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    छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या है कांग्रेस की इनसाइड स्टोरी आप भी जानिये

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Fri, 24 Aug 2018 07:30 AM (IST)

    आने वाला समय कांग्रेस और भाजपा समेत दूसरी पार्टियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि छत्तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान में चुनाव होने हैं।

    छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या है कांग्रेस की इनसाइड स्टोरी आप भी जानिये

    नई दिल्‍ली (जागरण स्‍पेशल)। आने वाला समय कांग्रेस और भाजपा समेत दूसरी पार्टियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि छत्तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान में चुनाव होने हैं। फिलहाल तीनों ही राज्‍यों में भाजपा की सरकार है। लेकिन इन तीनों राज्‍यों में चुनावी लड़ाई की कहानी बड़ी दिलचस्‍प हो रही है। कांग्रेस और भाजपा की तीनों जगहों पर सीधी लड़ाई है, लेकिन इसके बाद भी दूसरी और क्षेत्रीय पार्टियों को खारिज नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक विश्‍लेषक बार-बार इस बात को कहते रहे हैं कि भाजपा इन सभी चुनाव के लिए पहले से ही तैयारी कर चुकी है। इसके लिए जितना काम भाजपा ने जमीन पर किया है उतना किसी दूसरी पार्टी ने अब तक नहीं किया है। इसके अलावा कांग्रेस की यदि बात करें तो वह आज भी लड़ाई में रहते हुए लड़ाई से बाहर मानी जा रही है।

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    मतदाता के तीन वर्ग
    इस बाबत दैनिक जागरण से बात करते हुए राजनीतिक विश्‍लेषक प्रदीप सिंह ने कई तथ्‍यों पर रोशनी डाली। उनका कहना था कि मध्‍य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार को काफी समय हो चुका है, लिहाजा वहां पर सरकार के खिलाफ जनता का कुछ मनमुटाव जरूर हो सकता है। लेकिन इसको कांग्रेस अपने पक्ष में भुना पाएगी यह कहपाना फिलहाल काफी मुश्किल है। उनके मुताबिक मतदाताओं के तीन वर्ग होते हैं। पहला वर्ग जो पूरी तरह से सत्तापक्ष के साथ होता है, दूसरा वर्ग जो मानता है कि सरकार ने उतना काम नहीं किया जितना उसे करना चाहिए था लेकिन कुछ जरूर किया है, तीसरा वर्ग वह होता है जो सत्तापक्ष के खिलाफ होता है। विपक्ष में रही पार्टी के लिए यही सत्ता में पहुंचने की चाबी होता है, बशर्ते वह इसको सही तरीके से अपने पक्ष में भुना सके। वहीं इस वर्ग पर सत्तापक्ष की भी निगाह होती है। उसके लिए यह जरूरी होता है कि या तो वह इसको मनाकर अपने पक्ष में करे या फिर उसकी भरपाई करने के लिए दूसरों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करें।

    कैसी है कांग्रेस का अंदरुणी लड़ाई
    प्रदीप सिंह का साफतौर पर कहना है कि तीनों ही राज्‍यों में हमेशा से ही सीधी टक्‍कर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रही है। लिहाजा इन राज्‍यों में यदि भाजपा से नाराजगी की बात करें तो इसका फायदा केवल कांग्रेस को ही मिल सकता है। लेकिन यदि ऐसा भी नहीं होता है तो इसका अर्थ साफ है कि कांग्रेस भी लोगों की पसंद नहीं है। तीनों ही राज्‍यों की स्थिति कांग्रेस के लिहाज से काफी अलग है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि मध्‍य प्रदेश में कांग्रेस के सामने चुनौती ये है क्‍योंकि यहां पर उसके समक्ष तीन नेता हैं जो अपने को सीएम कैंडिडेट के तौर पर देखते हैं। इनमें ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह हैं। लेकिन इन तीनों में कमलनाथ पार्टी फिलहाल पार्टी की पसंद दिखाई दे रहे हैं। लेकिन समस्‍या ये है कि ज्‍योतिरादित्‍य की ही तरह वह भी अपनी छवि पूरे प्रदेश में नहीं बना सकें हैं। वहीं सिंधिया परिवार की पकड़ ग्‍वालियर से आगे नहीं है। ऐसे में दिग्विजय सिंह राज्‍य के सीएम भी रहे हैं और मौजूदा समय में वह नर्मदा यात्रा के जरिये लोगों से सीधे जुड़ भी रहे हैं। कुल मिलाकर वह जनता के काफी करीब हैं। वह इस पाजीशन में जरूर हैं कि कांग्रेस को नुकसान दिला सकें।

