
- मां दुर्गा को आदिशक्ति, जगदम्बा, भवानी, पार्वती, शेरावाली, महिषासुरमर्दिनी और चंडी के नाम से भी जाना जाता है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा को आदिशक्ति और शक्ति का स्वरूप माना जाता है। वे भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का ही एक शक्तिशाली स्वरूप हैं।
- मां दुर्गा को शक्ति, साहस, ज्ञान और समृद्धि की देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने महिषासुर सहित अनेक असुरों का वध करके देवताओं और पृथ्वी की रक्षा की थी।
- मां दुर्गा की पूजा के लिए नवरात्र को विशेष माना जाता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में भक्त नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं।
- मां दुर्गा को लाल रंग प्रिय माना जाता है। उनकी पूजा में लाल फूल, चुनरी, सिंदूर, नारियल, फल और मिठाई आदि अर्पित किए जाते हैं।
- मां दुर्गा के प्रमुख स्वरूपों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री शामिल हैं।
- मां दुर्गा से जुड़े प्रमुख त्योहारों में चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि, मासिक दुर्गा अष्टमी, महानवमी और विजयादशमी प्रमुख हैं।
- मां दुर्गा के प्रसिद्ध मंदिरों में वैष्णो देवी मंदिर, कामाख्या मंदिर, ज्वाला जी मंदिर, कालीघाट मंदिर, चिंतपूर्णी मंदिर और अन्य शक्तिपीठ शामिल हैं।

श्री दुर्गा चालीसा
॥ चौपाई ॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
अर्थ: जीवन में समस्त सुखों का प्रवाह करने वाली मां दुर्गा को बारंबार प्रणाम है। भक्तों के समस्त दुखों और कष्टों को हर लेने वाली मां जगदम्बा को मेरा नमन है।
निराकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
अर्थ: हे मां! आपकी दिव्य ज्योति सीमाहीन और निराकार है। आपकी इस अलौकिक कांति से तीनों लोक आलोकित हो रहे हैं।
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥
अर्थ: आपके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और आपका मुखमंडल भव्य व विशाल है। आपके नेत्र लालिमायुक्त हैं और भृकुटी दुष्टों का संहार करने वाला प्रचंड रूप दर्शाती हैं।
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥
अर्थ: माता का यह मनभावन स्वरूप अत्यंत आकर्षक है। जो भी श्रद्धालु आपके इस दिव्य रूप के दर्शन करता है, उसे असीम शांति और परम आनंद मिलता है।
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अर्थ: इस सृष्टि की समस्त शक्तियों का मूल आधार आप ही हैं। संसार के लालन-पालन के लिए आपने ही अन्न और धन-धान्य की व्यवस्था की है।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
अर्थ: मां अन्नपूर्णा का रूप धारण करके आप ही पूरे जग का पोषण करती हैं। आप ही सृष्टि की सबसे प्रथम, अनुपम और सुंदर शक्ति हैं।
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥
अर्थ: प्रलय के समय समस्त ब्रह्मांड का संहार करने वाली शक्ति भी आप ही हैं। आप ही मां गौरी हैं और भगवान शिव की अर्धांगिनी व अत्यंत प्रिय हैं।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
अर्थ: स्वयं शिव जी और बड़े-बड़े योगी आपके गुणों का बखान करते हैं। ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु भी निरंतर आपके चरणों का ध्यान धरते हैं।
रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा ॥
अर्थ: आपने ही मां सरस्वती का रूप धारण किया था। ऋषियों और मुनियों को सद्बुद्धि देकर आपने ही उनका मार्गदर्शन और उद्धार किया है।
धरा रूप नरसिंह को अम्बा ।
प्रगट भईं फाड़कर खम्बा ॥
अर्थ: अपने भक्त की रक्षा हेतु हे मां भवानी! आप ही खंभे को चीरकर उग्र नरसिंह रूप में प्रकट हुई थीं।
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥
अर्थ: आपने ही बालक प्रह्लाद की रक्षा की थी और अत्याचारी हिरण्यकशिपु (व हिरण्याक्ष) का अंत करके उसे मृत्युलोक से भेज दिया था।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥
अर्थ: इस संसार में समृद्धि लाने के लिए आपने मां लक्ष्मी का रूप धारण किया और भगवान श्री हरि विष्णु के वामांग में स्थान पाया।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
अर्थ: आप क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ निवास करती हैं। हे दया की सागर मां! मेरे मन की शुभ मनोकामनाओं को पूर्ण कीजिए।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥
