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    हर विवाद के साथ मजबूत होता 'ब्रांड मोदी'

    By Edited By:
    Updated: Sat, 13 Jul 2013 09:10 AM (IST)

    नई दिल्ली [प्रशांत मिश्र]। नरेंद्र मोदी की बात का बतंगड़ बनाकर विपक्ष ने ब्रांड मोदी को और मजबूत होने का मौका दे दिया है। विपक्ष के साथ-साथ मीडिया की भी खुराक बन चुके मोदी का विदेशी एजेंसी को दिया गया साक्षात्कार तेलंगाना, खाद्य सुरक्षा या फिर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों से ज्यादा सुर्खियों में है। साक्षात्कार से भड़की सियासी आंच

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    नई दिल्ली [प्रशांत मिश्र]। नरेंद्र मोदी की बात का बतंगड़ बनाकर विपक्ष ने ब्रांड मोदी को और मजबूत होने का मौका दे दिया है। विपक्ष के साथ-साथ मीडिया की भी खुराक बन चुके मोदी का विदेशी एजेंसी को दिया गया साक्षात्कार तेलंगाना, खाद्य सुरक्षा या फिर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों से ज्यादा सुर्खियों में है।

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    साक्षात्कार से भड़की सियासी आंच में दमदार प्रशासक, भविष्यदृष्टा राजनेता और विकास के ऊंचे मानदंड स्थापित करती मोदी की मूल छवि से लोप होती उनकी हिंदुत्ववादी प्रखर राष्ट्रवाद वाली छवि फिर मुखर होकर सामने आ गई।

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    मोदी आमतौर पर 2002 के दंगों पर कुछ भी कहने से बचते रहे हैं, लेकिन लगता है कि अब उन्होंने यह जान लिया है कि हिंदुत्व की पिच पर खुलकर खेलने वक्त आ गया है। उन्होंने 2002 के दंगों पर चुप्पी तोड़ी और कहा कि कुछ गलत नहीं किया। उस समय अपने फैसलों को जायज ठहराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। इस दौरान उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वह उद्योग और विकास के प्रति समर्पित हैं, लेकिन वह हिंदू हैं और राष्ट्रवादी भी-और हिंदू होना कोई अपराध नहीं।

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    इसी साक्षात्कार में 2002 के दंगों पर मोदी की एक टिप्पणी पर विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर एक कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आकर मर जाए तो दर्द होता है। ऐसे में अगर कहीं कुछ गलत होगा तो वह दुखद है ही। उनकी इस टिप्पणी पर कांग्रेस, सपा, जदयू और वामदलों समेत सभी ने आपत्ति जताई तो मोदी ने इसका जवाब भी अपने विशिष्ट अंदाज में दिया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि हमारी संस्कृति में हर जीवन बहुमूल्य है.। बाकी फैसला जनता करेगी। अपने बयान की संवेदनशीलता दिखाने के साथ-साथ वह खुद को जनता के बीच शहीद की मुद्रा में भी पेश करने से नहीं चूके। मोदी का यह साक्षात्कार ऐसे समय आया है जब मुस्लिम वोटों के लिए सभी राजनीतिक दलों में होड़ चरम पर है।

    इस समय देश के तमाम हिस्सों में सियासी ध्रुवीकरण साफ होता दिख रहा है। मोदी कुछ भी बोलें, उसकी अपने-अपने तरीके से व्याख्या होती है। सियासी दल व राजनीतिक पंडित अपने-अपने हिसाब से निहितार्थ और गूढ़ार्थ तलाशते हैं। जितना वह बोलते हैं उससे ज्यादा प्रचार-प्रसार उनके विरोधी कर देते हैं। गुजरात में तीसरी बार चुनाव जीतने के बाद लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रहे मोदी ने खुद को विकासपुरुष और सफल प्रशासक के तौर पर ही पेश किया है। इसके उलट विपक्ष मुस्लिम समाज को भयाक्रांत करते हुए गुजरात दंगों की आग में घी डाल रहा है। कांग्रेस के साथ-साथ ज्यादातर सियासी दल नरेंद्र मोदी से ही लड़ते नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती तो शेष भारत में कांग्रेस अपने आपको मोदी को रोकने में सक्षम विकल्प के तौर पर पेश कर रही है। इसी वोट बैंक की सियासत या धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को कोसते हुए भाजपा का दामन छोड़ दिया। धर्मनिरपेक्षता का चैंपियन बनने की सियासी होड़ को समझते हुए मोदी अपना हर दांव बहुत सोच-समझकर चल रहे हैं। खांचों में बंटी भारतीय राजनीति के मर्म को वह न केवल समझ रहे हैं, बल्कि यह भी जान रहे हैं कि उनकी असली ताकत क्या है। इसीलिए मुद्दों पर भटकाव के बजाय वह अपनी पिच पर पूरी सियासत को खेलने पर मजबूर कर रहे हैं।

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