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    कविता और साहित्य से लोगों को कनेक्ट करने की जरूरत

    By Nawal MishraEdited By:
    Updated: Sat, 08 Oct 2016 11:50 PM (IST)

    भावनाएं झलकें। समाज की चिंता हो। परिवेश नजर आए। इस सब बातों में कविता से लोगों को कनेक्ट करने की बात भी उठी। कविता लिखने से पहले पढऩे और समझने जरूरत स ...और पढ़ें

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    लखनऊ ( जेएनएन)। कविता में भावनाएं और लोक कल्याण झलकें। समाज की चिंता हो। परिवेश नजर आए। कवि शब्द और अक्षर ज्ञान से भरा और जल्दबाजी की सफलता से दूर हो। इस सब बातों में कविता से लोगों को कनेक्ट करने की बात भी उठी। कविता लिखने से पहले पढऩे और समझने जरूरर समझी गई।

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    कविता में भावनाएं होनी चाहिए

    रचनाकार कृष्ण कल्पित ने कहा कि युवा कवियों को शब्दों के जाल में नहीं फंसना चाहिए। कविता लिखने से पहले पढऩा और समझना बहुत जरूरी है। कवि जो भी लिखे पहले उसे अपने आस-पास के माहौल में ढाले। कविताओं में भावना होनी चाहिए, जो भी लिखे दिल से लिखे। कविता जिंदगी में ऑक्सीजन की तरह है। आज के इस संवादी के कार्यक्रम में युवाओं को कविता पढ़ते देख बहुत अच्छा लगा। कुछ कविताओं में थोड़ी कमियां थीं, लेकिन उनके जज्बे को देख कर बहुत अच्छा लगा। इस कार्यक्रम से युवा कवियों को बहुत सीखने को मिलेगा। इस तरह के कार्यक्रम आयोजन होने चाहिए, जिससे युवाओं को साहित्य और कला की जानकारी हो सके।

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    युवा पीढ़ी को समझकर लिखना चाहिए

    गीतकार प्रशांत इंगोले ने कहा कि कविता लिखने के लिए अक्षर का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। बिना अक्षर तज्ञान आप अच्छी कविता नहीं लिख सकते। आज कविता का दायरा कम हो गया है, जिसका कारण कविता में भावनाओं की कमी है। अगर आप अपनी कविता से किसी को कनेक्ट नहीं कर पा रहे हैं, तो यकीनन आपकी कविता में कुछ कमी है। आज के युवा बहुत जल्दी में हैं, वह जल्दी से सफलता पाना चाहते हैं। युवाओं को ठहराव के साथ लिखना चाहिए। जहां तक मेरा मानना है, मुझे लगता है कि कविता में स्क्रीन प्ले होना चाहिए। जागरण के इस कार्यक्रम संवादी में युवाओं के लिए बेहतर अवसर हैं, यहां पर कला साहित्य, रंगमंच, सिनेमा आदि के क्षेत्र की जानकारी युवाओं के भविष्य के लिए लाभदायक हैं। मैं जागरण को संवादी आयोजित करने के लिए बधाई देता हूं।

    दर्शक टीवी में अच्छा कंटेंट नहीं देख रहे

    वरिष्ठ लेखक व निर्माता जामा हबीब ने कहा कि अगर बात टेलीविजन की हो तो पिछले लगभग 10-12 वर्षों से दर्शक अच्छा कंटेंट नहीं देख रहे हैं। या यूं कहें कि वह अच्छा कंटेंट देखना नहीं चाहते हैं। टीवी में जो भी दिखाया जाता है, कहीं न कहीं वह समाज से प्रेरित होता है। समाज में जो चलता है, वह टीवी पर दिखता है। ऐसे में दर्शक और लेखक दोनों को अपने स्तर से काम करना होगा। पहला लेखक अच्छा लिखे, दूसरा दर्शक जो उसे पसंद करे। जागरण के संवादी कार्यक्रम में काफी रोचक बातें सामने आईं है, जिससे हमारे टीवी में काफी काम आएगा। इस तरह का आयोजन होना चाहिए, और इसमें कला साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को हिस्सा लेना चाहिए। साहित्य से ही इंसान का व्यक्तित्व निखरता है।

    कम शब्दों में बड़ी बात कहनी चाहिए

    निर्देशक अरविंद बब्बल ने कहा कि टेलीविजन का क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा है। टीवी में समाज को ध्यान में रखकर कंटेंट तैयार किया जा रहा है। आज का बाजारवाद टेलीविजन को कंट्रोल कर रहा है, जिसमें साहित्य का दायरा कम हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि टेलीविजन से साहित्य कम हो गया है। लेकिन आज टेलीविजन में इतना काम बढ़ गया है कि कंटेंट में ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अब लेखकों को भी समझना चाहिए कि कुछ अलग करें, ताकि वह दर्शकों को कुछ अच्छा लिखकर दे सकें। आज के युवा लेखकों को चाहिए कि कम शब्दों में ज्यादा बात कहें, इससे समय और गुणवत्ता दोनों पर पकड़ बनाई जा सकती है। जागरण के इस संवादी कार्यक्रम में काफी रोचक बातें सामने आई हैं, जो हमारे और अन्य लेखकों के लिए काफी लाभकारी है।

