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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 12, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

अस्पताल से भगाई गई प्रसूता ने सड़क पर जन्मे जुड़वा बच्चे

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Published: Tue, 12 Aug 2014 01:19 PM (IST)Updated: Tue, 12 Aug 2014 01:23 PM (IST)

उत्तर प्रदेश सरकार भले ही सूबे की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का दावा करे लेकिन बांदा की एक घटना से ...और पढ़ें

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार भले ही सूबे की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का दावा करे लेकिन बांदा की एक घटना से सारी हकीकत सामने आ जाती है। यहां प्रसूता को अस्पताल से भगा दिया जाता है। इसके बाद सड़क पर तबीयत खराब होने पर उसको एंबुलेंस नहीं मिलती। मजबूरी में महिला सड़क पर जुड़वा बच्चों को जन्म देती है। जिनमें से एक की तो उसी दिन यानी रविवार को और दूसरे की सोमवार को मौत हो गई।

बुंदेलखंड की गरीबी और लाचारी की कहानी कहती बस स्टैंड पर एक दलित महिला के प्रसव की घटना का कल दुखद अंत हुआ। जुड़वा बच्चों को जन्म देने वाली मां काफी प्रयास के बाद एक को भी नहीं बचा सकी। शुरू से पूरे मामले में संवेदनहीनता की हदें पार करने वाले डाक्टरों पर गरीब परिवार ने बच्चों की ठीक से देखभाल न करने का आरोप लगाया है। दलित गरीब महिला 36 घंटे बाद बच्चों के शवों को लेकर अस्पताल से लौट गई। संवेदनहीन हो चुके अफसरों की अखबारों में खबरें छपने के बाद भी आंखें नहीं खुलीं। हद देखिए, स्वास्थ्य महकमे से लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी किसी तरह की कार्रवाई या उसकी सुगबुगाहट सुनाई नहीं पड़ी।

गिरवां थाना क्षेत्र के ग्राम इटर्राखुर्द की सुशीला परिवारवालों व आशा बहू के साथ शनिवार को प्रसव पीड़ा के चलते जिला महिला अस्पताल पहुंची। वहां अस्पताल कर्मियों ने उसे भर्ती करने की जगह बच्चे तिरछे हैं कहकर वहां से भगा दिया। हमेशा की तरह स्वास्थ्य कर्मियों पर आरोप था कि वे भर्ती करने के बदले में महिला के तीमारदारों से सुविधा शुल्क मांग रहे थे। इसके बाद महिला एक प्राइवेट नर्सिग होम गई। वहां पांच हजार रुपए मांगे गए। इस पर असमर्थता जताते महिला के तीमारदार वापस घर लौट रहे थे कि इसी दौरान रोडवेज पर महिला ने दोनों बच्चों को जन्म दिया। महिला दर्द से कराहती रही और शर्म से झुकी नजरों के साथ अपने बच्चों की चिंता करती हुई प्रसव पीड़ा से कराहती रही।

कुछ लोगों ने सरकारी एंबुलेंस को बुलाया लेकिन एंबुलेंस नहीं पहुंची। एक होमगार्ड ने बाइक से एंबुलेंस बुलाकर महिला और नवजातों को अस्पताल में भर्ती कराया था। इसके बाद एक नवजात ने कुछ घंटों बाद दम तोड़ दिया था। सोमवार को दूसरे मासूम ने भी दम तोड़ दिया। घटना के बाद पीड़ित मां और परिवारवाले कभी अस्पताल के कर्मचारियों को कोसते तो कभी अपनी किस्मत को कोसते। इसके बाद कोई राह न देख महिला नवजातों के शव को लेकर चली गई।

अपनी गर्दन बचाने में जुटे डाक्टर

महिला अस्पताल की सीएमएस ऊषा सिंह का जहां कहना है कि बच्चों का वजन कम होने से उनकी मौत हुई है। वहीं बाल रोग विशेषज्ञ राधेश्याम का कहना है बच्चों को सेफ करने के लिए वेंटीलेटर में रखा गया था। एक बच्चे का वजन एक किलो व दूसरे बच्चे का एक किलो दो सौ ग्राम था। उसको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।

सूनी हो गई कोख

सुशीला ने एक साथ दो बच्चों को जन्म दिया था। परिवारवालों का कहना है कि उसकी पहली डिलेवरी थी। भगवान तो उससे छप्पर फाड़ कर खुशी दी थी लेकिन नीचे बैठे समाज के गंदे लोगों ने उनसे उनकी खुशियां ही छीन लीं। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ने आखिरकार उसकी गोद उजाड़ दी।

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