विदेश जाने के बजाए फूलों की खेती को चुना; अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ परिवार का सहारा बनी मानसा की अमनजीत
मानसा के कुलरियां गांव की अमनजीत कौर ने विदेश जाने के बजाय अपनी जमीन पर फूलों की खेती कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। आईलेट्स करने के बावजूद उन्हो ...और पढ़ें

कृषि यूनिवर्सिटी लुधियाना के प्रयास ने बदला अमनजीत कौर की जिंदगी का सफर, खेती के साथ कर रही है एमए की शिक्षा ग्रहण।
परविंदर बराड़, मानसा। अक्सर बेहतर भविष्य की तलाश में युवा विदेश जाने का सपना देखते हैं, लेकिन गांव कुलरियां की अमनजीत कौर ने नई मिसाल पेश की है। उन्होंने विदेश जाने का रास्ता चुनने की जगह अपनी मेहनत और सूझबूझ से नया रास्ता चुना। आईलेट्स करने के बावजूद विदेश जाकर परिवार को सेटल करने के बजाय अमनजीत ने अपनी ही जमीन पर खेती कर न केवल परिवार का सहारा बनीं, बल्कि अपनी पढ़ाई का खर्च भी खुद उठाने लगीं।
फूलों की खेती का उनका यह निर्णय आज उनकी जिंदगी को नई दिशा दे चुका है। गांव कुलरियां निवासी किसान जीता सिंह के पास करीब सवा दो एकड़ जमीन है, जिससे दो बेटों और एक बेटी वाले परिवार का गुजारा करना मुश्किल हो रहा था। 25 वर्षीय अमनजीत कौर ने भी विदेश जाने के लिए आईलेट्स किया था, लेकिन कमजोर आर्थिक हालात के चलते यह सपना पूरा नहीं हो सका। इसी दौरान गांव के गुरुद्वारा साहिब में फूलों की सजावट करते हुए उनके मन में फूलों की खेती का विचार आया, जिसने उनकी सोच और भविष्य दोनों बदल दिए।
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साल 2022 में अमनजीत ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के बागवानी विभाग से संपर्क किया। वहां फ्लोरीकल्चर विभाग के एचओडी डॉ. परमिंदर सिंह और वैज्ञानिक डॉ. अमन शर्मा के मार्गदर्शन में उन्होंने सात मरला जमीन में गेंदा फूल की खेती शुरू की। शुरुआती प्रयास सफल रहा और उन्हें अच्छा आर्थिक सहारा मिला। वर्तमान में अमनजीत एक कनाल जमीन में फूलों की खेती कर रही हैं।
धान-गेहूं की आमदनी के बराबर फूलों से कमा रही अमनजीत
उनके उगाए गए फूल बरेटा, बुढलाडा, मानसा, सुनाम, बठिंडा, जाखल और लुधियाना जैसे शहरों में भेजे जा रहे हैं। गेंदा फूल साल में तीन बार तोड़ा जाता है, जिससे करीब 40 हजार रुपये तक की बचत हो जाती है, जो एक एकड़ धान-गेहूं की आमदनी के बराबर मानी जाती है। अमनजीत बागवानी विभाग के लगातार संपर्क में हैं और विभाग की ओर से उन्हें समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी मिलता है।
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हाल ही में बारिश से फसल को नुकसान हुआ था, तब विभाग ने उनकी भरपूर मदद की। बुढलाडा के गुरु नानक कॉलेज से एमए पंजाबी के दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं अमनजीत बताती हैं कि पीजीडीसीए की फीस भी उन्होंने काफी संघर्ष के बाद भरी थी। आर्थिक दिक्कतों के कारण आगे की पढ़ाई का रास्ता भी बंद नजर आ रहा था, लेकिन खेती से मिली आमदनी ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया।
वे कहती हैं कि शादी कर विदेश जाने के बजाय उन्होंने अपने ही देश में स्वरोजगार को चुना और यही उनका सही फैसला साबित हुआ।
डीसी ने की सराहना
जिला उपायुक्त नवजोत कौर ने किसान मेले के दौरान अमनजीत कौर से मुलाकात कर उनकी हिम्मत और मेहनत की सराहना की। डीसी ने कहा कि कम जमीन में फूलों की खेती कर अमनजीत ने अपने परिवार के लिए आय का मजबूत साधन तैयार किया है। वे जिले के युवाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो विदेश जाने के बजाय अपने गांव में रहकर मेहनत और आत्मनिर्भरता का रास्ता अपना रही हैं।

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