देहरादून, जेएनएन। किसी भी विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि लेना बड़े सम्मान के रूप में देखा जाता है। लेकिन, उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (यूटीयू) में पीएचडी करने के लिए योग्यता नहीं 'सौदेबाजी' को महत्व दिया जा रहा है। विवि में पीएचडी के नियमों की अनदेखी और धांधली सामने आई है। 

विदित रहे कि राजभवन के आदेश पर करीब एक साल पहले मार्च 2018 में प्रदेश सरकार की ओर से पूरे मामले की जांच के लिए गठित दो सदस्यीय जांच कमेटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। उसमें वर्ष 2009 से लेकर 2017 के बीच पीएचडी की डिग्री कई छात्रों ने बिना दाखिला लिए 'सेटिंग' के जरिये ही ले ली। जांच टीम ने इस बात पर भी सवाल खड़े किए कि एक उपनल कर्मचारी को सहायक परीक्षा नियंत्रक और विवि में पीएचडी का समन्वयक नियुक्त किया। 
समन्वयक खुद भी विवि से ही पीएचडी कर रहा है, जो नियमों के विरुद्ध है। इसके अलावा वर्ष 2017 में पीएचडी परीक्षा का रिकॉर्ड विवि के कंप्यूटर में एक एक्सल सीट पर तैयार किया गया है। जिसे बदला भी जा सकता है। जबकि नियमानुसार परीक्षा परिणाम विवि में मूल प्रति के रूप में सुरक्षित होना चाहिए। दो सदस्य जांच टीम ने एक दर्जन बिंदुओं पर सवाल खड़े करते हुए विजिलेंस की जांच की संस्तुति कर रिपोर्ट सरकार को भेजी है। जांच अधिकारी और डीएचडीसी आइएचईटी के निदेशक जीएस तोमर ने बताया कि यूटीयू में पीएचडी मामले से संबंधित जांच को लेकर विवि के कुलपति के साथ शुक्रवार को बैठक होगी। जिसमें विवि से पीएचडी से संबंधित सभी रिकॉर्ड मांगे जाएंगे। कुलपति ने सबंधित सभी रिकॉर्ड उन्हें उपलब्ध करवाने का भरोसा दिया है। 
नवंबर 2017 से पीएचडी में प्रवेश नहीं 
उत्तराखंड तकनीकी विवि की कुलसचिव डॉ. अनीता रावत ने कहा कि पीएचडी की डिग्री घपले के मामले में राजभवन से पत्र मिलने के बाद उत्तराखंड तकनीकी विवि ने नवंबर 2017 में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। इसके बाद यूजीसी रेगुलेशन 2018 के अनुसार अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अनुरूप पीएचडी का पाठ्यक्रम विवि की ऐकेडमिक काउंसिल में मंजूर कर दिया गया, जिसे जल्द ही विवि की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में रखा जाएगा। मंजूरी के बाद यूटीयू पीएचडी प्रवेश शुरू करेगा। विवि के प्रशासनिक अधिकारियों के आदेशों के अनुसार इस पूरे मामले में कार्रवाई की जा रही है।

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