद एक बैंक घोटाले बैंकों पर भारी दबाव डाल रहे हैं। देश में कई बैैंक घोटाले सामने आ चुके हैैं। जैसे हर्षद मेहता घोटाला, केतन पारेख घोटाला, नीरव मोदी एवं मेहुल चोकसी का पीएनबी घोटाला, विजय माल्या का 13 बैंकों के साथ घोटाला, इलाहाबाद बैंक घोटाला, रोटोमेक पैन लोन घोटाला, पीएमसी बैंक घोटाला, आरपी इन्फोसिस्टम बैंक घोटाला, सिंभावली शुगर्स लोन घोटाला, आइसीआइसीआइ बैंक घोटाला, कनिष्क गोल्ड प्राइवेट लिमिटेड लोन घोटाला और यस बैंक घोटाला। इनमें से ज्यादातर लोगों या कंपनियों ने कर्ज जानबूझकर नहीं चुकाया यानी वे विलफुल डिफाल्टर बन गए।
बैंकों के पास अपना पैसा तो होता नहीं। जाहिर सी बात है कि यह पैसा हमारा-आपका यानी आम लोगों का है। जो पैसा हम-आप जमा करते हैं, बैंक उसी को लोन देकर अपना बिजनेस चलाते हैं। लगातार उजागर होते बैंक घोटालों की लंबी सूची यह बयान कर रही है कि देश की बैंकिंग व्यवस्था में नीतिगत और क्रियान्वयन स्तर पर खामियां व्याप्त हैं। सवाल है कि सरकार, आरबीआइ, वित्त मंत्रालय, सीबीआइ, सीवीसी और बैंकिंग संस्थाएं घोटाला होने के बाद ही क्यों जागती हैं? एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जहां उद्योगों को दिए सौ रुपये के कर्ज में 70 रुपये डूब रहे हैं तो आम आदमी के महज चार रुपये। हालांकि वह भी बाद में वसूल हो जाते हैं। अर्थात बैंकिंग क्षेत्र को चलाने में योगदान आम जनता का है। इसके बावजूद बैंक हजारों करोड़ रुपये का कर्ज कारोबारियों को आंख मूंद कर दे रहे हैं। भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूर के एक अध्ययन में पता चला है कि बैंक घोटाले और एनपीए (फंसे कर्ज) के लिए खराब बैंक कारपोरेट गवर्नेंस जिम्मेदार है। अमेरिका में वर्ष 2008 के सबप्राइम लोन संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने अपने निगरानी तंत्र और कारपोरेट गवर्नेंस को और मजबूत किया। दुर्भाग्य से भारतीय बैंक इसमें पीछे रह गए। साफ है जब तक विधिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक बैैंक घोटाले नियमित अंतराल पर होते ही रह सकते हैैं। यह एक विडंबना है कि भारत में किसी के बैंकर बनने के लिए विशिष्ट कौशल होने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल भारत में बैंकिंग को एक लिपिकीय कार्य अधिक माना जाता है। जाहिर है कि देश में बैंकिंग क्षेत्र को एक कौशल विशिष्ट क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता है।
जब आम जनता की ईएमआइ बाउंस होती है तो अगले ही दिन से बैंक से फोन आने शुरू हो जाते हैं। यदि दो-चार माह कोई ईएमआइ नहीं भर पाता तो उसके दोस्त, रिश्तेदार तक को पता चल जाता है। कोई किसान जब लोन नहीं चुका पाता तो बैंक उसकी जमीन नीलाम कर पूरे पैसे वसूल कर लेते हैं, मगर जब कारोबारियों या फिर कंपनियों की बात आती है तो वही बैंक पंगु हो जाते हैं। बैंक घोटालों के सिलसिले में बैंकिंग संस्थानों और नियामक एजेंसियों की सतर्कता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैैं तो इसके पर्याप्त कारण हैैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल कर्ज का 35 प्रतिशत जोखिम में है। जबकि बैंकों के पास केवल आठ प्रतिशत नुकसान सहने की ही क्षमता है। ऐसे में सिर्फ बैड बैंक के गठन और निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने को बैंकिंग उद्योग के संकट की कुंजी के तौर पर प्रस्तुत किया जाना सही नहीं दिखता। ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच के अनुसार आपसी हितों में टकराव की वजह से भी बैंकों के कारपोरेट गवर्नेंस संबंधी मानकों पर भी सवाल उठे हैं।
समय आ गया है कि बैंकों के लोन देने पर रिजर्व बैंक कड़ी निगरानी रखे। आरबीआइ के साथ-साथ बैंकों को ऋण प्रबंधन में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इसके साथ ही बैंकिंग सतर्कता आयोग के गठन पर भी देश के नीति निर्माताओं को विचार करना चाहिए। कुल मिलाकर अपनी आर्थिक सेहत को मजबूत करने के लिए सरकार और बैैंकों को सभी जवाबदेह व्यक्तियों की पहचान करनी चाहिए। उन्हें उचित रूप से दंडित भी करना चाहिए। सरकार द्वारा बैड बैंक बनाया गया है। इसी तर्ज पर उसको कारपोरेट बैंक भी स्थापित करने चाहिए। इन बैंकों में विशेषज्ञों की भर्ती करनी चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के उपयोग को बढ़ावा देने सहित उधारकर्ताओं की पृष्ठभूमि का आकलन करने के साथ ही रिजर्व बैंक के आडिट आदि की भी नियमित रूप से निगरानी की जानी चाहिए। सेंट्रल रिपोजिटरी आफ इन्फार्मेशन आन लार्ज क्रेडिट्स व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। यह सब इसलिए जरूरी है ताकि बैैंकिंग व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कायम रहे और हमारे बैैंक अर्थव्यवस्था को सहारा देने का अपना काम सही तरह करें।
(स्तंभकार जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर एवं 'चेंजिंग सिनेरियो आफ इंडियन बैंकिंग' पुस्तक के लेखक हैं)

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