प्रकाश सिंह। पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य सरकार के बीच चिट फंड घोटाले की जांच को लेकर उत्पन्न तनातनी दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे संवैधानिक संकट खड़ा हो गया। सवाल यह है कि इस तरह की स्थिति बनी क्यों? हमें देखना होगा कि सीबीआइ, राज्य सरकार और उसके पुलिस कमिश्नर ने अपनी भूमिका कैसे निभाई? भूमिका कितनी वैधानिक थी और कहां तक उचित थी?

पहले तो सीबीआइ ने पुलिस कमिश्नर के खिलाफ ऐसे समय में कार्रवाई शुरू की जब नए सीबीआइ डायरेक्टर की घोषणा हो चुकी थी। मेरा मानना है कि जब नए सीबीआइ डायरेक्टर का चयन हो चुका था, तो किसी मामले में कदम उठाने से पहले नागेश्वर राव जो सीबीआइ के अंतरिम डायरेक्टर थे। उन्हें इस तरह का अहम फैसला नहीं लेना चाहिए था। यह जिम्मेदारी सही उत्तराधिकारी के लिए छोड़ देनी चाहिए थी। नागेश्वर राव के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सीबीआइ में नहीं होना चाहिए था।

कहा यह भी जाता है कि आलोक वर्मा उन्हें सीबीआइ में नहीं रखना चाहते थे, परंतु उनका प्रभाव ऐसा था कि डायरेक्टर को बर्दाश्त करना पड़ा। मुझे संदेह है कि नागेश्वर राव सरकार के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करना चाहते थे। सीबीआइ ने जिस तरह से जल्दबाजी में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के यहां रेड डाली वह उचित नहीं था। सीबीआइ टीम जब गई थी तो इस तरह का माहौल बनाया गया कि लगा पुलिस कमिश्नर भगोड़े हो गए हैं। बाद में राज्य सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर कहा भी गया कि वह भगोड़े नहीं है। एक साथ सीबीआइ के चालीस लोग गए इसकी क्या आवश्यकता थी? पांच-छह लोग ही बहुत थे। सीबीआइ ने गलत काम किया परंतु गलत काम का जवाब गलत तरीके से देना सही बात नहीं है। सीबीआइ के अधिकारियों के साथ जिस तरह से धक्का-मुक्की हुई और कुछ लोगों को थाने तक ले जाया गया और वहां उनके कागज देखे गए। यह बंगाल पुलिस की ओर से ज्यादती हुई।

बंगाल की मुख्यमंत्री को मामले को सुलझाना चाहिए था। वह उलटे धरने पर बैठ गईं। जिस तरह से ममता बनर्जी धरने पर बैठी यह लोगों को नाटक ही लगा। ममता बनर्जी को चाहिए था कि वह गृहमंत्री को फोन करके कहतीं कि अपने आदमियों को वापस बुलाइये। उन्हें गरिमा में रहते हुए परिपक्वता दिखानी चाहिए थी। पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी धरने पर बैठे। वे आल इंडिया सर्विसेस कंडेक्ट रूल से बंधे हैं। यह बिलकुल गलत था कि वह नेताओं के साथ धरने पर बैठ गए। आज अधिकारियों का राजनीतिकरण हो गया है। यह दुखद है।

सीबीआइ का यदि सही प्रयोग किया गया होता, तो उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े नेता आज सलाखों के पीछे होते। जो कल तक साइकिल से चलते थे वो आज हजारों हजार करोड़ के मालिक बन बैठे हैं। सब इकट्ठा हो जाते हैं ताकि इनके खिलाफ कोई एक्शन न हो। इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र सरकार यदाकदा सीबीआइ का दुरुपयोग करती है, लेकिन विपक्ष में कई ऐसे लोग बैठे हैं जिन्हें जेल में होना चाहिए था। सीबीआइ आज भी 1946 में बने दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट के तहत काम कर रही है।

यह बड़ी हास्यापद बात है कि इतनी बड़ी एजेंसी को आज तक लीगल स्टेट्स का आधार नहीं दिया गया है। सीबीआइ को मजबूत करने के लिए 1978 में एलपी सिंह कमेटी बनी थी। जिसने कहा था कि एक केंद्रीय अधिनियम होना चाहिए। किसी सरकार ने भी सीबीआइ को कानूनी आधार नहीं दिया। सभी सरकारें ढुलमुल तरीके से काम करती रहीं। देश के दो राज्यों ने आदेश दे दिया कि सीबीआइ उनके यहां किसी तरह की जांच नहीं कर सकती है। भले ही वह अपने यहां कितनी भी लूटखसोट करते रहें। सीबीआइ को तत्काल  कानूनीजामा पहनाना चाहिए। एक अलग अधिनियम बनाना चाहिए। जिसके अंतर्गत काम करते हुए सीबीआइ निष्पक्षता से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके।

(लेखक पूर्व पुलिस महानिदेशक, यूपी)

(मनोज त्यागी से बातचीत पर आधारित)

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Posted By: Kamal Verma

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