बढ़ रहा मानव वन्य जीव संघर्ष, बाघों के हमले में 16 साल में 42 लोगों की गई जान
रामनगर में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है, जहाँ 16 सालों में बाघों के हमले में 42 लोगों की जान गई है। इनमें 18 महिलाएं शामिल हैं। ग्रामीण लकड़ी व चारे ...और पढ़ें

जंगल से लकड़ी व मवेशियों के लिए चारा लाना बन रही मानव वन्य जीव संघर्ष की वजह. Concept Photo
जागरण संवाददाता, रामनगर। बाघों के लिए प्रसिद्ध रामनगर में मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। दो-तीन घटनाओं का जिक्र छोड़ दिया जाए तो अधिकांश घटनाएं जंगल में घटित हुई है। सबसे ज्यादा 28 घटनाएं शीतकाल में नवंबर से फरवरी माह के बीच हुई हैं। बाघ के हमले में जान गंवाने वालों में 42 में से 18 महिलाएं शामिल हैं।
हर साल जंगल में लकड़ी व चारा लेने जाने वाले ग्रामीणों के साथ बाघों के हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं। रामनगर क्षेत्र की बात करें तो वर्ष 2009 से 2026 जनवरी तक 16 साल में 42 लोग बाघ के हमले में जान गंवा चुके हैं। इसमें कार्बेट, रामनगर वन प्रभाग व तराई पश्चिमी वन प्रभाग के जंगल में यह घटनाएं हुई हैं।
वनाधिकारियों का कहना है कि तीन घटनाएं वन क्षेत्र से बाहर हुई हैं। जिसमें मोहान व पनोद क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग में दो एवं तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत जंगल से लगे खेत में बाहर आकर बाघ ने महिला को मारा था। जान गंवाने वालों में स्थानीय लोगों के अलावा वनकर्मी भी शामिल हैं।
16 साल में जान गंवाने वालों के आंकड़े
वर्ष 2009 में एक, 2010 में चार, 2011 में दो, वर्ष 2013 में एक, 2014 में तीन, 2016 में पांच, वर्ष 2017 में दो, वर्ष 2018 में एक युवक, वर्ष 2019 में तीन युवक, वर्ष 2021 में एक महिला को बाघ ने मार दिया था। वर्ष 2022 में तीन लोग बाघ के हमले में मारे गए थे। 2023 में भी पांच लोग बाघ के हमले में मारे गए। जबकि वर्ष 2024 में छह लोगों को बाघ ने मार डाला। इसके बाद 2025 में बाघों के हमले में चार लोगों की जान गई थी। 2026 में जनवरी की शुरूआत में ही एक महिला की बाघ के हमले में जान चली गई।

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