अर्थ: प्रसिद्ध हिंगलाज धाम में भवानी के रूप में आप ही विराजमान हैं। आपकी महिमा इतनी अपार है कि शब्दों में उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥
अर्थ: मां मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी के रूप में भी आप ही विराजमान होकर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥
अर्थ: भैरवी, मां तारा और छिन्नमस्तिका के रूप में आप ही संसार को संकटों से तारने वाली और जीवन के समस्त क्लेशों को मिटाने वाली हैं।
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
अर्थ: हे मां भवानी! सिंह की सवारी पर आप अत्यंत सुशोभित होती हैं और आपकी अगवानी में श्री हनुमान जी आगे-आगे चलते हैं।
कर में खप्पर-खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजे ॥
अर्थ: आपके हाथों में खप्पर और धारदार खड्ग सुशोभित है, जिसे देखकर स्वयं काल भी भयभीत होकर भाग जाता है।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
अर्थ: आपके हाथों में अस्त्र-शस्त्र और त्रिशूल सुशोभित हैं, जिन्हें देखकर शत्रुओं के हृदय में भय की पीड़ा उत्पन्न होने लगती है।
नगर कोटि में तुम्हीं विराजत ।
तिहुंलोक में डंका बाजत ॥
अर्थ: नगरकोट में आपका ही पावन वास है। तीनों लोकों में आपकी शक्ति और विजय का डंका बजता है।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥
अर्थ: आपने ही शुंभ और निशुंभ जैसे बलशाली दैत्यों का अंत किया और अनगिनत रक्तबीज राक्षसों का संहार किया।
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
अर्थ: महिषासुर अत्यंत घमंडी राजा था, जिसके पापों के भारी बोझ से पृथ्वी व्याकुल हो उठी थी।
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
अर्थ: तब आपने मां काली का विकराल रूप धारण करके उस महिषासुर का उसकी पूरी सेना सहित समूल विनाश कर दिया।
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥
अर्थ: जब-जब साधु-संतों और सज्जनों पर कोई भारी विपत्ति आई है, तब-तब हे मां! आपने ही प्रकट होकर उनकी सहायता की है।
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥
अर्थ: देवलोक और इंद्रलोक आपकी ही कृपा से भय और शोक से मुक्त रहते हैं।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥
अर्थ: प्रसिद्ध ज्वालाजी मंदिर में आपकी ही प्रज्वलित ज्योति निरंतर जलती रहती है। संसार के सभी नर-नारी सदा आपकी पूजा-आराधना करते हैं।
प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥
अर्थ: जो भी व्यक्ति सच्चे प्रेम और श्रद्धा से आपकी महिमा का गान करता है, उसके जीवन में कभी दुख, कष्ट या दरिद्रता पास नहीं फटकती।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥
अर्थ: जो व्यक्ति पूर्ण एकाग्रता से आपका ध्यान धरता है, वह जन्म और मृत्यु के सांसारिक चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
अर्थ: योगी, देवता और मुनिगण यही पुकार-पुकार कर कहते हैं कि आपकी आदिशक्ति के बिना कोई भी योग या साधना सफल नहीं हो सकती।
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
अर्थ: आदि गुरु शंकराचार्य जी ने कठोर तपस्या करके अपने काम और क्रोध पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली थी।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
अर्थ: वे रात-दिन केवल भगवान शिव का ध्यान करते थे, परंतु उन्होंने आपकी शक्ति की आराधना पर ध्यान नहीं दिया।
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥
अर्थ: वे आपकी शक्ति के रहस्य को नहीं समझ सके, और जब उनके शरीर से शक्ति क्षीण हो गई, तब उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और वे मन ही मन पछताए।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
अर्थ: तब वे आपकी शरण में आए और आपकी महिमा का गुणगान करते हुए जय जगदम्बे, जय भवानी की पुकार लगाने लगे।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
अर्थ: उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर जगदम्बा मां ने बिना कोई देर किए उन्हें पुनः शक्ति प्रदान कर दी।
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥
अर्थ: हे मां! मैं सांसारिक कष्टों और परेशानियों से घिरा हुआ हूं। आपके अलावा मेरे इन दुखों का निवारण करने वाला और कौन है?