    कांग्रेस की बसपा से आस
    कांग्रेस की अंदरुणी लड़ाई के बीच यह देखना बेहद जरूरी है कि क्‍या पार्टी एकजुट होकर इन मध्‍य प्रदेश में चुनाव लड़ पाएगी। कोंग्रेस यहां की चुनावी लड़ाई के लिए बसपा से गठबंधन पर भी आस लगाए हुए है। लेकिन बसपा ने फिलहाल इसको हरी झंडी नहीं दी है। वह चाहती है कि गठबंधन तीनों राज्‍यों में समान रूप से हो लेकिन कांग्रेस सिर्फ छत्तीसगढ़ और मध्‍य प्रदेश में ही ऐसा चाहती है। इसके अलावा राजस्‍थान कांग्रेस बसपा से गठबंधन नहीं चाहती है। मध्‍य प्रदेश की ही यदि बात करें तो इसमें एक दिक्‍कत ये भी आ रही है कि बसपा यहां पर 50 सीटें मांग रही है जिसपर कांग्रेस तैयार नहीं है। कांग्रेस के सामने इसी तरह की समस्‍या छत्तीसगढ़ में भी है। यहां पर कांग्रेस अजीत जोगी से गठबंधन करने की फिराक में है। अजीत जोगी की जहां तक बात है तो वह यहां पर इस स्थिति में जरूर हैं कि वह कांग्रेस का खेल खराब कर सकें। उनका साफतौर पर ये भी कहना था‍ कि यदि कांग्रेस यहां पर बसपा समेत अजीत जोगी की पार्टी से गठजोड़ करने में सफल हो जाती है तो भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में आ सकती है। लेकिन फिलहाल ये गठबंधन दूर की ही कौड़ी है। हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है जिसके दम पर वह अकेले आगे बढ़ सके।

    राजस्‍थान का चुनावी इतिहास
    जहां तक राजस्‍थान की बात है तो वहां का चुनावी इतिहास काफी कुछ कहता रहा है। यहां पर हर पांच वर्षों में सत्तारूढ़ दल बदलता आया है। लेकिन कांग्रेस के लिए भी यहां पर अंदरुणी लड़ाई सचिन पायलट और अशोक गहलौत के बीच में साफतौर पर दिखाई दे रही है। गहलौत यहां के चर्चित और कांग्रेस के बड़े नेता है वहीं पायलट राहुल गांधी की पसंद बताए जाते हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस को लड़ाई में वापस आना है तो उसे गहलौत को ही आगे रखना फायदे का सौदा हो सकता है। लेकिन यदि यह टकराव जारी रहा और कांग्रेस ने चुनाव पूर्व सीएम कैंडिडेट की घोषणा नहीं की तो यहां पर कांग्रेस का खेल बिगड़ सकता है।

    कांग्रेस के लिए कितना आसान है चुनावी रण
    तीनों राज्‍यों में यदि कांग्रेस की लड़ाई की बात करें तो उसके लिए सबसे माकूल स्थिति राजस्‍थान में है फिर छत्तीसगढ़ में है। लेकिन मध्‍य प्रदेश में कांग्रेस के लिए सत्ता में आना पहले की तरह आज भी मुश्किल है। इस बार के चुनाव में यह हो सकता है कि सत्ता विरोधी लहर के चलते वह कुछ सीट अधिक पा जाए, लेकिन सत्ता पर काबिज होना उसके लिए अब भी दूर की कौड़ी ही है। वहीं छत्तीसगढ़ में वहां होने वाली त्रिकोणीय लड़ाई भाजपा के लिए फायदेमंद होगी। कांग्रेस के लिए इन तीनों चुनावों की ही चुनौती नहीं है बल्कि आने वाले लोकसभा चुनाव भी उसके सामने बड़ी चुनौती है। यदि इन तीनों चुनाव में कांग्रेस का दम नहीं दिखाई देता है तो लोकसभा चुनाव की नैया पार करना उसके लिए मु‍श्किल हो जाएगा। वहीं कांग्रेस की अंदरुणी लड़ाई का प्रभाव भी लोकसभा चुनाव पर जरूर दिखाई देगा।

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