    अच्छा साहित्य जीवन को सरल बनाता है

    वरिष्ठ कथाकार ऋषिकेश सुलभ ने बतायाकि साहित्य हमेशा से ही समाज को बनाने में काम आता है। अच्छा साहित्य मनुष्य के जीवन को सरल बनाता है। आज के समय में टेलीविजन में साहित्य को बहुत तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। कहानी को जबरदस्ती खींचना टीवी का चलन हो गया है। टीवी के लेखकों को इस पर विचार करना चाहिए। साहित्य कभी भी सिनेमा विरोधी नहीं हुआ है। साहित्य को ध्यान में रखकर अगर टीवी में कुछ दिखाया जाएगा, तो जरूर दर्शकों को भी अच्छी चीज देखने को मिलेगी। आज संवादी के इस कार्यक्रम में साहित्य और संस्कृति की विभिन्न विधाओं से जुड़े लोगों को सुनकर और उनसे चर्चा कर बहुत अच्छा लगा है। जागरण को इसके लिए धन्यवाद देना चाहता हूं।

    भावनाओं के अभिव्यक्ति कविता

    अंतर्मन की वेदना, दिल की आवाज और जीवन के प्रसंग को भावनात्मक लगाव के साथ अभिव्यक्त करने की कला। कविता कुछ और नहीं बल्कि आसपास के वातावरण को समझकर उसे शब्दों का रूप देने की विद्या है। साहित्य में रुचि और पढऩे की ललक इंसान को काव्य रस से सराबोर करती है तो रोचक ढंग से की गई प्रस्तुति कविता के भाव को दर्शाती है। संवादी में आने वाले कल की कविता कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवाओं ने प्रतिभाग किया। देशप्रेम, नारी शक्ति, भ्रष्टाचार, एकता व मेरा सपना समेत अनेकों विषयों पर उभरते हुए कवियों ने प्रस्तुति दी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। कारण, सभागार में हिंदी के महत्वूपर्ण कवियों में से एक कृष्ण कल्पित तो दूसरे बाजीराव मस्तानी फिल्म में गीत लिखने वाले प्रशांत इंगोले कविताओं के चयन के लिए मौजूद थे। एक के बाद एक कुल 20 कलाकारों ने स्वरचित कविताओं का पाठ किया तो सभागार तालियों से गूंज उठा।

    अच्छे लेखन का ज्ञान

    युवाओं का प्रोत्साहन करते हुए कृष्ण कल्पित ने उनकी सराहना की तो अच्छे लेखन का ज्ञान भी दिया। उन्होंने कहा कि किसी एक विषय पर कविता लिखने के लिए बच्चों को बाध्य नहीं किया जा सकता। आने वाले कल की कविता विषय का मतलब शीर्षक नहीं है। लेखन की राह आसान नहीं। अपने आसपास देखिए। कविताएं अपनापन दर्शाती हैं। हम किस शहर के हैं, कहां रहते हैं, क्या परिस्थिति है इसकी झलक कविताओं में दिखनी चाहिए। कृष्ण कल्पित ने बच्चों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि किसी के कहने पर नहीं बल्कि अपने दिल की बात सुनकर कविताएं लिखिए। सही मायने में लिखने से ज्यादा पढ़कर लेखन की ओर अग्रसर हुआ जाए तो राह आसान हो जाती है। प्रशांत इंगोले ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि आप सबमें आत्मविश्वास भरा है। कुछ भी लिखने से पहले दिल से विचार करना बेहद जरूरी है। विषय से न भटकें और शब्दों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाएं। प्रशांत ने श्रोताओं की मांग पर 'अजनबी से किसी कल रात मुलाकात हुई मेरी' और 'ब्यूटीफूल है तू, है सनशाइन तेरा नाम' कविता सुनाई।

    साझा की दिल की बात

    प्रशांत ने कहा कि कविता अचानक से मन में उभर कर आती है। उन्होंने अपने दिल की बात साझा करते हुए कहा कि मैं फ्लाइट में आ रहा था। मुझे एक एयर होस्टेस मिली, जिसका नाम मुझे बेहद पसंद आया। मैंने उनके नाम का मतलब पूछा और इसी बीच अचानक मेरे मन में चंद लाइनें उभरकर आ गईं। मैंने उसे फौरन डायरी में नोट किया।