पानीपत/करनाल, जेएनएन। हिसार के सात रोड खास गांव के नसीब और उनकी देसी गाय शांति का जवाब नहीं। 16 बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कार-दर-पुरस्कार हासिल कर चुकी शांति ने करनाल में भी सफलता का परचम बखूबी लहराया। यहां आयोजित राष्ट्रीय पशु मेले में उसने दुग्ध उत्पादन के साथ सौंदर्य स्पर्धा में भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। कई रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी शांति को देखने के लिए मेले में लोगों का तांता लगातार लगा रहा। 

हिसार के सात रोड स्थित झोरड़ डेयरी फार्म के मालिक नसीब ने बताया कि शांति सही मायने में देसी नस्ल की ऐसी गाय है, जिसे अनमोल कहा जा सकता है। 2014 से यह गाय उनके पास है। इसकी कई विशेषताएं हैं। मसलन, जहां इसके चारों थन समान और उन्नत होने के कारण इससे उत्पादित ए-टू क्वालिटी का दूध स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभप्रद है वहीं, उत्पादन क्षमता मे भी इसका कोई सानी नहीं है। यह 19 लीटर सात सौ ग्राम दूध देने का रिकॉर्ड बना चुकी है। 

अब तक 16 बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में कामयाबी का परचम लहरा चुकी शांति 2014 से लगातार कमाल दिखा रही है। इस अवधि में उसने तीन-तीन बार झज्जर और करनाल, पटियाला में दो बार, मुक्तसर में दो बार, कुरुक्षेत्र में एक बार, हिसार में एक बार, जींद में एक बार और उत्तर प्रदेश के मेरठ में दो बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पुरस्कार हासिल किए हैं। अब 16वां पुरस्कार करनाल में आयोजित राष्ट्रीय मेले में जीता है, जहां इसे दुग्ध उत्पादन के साथ सौंदर्य स्पर्धा में भी पहला स्थान हासिल हुआ। 

देसी घी भी खुराक में शामिल 

नसीब और उनके सहयोगी अमित ने बताया कि देसी गाय होने के बावजूद शांति में गजब की दुग्ध उत्पादन और रोग प्रतिरोधक क्षमता है। वह इसकी खूबियों से अ'छी तरह वाकिफ हैं, इसीलिए हमेशा इसका भरपूर ख्याल रखते हैं। सर्दी हो या गर्मी, शांति हर मौसम की मार बखूबी सहती है। इसकी खुराक पर भी वे बहुत बारीकी से ध्यान देते हैं। इसलिए, उसे खल, बिनौला, चूरी, बरसीन और गुड़ के अलावा नियमित रूप से हर सप्ताह देसी घी भी पिलाया जाता है। गर्मी के मौसम में मिट्टी का लेप करते हैं, तो सर्दी से बचाने के लिए गद्दों का इंतजाम किया जाता है। 

मूंछें हों तो....

नसीब ने कई वर्ष सेना और बीएसएनएल में भी काम किया। अच्‍छी-खासी रोबदार मूंछें रखने वाले नसीब बताते हैं कि उन्हें एक समय मूंछ के रखरखाव के लिए बाकायदा विशेष भत्ते के रूप में सात सौ रुपये मिलते थे। हालांकि अब यह भत्ता तो नहीं मिलता, लेकिन मूंछें रखने में नसीब कोई कमी नहीं छोड़ते। इनसे अपने गहरे लगाव के कारण वह इनकी बहुत एकाग्रता से देखभाल करते हैं। 

इसलिए रखा यह नाम 

अपनी गाय का नाम शांति ही क्यों रखा? यह पूछने पर नसीब बताते हैं कि दरअसल यह गाय शुरुआत से ही बेहद शांत रहती है, इसीलिए ब'चों से लेकर बड़े तक सब इसके पास आराम से चले जाते हैं। यही देखकर उन्होंने इसका नाम शांति रख दिया। उन्होंने बताया कि वह इसका दूध कहीं नहीं बेचते। घर-परिवार के लोगों में ही इसकी अ'छी खपत हो जाती है। हां, गांव के लोग या मेहमानों को दूध पिलाने में कभी कोई गुरेज नहीं करते।

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करनाल के दादूपुर के प्रदीप की गाय 58.86 किलो दूध देकर प्रथम रही

राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय डेयरी मेले का सोमवार को समापन हुआ। मेले में सौंदर्य, दुग्ध उत्पादन व दुग्ध दोहन सहित 10 श्रेणियों में प्रतियोगिताएं हुईं। उच्च दुग्ध उत्पादन की एचएफ संकर नस्ल की श्रेणी में दादूपुर करनाल के प्रदीप की गाय ने 58.86 किलो दूध देकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। बारानी $खालसा के किसान विजेंदर चौहान की गाय 58.17 किलो दूध देकर द्वितीय व दादुपुर के प्रदीप की गाय 57.65 किलो दूध देकर तृतीय रही। क्रॉस ब्रीड स्पर्धा में अंबाला के किसान जसदीप ङ्क्षसह की गाय 26.97 किलो दूध देकर अव्वल रही। देसी गाय की दुग्ध उत्पादन स्पर्धा में तरावड़ी के रामसिंह की गाय 21.31 किलो दूध देकर प्रथम, नरेश की गाय 15.81 किलो दूध देकर द्वितीय और करनाल के रामपाल की गाय 15.75 किलो दूध देकर तृतीय रही। मुर्राह भैंस दुग्ध उत्पादन स्पर्धा में असन्ध के रणदीप की भैंस 21.77 किलो दूध देकर पहले और मुंध गांव के कुलदीप की भैंस द्वितीय और कैथल के राकेश की भैंस तृतीय रही।

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Posted By: Anurag Shukla

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