रेखा एक अनकही कहानी में रहस्य बनी सिंदूर की रेखा
लेखक यासिर उस्मान ने रेखा से जुड़े पहलुओं को 'रेखा एक अनकही कहानी' किताब में कलमबंद करने का फैसला किया। जो जागरण संवादी में सब कुछ सामने आया। ...और पढ़ें

लखनऊ ( रूमा सिन्हा)। रेखा जिसे रहस्यों की रेखा कहना गलत न होगा। वजह यह है कि रेखा हमेशा से एक रहस्यमयी शख्सियत रही हैं जिनके बारे में जितनी भी बातें की जाएं कम हैं। हालांकि खुद रेखा ने ही अपने तमाम इंटरव्यू में उन तमाम सवालों के बेबाकी से जवाब दिए हैं जिनके बारे में लोग हमेशा से जानना चाहते हैं। यही वजह थी कि लेखक यासिर उस्मान ने रेखा से जुड़े तमाम पहलुओं को 'रेखा एक अनकही कहानी' किताब में कलमबंद करने का फैसला किया।
कविता और साहित्य से लोगों को कनेक्ट करने की जरूरत
किताब में रेखा से जुड़े जिन पहलुओं का जिक्र किया गया है उस पर संवादी कार्यक्रम में चर्चा करते हुए लेखक ने बताया कि दरअसल, रेखा जिंदगी में वह पाना चाहती थीं जो उनकी मां को नहीं मिल सका था, लेकिन ऐसा हो न सका। फिल्मकार मुजफ्फर अली ने जब उमराव जान के लिए रेखा का चयन किया तो उनसे यह पूछा गया कि शबाना, स्मिता जैसी अभिनेत्रियों को छोड़ रेखा को चुनने की वजह। यासिर ने बताया कि मुजफ्फर अली ने कहा कि रेखा की संजीदा फोटो में आंखों में ऐसी कैफियत नजर आई जिससे यह तय कर लिया कि उमराव जान का किरदार वह बखूबी निभा सकेंगी। फिल्म के गाने जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने गीत मानों उनके जीवन का अक्स हो।
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विनोद अनुपम ने रेखा पर संवाद करते हुए लेखक से पूछा कि रेखा को किताब के लिए चुनने की प्रमुख वजह क्या रही? इस पर यासिर ने कहा कि उन्हें ग्लैमर के लिए जाना जाता है। हकीकत यह है कि वह बहुत अकेली हैं। महज 13 वर्ष की उम्र में किताबें छोड़ मुंबई आकर फिल्मों में काम करना पड़ा। यहां तक कि वह ङ्क्षहदी तक नहीं जानती थीं। लेखक ने उनके अतीत में झांकने के लिए पुराने इंटरव्यू व उनके सह कलाकार व नजदीक रहे लोगों से बातचीत का सहारा लिया। यासिर के अनुसार उन्हें ज्यादा मदद मिली तो खुद रेखा द्वारा दिए गए 1969 से 1979 के बीच दिए गए इंटरव्यू से। वजह यह कि रेखा ने हर बात को फिर चाहे अमिताभ से उनके रिश्ते ही क्यों न हो हमेशा बेबाकी से बात रखी। अनुपम ने सवाल किया कि किताब में बतौर अभिनेत्री रेखा को कम छुआ गया है। इस पर यासिर ने बड़ी साफगोई से कहा कि वह उन्हें बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर नहीं देखते थे। उनकी करीब 200 फिल्मों में से भले ही 150 से 175 में लीड रोल किया हो, लेकिन बतौर अभिनेत्री सफर 1978 में घर फिल्म से शुरू हुआ। यासिर ने कहा कि रेखा की बात होती है तो अमिताभ खुद-ब-खुद आ जाते हैं। अमिताभ मानें या मानें, लेकिन रेखा इसे खुलेआम स्वीकार करती रहीं हैं कि अमिताभ का उनके जीवन में गहरा प्रभाव रहा है। उमराव जान के निदेशक मुजफ्फर अली स्वीकारते हैं कि शूटिंग में अमिताभ सेट पर अक्सर आते थे और रेखा उन्हें शौहर की तरह 'वो नहीं आए' कह कर संबोधित करती थीं। रेखा तब टूटी जब एक्सीडेंट में घायल अमिताभ से उन्हें अस्पताल में मिलने नहीं दिया गया।
संवाद करते हुए विनोद अनुपम ने यासिर, विनोद मेहरा, किरण कुमार व मुकेश अग्रवाल बिजनेसमैन से रेखा के रिश्ते की हकीकत के बारे में सवाल किया। इस पर लेखक ने कहा कि रेखा खुले दिमाग की थीं। उनके रिश्तों के बाबत खूब लिखा गया। मुकेश से उन्होंने शादी का फैसला इसीलिए लिया था कि वह सबकुछ छोड़ दिल्ली आकर बसना चाहती थीं, लेकिन उन्हें इससे भी बदनामी ही हाथ लगी। रेखा सिंदूर लगाती है, वह फैशन के नाम पर सिंदूर लगाने की बात कहती हैं लेकिन जब भी सामने आती हैं तो रहस्यमयी रेखा ही बनी रहती हैं।

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