पानीपत/करनाल, [पवन शर्मा]। आयुर्वेद में कहा गया है - निर्गुडति शरीरं रक्षति रोगेभ्य तस्माद् निर्गुण्डी, मतलब है जो शरीर की रोगों से रक्षा करे, वह निरगुंडी है। अब यही निरगुंडी मवेशियों के लिए संजीवनी बन रही है। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआइ) ने राष्ट्रीय नवप्रर्वतन प्रतिष्ठान (एनआइएफ) के साथ मिलकर ऐसा देसी फार्मूला ढूंढ निकाला है, जो भैंस या गाय समेत सभी मवेशियों को तमाम खतरनाक बाह्र परजीवियों (चिंचड़ी या किलनी और जूं) से बचाएगा। ये परजीवी इतने खतरनाक होते हैं कि हर साल भैंस के तीन महीने तक के कुल बच्चों में से करीब 33 फीसद इन्हीं के प्रकोप से दम तोड़ देते हैं। जो बचते हैं, उनका विकास ताउम्र बेहद धीमा होता है। 

करनाल स्थित एनडीआरआइ में चल रहे इस प्रोजेक्ट को 'फार्मर पाटिसिपेटरी एसेसमेंट ऑफ कोस्ट इफेक्टिव सॉल्यूशन फॉर मैनेजमेंट ऑफ टिक्स एंड माइट्स इन डेयरी एनिमल: एन एक्शन इन हरियाणा' शीर्षक दिया गया है। प्रोजेक्ट इसलिए शुरू हुआ क्योंकि ज्यादातर पशुपालक पशुओं में दाद, खुजली और जूं होने पर ध्यान नहीं देते। इससे उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ता है। कई बार परजीवियों की वजह से पशु तनाव में चला जाता है, जिसका सीधा असर दूध उत्पादन पर पड़ता है। किलनियों से पशुओं में लाइम रोग, क्यू ज्वर और बबेसिओसिस जैसी बीमारियां भी पनपती हैं। ये कई जेनेटिक रोगों के वैक्टर के रूप में मच्छरों के बाद दूसरे स्थान पर हैं। इनके प्रकोप से पशु उत्पादकता की लक्ष्यपूर्ति लगातार बाधित हो रहा है। 

एनडीआरआइ ने गुजरात के राष्ट्रीय नवप्रर्वतन प्रतिष्ठान (एनआइएफ) के अनुदान से यह प्रोजेक्ट शुरू किया है। युवा विज्ञानी प्रिया शर्मा व कार्तिकेय पटेल ने बताया कि प्रधान विज्ञानी डॉ. के पोन्नुशामी की अगुवाई में प्रोजेक्ट के तहत परजीवियों के हमले से बचाने के लिए निरगुंडी के साथ नीम के पौधे की पत्तियां मिलाकर हर्बल दवा तैयार की गई है। 

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कैसे बनती है दवा

ढाई किलो नीम की हरी पत्तियों को चार लीटर पानी व एक किलो निरगुंडी की हरी पत्तियों को दो लीटर पानी में उबालकर सामान्य तापमान पर 12 घंटे रखा जाता है। फिर इसे अलग-अलग छानने पर 2.100 लीटर नीम व एक लीटर निरगुंडी का पानी मिलता है। अब 300 एमएल नीम पत्ती के पानी व 100 एमएल निरगुंडी के पानी में 3.600 लीटर साफ पानी मिलाया जाता है। इससे चार लीटर दवा बनती है। पांच पशुओं के उपचार में करीब 28 लीटर दवा लगती है, जिस पर बमुश्किल 100 रुपये खर्च आता है।

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कैसे करें इस्तेमाल 

इस दवा को तीन दिन तक सुबह-शाम पशुओं के शरीर पर साफ कपड़े से लगाते हैं। स्प्रे भी किया जा सकता है। पशु के अलावा फर्श व दीवार की दरारों में भी दवा का छिड़काव करना चाहिए ताकि ङ्क्षचचड़ी या किलनी और जूं सरीखे परजीवियों का प्रकोप न हो। 

मनुष्यों के लिए भी उपयोगी

हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले निरगुंडी को श्रेष्ठ दर्द निवारकों में से एक माना जाता है। दर्द दूर करने के लिए इसकी पत्तियों का काढ़ा बनाया जाता है। निरगुंडी में कैस्टकीन और आमसोओरमंटीन नामक रासायनिक तत्व मिलता है। गठिया, साइट्रिका में इसका उपयोग होता है। आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा प्रणाली में निरगुंडी के कई उपयोग हैं। निरगुंडी का पौधा छह से 12 फिट तक ऊंचा होता है। पत्तियों में हल्के कांटे होते हैं। मध्य हिमालय में इसके पौधे मिल जाते हैं। इसके लेप से गांठ गायब हो जाती है। 

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Posted By: Anurag Shukla

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