पटना [विकास चंद्र पाण्डेय]। बिहार में लोकसभा चुनाव के दूसरे दौर की लड़ाई हकीकत में दोनों गठबंधनों (राजग और विपक्षी दलों के महागठबंधन) के लिए वजूद की लड़ाई है। दूसरे दौर में 18 अप्रैल को मतदान होना है। इस दौर के पांच संसदीय क्षेत्रों (भागलपुर, बांका, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार) में से चार अभी विपक्षी महागठबंधन के पाले में हैं। पूर्णिया राजग के खाते में है। यह पिछली लड़ाई यानी 2014 के चुनाव का प्रतिफल रहा। तब भाजपा और जदयू एक साथ नहीं थे। कई इलाकों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी थी, जैसे कि इस बार बांका और किशनगंज में बनी है। तब वोटों के बंटवारे से जीत की राह आसान हो गई थी।

इस बार का सियासी समीकरण कुछ बदला हुआ सा है, लेकिन कुनबे वही हैं। समीकरण में बदलाव की एक वजह दलीय रणनीति में तब्दीली भी है। इस बदलाव से प्रभावित होने वाले बहरहाल भितरघाती बन गए हैं। इसी के साथ इलाके की फितरत में जाति-जमात का एक पेच भी है। ऐसे में सबकी कोशिश एक-दूसरे के कुनबे में सेंधमारी की है। यही कारण है कि उम्मीदवारी तय करने में दोनों गठबंधनों ने काफी मशक्कत की। जहां जाति और जमात का जोर चरम पर है वहां दोनों ओर से एक ही बिरादरी के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।

भागलपुर, बांका और किशनगंज इसके उदाहरण हैं। किशनगंज के अलावा पूर्णिया और कटिहार में महागठबंधन की ओर से कांग्रेस की दावेदारी है। बाकी दो सीटों पर राजद के उम्मीदवार। कांग्रेस नौ सीटों पर चुनाव लड़ रही है। यानी कि उसके एक तिहाई उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला इसी चरण में हो जाना है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के लिए भी यह दौर निर्णायक होगा, क्योंकि पांचों सीटों पर उन्हीं के उम्मीदवार जोर आजमाइश कर रहे हैं। शुरुआत में दो संसदीय क्षेत्रों में भाजपा के बागियों ने मुश्किलें खड़ी की थीं। उनमें से एक अशोक अग्रवाल तो कटिहार के मैदान से हट गए, लेकिन बांका में पुतुल कुमारी डटी हुई हैं।

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 बांका में जाति के दरवाजे से गुजरती है जीत की राह :

बांका में इस बार की लड़ाई पिछली बार से भी कुछ ज्यादा कड़ी है। कुल 20 उम्मीदवारों में से तीन एक ही बिरादरी के हैं। जदयू से गिरधारी यादव अभी विधायक हैं। वे संसद में दो बार बांका का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं। राजद के निवर्तमान सांसद जय प्रकाश नारायण यादव एक बार फिर मैदान में हैं। तीसरे उम्मीदवार पूर्व विधायक पप्पू यादव हैं, जो झारखंड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर पेच लड़ा रहे हैं। ऐसे में कुनबों में सेंधमारी की हकीकत समझी जा सकती है। जदयू और राजद के बीच के मुकाबले में पुतुल कुमारी तीसरा कोण बना रही हैं।

पिछली बार वे जयप्रकाश नारायण यादव से महज पांच हजार वोटों से पिछड़ गई थीं। उससे पहले वे बांका का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं। इलाके में दिग्विजय सिंह की अपनी साख है और वे निर्दलीय जीत का डंका भी बजा चुके हैं। पुतुल इतिहास दोहराने की जिद पाले हुए हैं, जबकि गिरधारी और जयप्रकाश बांका की समाजवादी तासीर के बिनाह पर अपने लिए हसरत पाले हुए।

भागलपुर में मुकाबला आरपार का:

भागलपुर में मुकाबला आरपार का कहने के लिए यहां लड़ाके नौ हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला राजद के निवर्तमान सांसद शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल और जदयू उम्मीदवार अजय कुमार मंडल के बीच है। संयोग कहिए या सोची-समझी रणनीति कि दोनों एक ही बिरादरी के हैं। जाहिर है कि कैडर वोट पर ही जीत-हार का दारोमदार होगा। गिनती के वोट भी इधर से उधर हुए तो बना- बनाया खेल बिगड़ जाएगा। पहले माना जा रहा था कि यह सीट भाजपा के खाते में जाएगी।

यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके शाहनवाज हुसैन उम्मीद भी पाले हुए थे, लेकिन दावेदारी जदयू की पक्की हुई। भाजपा को अजय मंडल का बेड़ा पार लगाने की जिम्मेदारी मिली। पिछली बार मिले जदयू और भाजपा के वोटों को जोड़ दीजिए तो उम्मीद कुलांचे भरने लगेगी, लेकिन यहां के मैदान में विरोधी को कमतर आंकने की भूल करने वाले पछताते भी रहे हैं।

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पूर्णिया की लड़ाई:

पूर्णिया में कुल 16 प्रत्याशियों में से 13 निर्दलीय हैं। कोई शक नहीं कि उनमें अधिसंख्य डमी उम्मीदवार होंगे। पिछली बार यहां कांग्रेस के अमर नाथ तिवारी तीसरे स्थान पर रहे थे। जदयू के संतोष कुमार कुशवाहा जितने मतों से विजयी घोषित हुए, उससे अधिक मत तिवारी ने झटक लिए। भाजपा के उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह हैट्रिक लगाने से चूक गए। पप्पू इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार हैं और जदयू के संतोष के साथ भाजपा है। मुद्दों की बात करें तो राष्ट्रवाद और विकास के साथ जातीय अस्मिता के मसले उछाले जा रहे हैं।

कटिहार में मोदी मुद्दा हैं और प्रतिस्पर्द्धा गलाकाट

कटिहार का सियासी मिजाज भी अड़ोस-पड़ोस से मिलता-जुलता हुआ है। वोटों के बिखराव से सुनिश्चित हुई जीत के उदाहरण हैं तो गलाकाट मुकाबले के कई रिकॉर्ड भी। खुद तारिक अनवर इसके गवाह हैं, जो इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। पिछली बार वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर विजयी रहे थे। जदयू उम्मीदवार ने भाजपा की राह रोक दी थी। उससे पहले तारिक भाजपा से शिकस्त भी खा चुके हैं। इस बार यहां विधान पार्षद अशोक अग्रवाल को मैदान में उतरने से रोकने के लिए भाजपा को काफी मशक्कत करनी पड़ी। उसके बाद जदयू उम्मीदवार दुलालचंद गोस्वामी कुछ निश्चिंत हुए। अब मैदान में आरपार का मुकाबला है। प्रत्याशियों की अपील में यह मुकाबला मोदी बनाम अन्य हो गया है। तारिक अनवर एक शख्सियत हैं तो दुलालचंद गोस्वामी को भी राज्य सरकार में मंत्री रहने का अनुभव है। दामन पर कोई दाग भी नहीं। इन दोनों के अलावा बाकी सात उम्मीदवारों को जमानत बचाने का उपाय ढूंढ़ना है।

किशनगंज बिरादरी से बाहर सोचता ही नहीं

किशनगंज की एक विशेषता यह कि बिरादरी से बाहर का विचार ही नहीं आता। पार्टियां भी इसका पूरा ख्याल रखती हैं। इस बार तो विशेषकर ऐसे ही हालात हैं। अब तक के चुनावों में महज एक बार किसी हिंदू (लखन लाल कपूर) को प्रतिनिधित्व का मौका मिला है। इसी संयोग-दुर्योग के कारण दोनों गठबंधनों ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। महागठबंधन में कांग्रेस से मो. जावेद आजाद और राजग की ओर से जदयू से महमूद अशरफ। दोनों के बीच अख्तरुल ईमान तीसरा कोण हैं। पिछली बार वे जदयू के उम्मीदवार थे। ऐन चुनाव के बीच रण से हट गए थे। इस बार ओवैसी की पार्टी से दांव भिड़ाए हुए हैं। इस त्रिकोण में कैडर वोटों की पूछ बढ़ गई है। किशनगंज में गोलबंदी के लिए जात-जमात के फैसले आखिरी रात में होते हैं। ऐसे में उम्मीदवारों की बेचारगी समझी जा सकती है। वैसे कहने के लिए मैदान में 14 उम्मीदवार हैं, लेकिन दौड़-धूप यही तीन कर रहे हैं।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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