देहरादून, [राज्य ब्यूरो]: 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड के जंगलों में हर साल वन संपदा को आग से होने वाली क्षति के आकलन के मानक मुंह चिढ़ा रहे हैं। अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि एक से पांच साल तक के पेड़ राख होने पर इनकी कीमत आंकी जाती है प्रति पेड़ महज 15 से 24 रुपये के बीच। इसी प्रकार सतह पर फैलने वाली आग से बड़े पेड़ों की क्षति का मानक है 750 से 2250 रुपये प्रति हेक्टेयर। दो साल पुराने इन मानकों को लेकर उठ रही उंगलियों को देखते हुए अब वन महकमा इन्हें पुनरीक्षित करने की तैयारी में है।

जंगलों की आग से प्रति वर्ष फायर सीजन (15 फरवरी से 15 जून तक) में बड़े पैमाने पर वन संपदा तबाह होती आ रही है। जाहिर है कि इससे पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंचती है। बदली परिस्थितियों के हिसाब से आग से जंगलों को पहुंचने वाली क्षति का आकलन बेहद कम माना जा रहा है। हालांकि, विभाग ने 15 मई 2016 को वन संपदा की हानि के आकलन को मानक पुनरीक्षित किए थे, मगर ये भी नाममात्र को हैं। एक से पांच साल के पेड़ों के अलावा सरफेस फायर व क्राउन फायर में पेड़ों के नुकसान का आकलन भी बेहद कम है। इस सबको देखते हुए आग से जंगल को होने वाली क्षति के मानकों में बदलाव की बात उठ रही है।

जय राज (प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, उत्तराखंड) का कहना है कि निश्चित रूप से आग से वन संपदा को पहुंचने वाली क्षति के आकलन को स्वीकृत दरें कम हैं। इनमें बदलाव के लिए कवायद प्रारंभ की जा रही है। विभाग की एक्सपर्ट कमेटी इसका अध्ययन कर रिपोर्ट देगी। अगले साल फायर सीजन से पहले क्षति आकलन की नई दरें लागू कर दी जाएंगी।

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