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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 10, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जानें, कश्मीर का वो सच जिसे नकारता है पाक, अयूब सोचते थे कुछ...

By Lalit RaiEdited By:
Published: Tue, 10 May 2016 10:36 AM (IST)Updated: Tue, 10 May 2016 05:01 PM (IST)

पाकिस्तान कश्मीर समस्या का हल जमनत संग्रह के रूप में देखता है। लेकिन पाक के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान की सोच इस मुद्दे पर कुछ और ही थी।

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नई दिल्ली। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की सियासत एक अहम सच्चाई है। पाकिस्तानी हुक्मरानों को ये यकीन हो चुका था कि भारत का मुकाबला करने के लिए उन्हें कश्मीर के मुद्दे को हमेशा जिंदा रखना होगा। लिहाजा करीब 70 साल बाद भी कश्मीर का राग पाकिस्तान अलापता रहता है। कश्मीर के पीछे का सच क्या है। इसे जानकर चौंक जाएंगे। पाक बार बार ये कहता है कि कश्मीर और कश्मीरियत के लिए एक मात्र रास्ता जनमत संग्रह है। लेकिन अमेरिका में पाक के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने चौंकाने वाली जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 1959 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने पहले ही कह दिया था कि कश्मीर में जनमत संग्रह कभी नहीं होगा।

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भारत चाहता था कश्मीर विवाद सुलझे

हक्कानी के मुताबिक वर्ष 1963 में भारत 5 हजार वर्ग मील पाकिस्तान को देकर इस मामले को हमेशा के लिए सुलझाना चाहता था। लेकिन पाकिस्तान को ये विचार पसंद नहीं आया। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत रहे हुसैन हक्कानी का कुछ और ही कहना है। उन्होंने कहा कि बंटवारे के समय से ही पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को लगता रहा है कि कश्मीर में या तो जनमत संग्रह हो या ये विवाद हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा।

ऐतिहासिक तथ्यों को किया गया नजरअंदाज

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक हक्कानी ने कहा कि लोग अच्छे पड़ोसी की उम्मीद तो करते हैं। लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज करते हैं।जिसकी वजह से पाकिस्तान में डर का माहौल रहता है। बंटवारे के समय पाकिस्तान के खाते में 33 फीसद ब्रिटिश फौज आई जबकि जीडीपी का महज 17 फीसद पाकिस्तान के खाते में गया। इसका असर ये हुआ कि पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अवाम पर शासन के लिए भारत से डर का माहौल बनाया और पाकिस्तान के सभी राजनैतिक दल कमोबेश इसी नीति पर शासन करते हैं। हक्कानी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने के लिए या तो लगातार बातचीत चलती रहनी चाहिए या एक दूसरे को अलग-थलग रख कर आगे बढ़ सकते हैं। कभी रुठना और कभी मान जाना इस नीति के जरिए भारत और पाकिस्तान के रिश्ते नहीं सुधर सकते हैं।

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भारत और पाक क्यों नहीं हो सकते दोस्त ?

हक्कानी ने 1949 के एक प्रसंग का जिक्र किया। 1949 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अमेरिका गए। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने पूछा कि आप की नजर में हम भारत की मदद किस तरह कर सकते हैं। इस सवाल के जवाब में जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि भारत के औद्योगीकरण और कृषि विकास के लिए अमेरिकी मदद चाहिए। ठीक यही सवाल जब अमेरिकी दौरे पर गए पाक पीएम लियाकत खान से ट्रूमैन ने पूछा तो उनका जवाब था कि पाकिस्तान को हथियारों की जरूरत है। और उन्होंने हथियारों की लिस्ट भी सौंप दी। वर्तमान हालात के लिए अतीत की ये हकीकत है जिसका सामना दोनों देश कर रहे हैं।

भारत ने गवाएं मौके

हक्कानी ने कहा कि बहुत से ऐसे मौके आए जब भारत अपनी भूमिका से पाक में फियर फैक्टर को दूर कर सकता था। लेकिन उन मौकों को भारत ने गंवा दिया। 1992 में तत्कालीन अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जेम्स बेकर और पाक पीएम नवाज शरीफ के बीच पत्राचार का जिक्र है। हक्कानी ने कहा कि आज 24 साल बाद भी पाकिस्तान उन्हीं बातों को कहता रहा है। जो पहले कहता था। देखा जाए तो पाकिस्तान गलत हो या सही उसके नजरिए में किसी तरह का बदलाव नहीं आया ।

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भारत केे भौगोलिक क्षेत्रफल से भी डरता है पाक

हक्कानी ने कहा कि पड़ोसी मुल्कों में भौगोलिक क्षेत्रफल में असमानता भी फियर फैक्टर की बड़ी वजह है। उनके मुताबिक कनाडा और अमेरिका के बीच टेरिटरी और बॉर्डर समेत पांच अहम मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं। लेकिन कनाडा इस तथ्य को स्वीकार करता है कि वो सैन्य शक्ति के मामले में अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता है। बेल्जियम-फ्रांस और रूस-यूक्रेन के बीच कमोबेश यही कहानी है। 1947 में पाकिस्तान और भारत के बीच सैन्य अनुपात 1 : 3 का था। लेकिन 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद पाकिस्तान सेना की संख्या में किसी तरह की कमी नहीं आयी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में फियर फैक्टर के लिए सिर्फ पाकिस्तान के नीति नियंता ही नहीं जिम्मेदार हैं । बल्कि अमेरिका इस बात को समझाने में कामयाब रहा कि भारत के मुकाबले के लिए पाकिस्तान को अपने सैन्य ताकत को और बढाना होगा।

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