नई दिल्‍ली जागरण स्‍पेशल। मध्‍य एशिया में आतंकियों के जमते पैरों ने काफी समय से पूरी दुनिया को चिंता में डाल रखा है। अब इसकी वजह को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। एमनेस्टी इंटरनेशल की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका ने जो हथियार अपने सहयोगी देशों को सप्‍लाई किए थे वह वहां न जाकर आतंकियों के पास पहुंच रहे हैं। दरअसल, खाड़ी के वो देश जो अमेरिकी सहयोगी हैं उनके जरिए ही ये हथियार आतंकियों के हाथों में पहुंचे हैं। रिपोर्ट में इसके पीछे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का हाथ बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यमन में मौजूद आतंकी संगठनों और अलकायदा के पास हाईली सॉफ्सिटीकेटेड वैपंस मौजूद हैं। इनकी बदौलत यह लगातार दूसरे देशों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि यमन में ईरान और सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन युद्ध अपराधों में शामिल है। दोनों धड़ों पर बंदियों को प्रताड़ित करने के आरोप भी हैं।

रिपोर्ट में यूएई पर उठाई अंगुली
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटनेशनल ने यूएई पर इसके लिए सीधेतौर पर अंगुली उठाई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपने एक बयान में यहां तक कहा है कि अमीरात की सेनाओं ने पश्चिमी और अन्य देशों से अरबों डॉलर के हथियार हासिल किए। लेकिन इन हथियारों को पाने का मकसद आतंकियों का सहयोग करना था। यही वजह थी कि इन हथियारों को आतंकियों को दे दिया गया। हालांकि रिपोर्ट के सामने आने के बाद इस मामले में यूएई की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। आतंकियों के हाथों में पश्चिमी हथियारों को लेकर जर्मनी की मीडिया ने भी बड़ा खुलासा किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आतंकियों के हाथों में अमेरिका ही नहीं बल्कि जर्मनी के हथियार भी पहुंचे हैं। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि कई पश्चिमी देश यूएई और सऊदी अरब को हथियारों के साथ खुफिया सूचनाएं मुहैया कराते हैं। 

अलकायदा के हाथों तक पहुंचे अमेरिकी हथियार
जॉर्डन की राजधानी अम्मान में स्थित अरब रिपोर्ट्स ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म और अमेरिकी न्यूज चैनल सीएनएन की रिपोर्ट में दिखाया गया है कि कैसे ये हथियार अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों तक पहुंच रहे हैं। आपको यहां पर बता दें कि यमन में 2014 में ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया था।  विद्रोही गुटों की हिंसा की वजह से यमन में बड़ी संख्या में आम लोग मारे जा चुके हैं। देश का दक्षिणी हिस्सा और पश्चिमी तट सुन्नी विद्रोही गुटों के नियंत्रण में है। यूएई ने अपने प्रभाव वाले इलाकों में हजारों हथियारबंद यमनी लड़ाकों को ट्रेनिंग भी दी है। वहीं राजधानी सना समेत ज्यादातर बड़े शहर हूथी विद्रोहियों के कब्जे में हैं। वहीं दूसरी तरफ यूएई और सऊदी अरब यमन के कई सुन्नी आतंकी गुटों का समर्थन कर रहे हैं। दोनों हूथियों को यमन की सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं।

रिपोर्ट में की गई है अपील
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हथियार विक्रेता देशों से अपील करते हुए कहा है कि जब तक जोखिम कम नहीं हो जाता, तब तक वे हथियारों की ब्रिकी निलंबित कर दें। संगठन का कहना है कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो मानवाधिकार कानूनों को तोड़ने के लिए हथियार इस्तेमाल होते रहेंगे। गौरतलब है कि 2018 में तुर्की के सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद पश्चिमी देशों ने यूएई और सऊदी अरब पर यमन के युद्ध को खत्म करने का दबाव बढ़ाया है। खगोशी की हत्या दिसंबर 2018 में इस्तांबुल में सऊदी कंसुलेट में की गई। तुर्की का आरोप है कि हत्या के पीछे सऊदी अरब की सत्ता का हाथ है।

नियमों का उल्‍लंघन
एमनेस्‍टी की रिपोर्ट में आतंकियों के हाथों में अमेरिकी हथियार पहुंचने को अमेरिकी एक्‍सपोर्ट नियमों का उल्‍लंघन बताया है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि आतंकियों के हाथों में जाने वाले हथियारों में एक अमेरिकी आर्म्‍ड व्‍हीकल भी हैं जो हैवी मशीनगन से लैस हैं। इसके अलावा कई तरह की अत्‍याधुनिक राइफल भी इन्‍हीं हथियारों का हिस्‍सा हैं। इसके अलावा अमेरिका में बनी एंटी टैंक मिसाइल टो एमआरएपी (इन रेसिसटेंट एंबुश प्रोटेक्‍टेड व्‍हीकल) ओश्‍कोश आरमर्ड व्‍हीकल, असाल्‍ट राइफल्‍स, हैंड गन और पिस्‍तौल भी इसका ही हिस्‍सा हैं। 

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Posted By: Kamal Verma