आशा तृष्णा निपट सतावे ।
मोह मदादिक सब विनशावै ॥
अर्थ: अनियंत्रित इच्छाएं और तृष्णा मुझे निरंतर सताती रहती हैं। मोह, घमंड और लालच मेरे मन को भटका रहे हैं।
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥
अर्थ: हे महारानी भवानी! मेरे आंतरिक व बाहरी शत्रुओं का नाश कीजिए। मैं एकाग्रचित्त होकर केवल आपका ही स्मरण करता हूं।
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥
अर्थ: हे दयामयी मां! मुझ पर अपनी अनुकंपा कीजिए। मुझे रिद्धि-सिद्धि और सद्बुद्धि प्रदान करके मेरा जीवन धन्य कर दीजिए।
जब लाग जियऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥
अर्थ: जब तक इस शरीर में प्राण रहें, मुझे आपकी कृपा का फल मिलता रहे और मैं सदा आपकी महिमा का गुणगान करता रहूं।
दुर्गा चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥
अर्थ: जो भी मनुष्य प्रतिदिन नियम से इस दुर्गा चालीसा का पाठ करता है, वह जीवन के समस्त सुखों को भोगकर अंत में परम पद को प्राप्त करता है।
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्बा भवानी ॥
अर्थ: भक्त देवीदास स्वयं को आपकी शरण में समर्पित मानता है। हे जगदम्बा भवानी! अपनी असीम कृपा सदा हम पर बनाए रखिए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- दुर्गा चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?नियमित तौर पर रोजाना दुर्गा चालीसा पढ़ना कई मायनों में लाभकारी माना जाता है। इससे न सिर्फ मन को शांति मिलती है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक बल भी मिलता है। इसके अलावा मां दुर्गा की कृपा भी प्राप्त होती है।
- दुर्गा चालीसा का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?दुर्गा चालीसा का पाठ सुबह स्नान के बाद या शाम को पूजा के समय करना बेहद शुभ माना जाता है। इसके अलावा शुक्रवार और नवरात्र के दौरान भी इसका पाठ लाभदायक माना जाता है। आप श्रद्धानुसार एक, तीन या पांच बार इसका पाठ कर सकते हैं।
- दुर्गा चालीसा किसने लिखी है?आमतौर पर ऐसी मान्यता है कि दुर्गा चालीसा श्री शिवदत्त द्वारा लिखी गई है। हालांकि, इसके रचनाकार को लेकर अलग-अलग मान्यताएं भी मिलती हैं।
- नवरात्र में दुर्गा चालीसा का पाठ करने का क्या महत्व है?मां दुर्गा की आराधना के लिए नवरात्र सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान दुर्गा चालीसा के पाठ का भी काफी महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इससे मन को शांति और आत्मबल मिलता है। साथ ही जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
- दुर्गा चालीसा में मां दुर्गा के किन-किन स्वरूपों का वर्णन किया गया है?दुर्गा चालीसा में देवी मां के कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इसमें माता रानी के जगदंबा, भवानी, काली, चामुंडा और शेरावाली जैसे विभिन्न रूपों के बारे में बताया गया है। साथ ही इसमें उनकी शक्ति, करुणा और भक्तों की रक्षा करने वाले स्वरूप का भी वर्णन मिलता है।
- दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती में क्या अंतर है?दुर्गा चालीसा 40 छंदों की स्तुति है, जिसमें मां दुर्गा की महिमा और उनके अलग-अलग स्वरूपों का वर्णन किया गया है। वहीं दुर्गा सप्तशती देवी मां का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें श्लोकों के जरिए माता रानी की महिमा और महिषासुर जैसे असुरों के वध की कथाओं का वर्णन किया गया है।
- दुर्गा चालीसा का पाठ करने के क्या नियम हैं?दुर्गा चालीसा का पाठ करने के कुछ नियम भी हैं। पाठ करने से पहले नहाकर साफ कपड़े पहनें और फिर पूजा स्थल को अच्छे से साफ करें। इसके बाद मां दुर्गा का ध्यान करें और पूरी श्रद्धा और एकाग्रता से पाठ करें।
ज्योतिष सेवाएं
जन्म कुंडली के गहन अध्ययन से करियर, विवाह, स्वास्थ्य की सटीक भविष्यवाणियाँ और मांगलिक, पितृ दोष आदि का ज्योतिषीय समाधान प्राप्त करें।











