देहरादून, सुमन सेमवाल। एक दौर था। जब दून और सुकून एक दूसरे के पर्याय माने जाते थे। चारों ओर लहलहाते खेत, आम-लीची के भाग और हरियाली ही हरियाली। हवा इतनी स्वच्छ कि एक लंबी सांस लेकर दिनभर की थकान को पलभर में मिटा दे। फिर वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड बना और दून को राजधानी बनाया गया। इसके बाद तो जैसे शहरीकरण की दौड़ शुरू हो गई। दौड़ भी ऐसी कि शहर बढ़ता चला गया और संसाधन सिमटते। खेतों पर भवन खड़े होने लगे और सड़कों पर वाहनों की रेलमपेल भी कई गुना हो गई। सुकून तो जैसे दून से छिन ही गया। 

आज दून की फिजा में धुआं ही धुआं नजर आता है। वायु प्रदूषण की औसत स्थिति मानक से डेढ़ गुना अधिक, तो औचक जांचों में यह तीन से चार गुना तक भी पाया गया है। दून में पंजीकृत 10 लाख से अधिक वाहनों में से कितने मानक से अधिक धुआं उगल रहे हैं, किसी को इस बात का पता नहीं है। न ही कभी यह किसी ने जानने का प्रयास किया। 

खुले-आम जलाए जा रहे कूड़े से भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और कोई देखने-सुनने वाला नहीं। हमारे सिस्टम की आंखें तब भी नहीं खुली, जब वर्ष 2017 के अंत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश के 200 से अधिक शहरों में वायु प्रदूषण के आंकड़े रखे। 

रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि दून सर्वाधिक प्रदूषित (वायु) शहरों में छठे स्थान पर आ गया है। शहर के चंद स्थानों पर वायु प्रदूषण के आंकड़े एकत्रित करने तक सीमित उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हमेशा प्रदूषण के औसत आंकड़े जारी कर इसकी भयावता को कम कर आंकता रहा, जबकि फरवरी 2018 में गति फाउंडेशन ने शहर के तमाम स्थानों पर जांच कर बोर्ड के समानांतर वायु प्रदूषण के दैनिक आंकड़े एकत्रित किए और बताया कि यह ग्राफ सरकारी आंकड़ों से कहीं ऊपर जा रहा है।

एसपीएम-10 व 2.5 की स्थिति खतरनाक

दून में धूल-धुएं के कण सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (एसपीएम) की मात्रा औसत रूप में जहां डेढ़ गुना व दैनिक आधार पर चार गुना तक पाई गई है। वहीं, मानकों की बात करें तो एसपीएम-10 की मात्रा 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर व एसपीएम-2.5 की 60 से अधिक नहीं होनी चाहिए। 

58 फीसद प्रदूषण का उत्सर्जन दून के भीतर

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि दून में वायु प्रदूषण की जो भी स्थिति है, उसमें 58 फीसद का उत्सर्जन दून में ही हो रहा है। शेष 42 फीसद प्रदूषण बाहरी क्षेत्र या राज्यों से वायुमंडल में पहुंच रहा है। इस 58 फीसद में भी कूड़ा जलाने और वाहनों के प्रदूषण की मात्रा सर्वाधिक रही।

गति फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने बताया उन्होंने भी अर्बन एमिशंस के साथ काम किया है और सेटेलाइट से जो आंकड़े जुटाए गए हैं, वह एक सीमित अवधि के हैं। हालांकि, इसमें भी काफी कुछ स्पष्ट हो गया है, मगर सालभर इस तरह का अध्ययन किया जाए तो पूरी तस्वीर साफ हो जाएगा। आज वाहनों की संख्या काफी बढ़ गई और जगह-जगह कूड़ा जलाने की बात भी सामने आ रही है। इस लिहाज से वर्तमान समय में सरकार के स्तर पर वायु प्रदूषण के कारकों पर अध्ययन किए जाने की जरूरत है।

10 लाख वाहन और प्रदूषण जांच केंद्र 20

हर वाहन को छह माह की अवधि में प्रदूषण की जांच कराकर प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य है। इस तरह साल में दो बार जांच की जानी चाहिए। हालांकि, कितने वाहनों की प्रदूषण की जांच हो पाती है, इसका अंदाजा प्रदूषण जांच केंद्रों से लगाया जा सकता है। प्रदेश में 100 जांच केंद्र हैं और दून में यह संख्या 20 के आसपास सिमटी है। 10 लाख वाहनों के हिसाब से देखें तो 20 लाख बार जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा होता तो प्रदूषण जांच केंद्रों की संख्या स्वत: ही बढ़ जाती है। यानी कि ना के बराबर ही वाहनों में प्रदूषण के मानकों का पालन किया जा रहा है।

 

परिवहन विभाग नहीं करता कार्रवाई

मानक से अधिक धुआं उगल रहे वाहनों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है। बावजूद इसके ना के बराबर वाहनों की जांच की जाती है, जबकि दून में बड़ी संख्या में धुआं उगलते वाहन आसानी से दिख जाएंगे। 

काशीपुर-रुद्रपुर के लिए प्लान, दून में इंतजार

प्रदेश के तमाम शहरों की अपेक्षा वायु प्रदूषण का ग्राफ दून में अधिक है। बावजूद इसके पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ऋषिकेश व काशीपुर के लिए वायु प्रदूषण पर नियंत्रण का प्लान बना रहा है। यह स्थिति भी बताती है कि कहीं न कहीं प्लानिंग के स्तर पर भी आंकड़ों को कमतर कर आंका जा रहा है। 

घटती हरियाली, बढ़ते प्रदूषण से गर्म हो रहा दून

घटती हरियाली और बढ़ते कंक्रीट के जंगलों से न सिर्फ प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है, बल्कि इससे दून के औसत तापमान में भी इजाफा हो रहा है। स्थिति यह है कि शहर के तापमान में भी चार डिग्री तक का अंतर आ गया है। दून के जिन इलाकों में अभी भी कुछ हरियाली बची है, वहां तापमान कम, जबकि अधिक भवन निर्माण व बाजारू क्षेत्रों में तापमान अधिक पाया गया है। 

कुछ समय पहले मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के ट्रांसपोर्ट प्लानर जगमोहन सिंह के अध्ययन में इस बात का खुलासा किया गया था। उन्होंने दून के तापमान की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए शहर के छह अलग-अलग हिस्सों में थर्मामीटर लगाए थे। सभी हिस्सों में एक ही समय पर तापमान की रिकॉर्डिंग की गई। 

पता चला कि एक समय पर अलग-अलग हिस्सों के तापमान में चार डिग्री तक अंतर है। उदाहरण के लिए अधिक आबादी वाले पटेलनगर इलाके में तापमान 39 डिग्री था, जबकि यहां से करीब सात किलोमीट दूर कुछ हद तक हरियाली वाले मोहब्बेवाला इलाके में तापमान 34 डिग्री पाया गया। अन्य हिस्सों में भी तापमान वहां की मौजूदा धरातलीय स्थिति के अनुरूप कम-ज्यादा पाया गया।

कार्ययोजना पर चल रहा काम 

उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्धि के मुताबिक, अभी ऋषिकेश व काशीपुर में वायु प्रदूषण कम करने की कार्ययोजना पर काम चल रहा है। इसके बाद दून के लिए भी प्लान तैयार किया जाएगा। वैसे वायु प्रदूषण पर नियंत्रण की जिम्मेदारी अन्य महकमों की भी है।

सबसे पहले वायु प्रदूषण पर नियंत्रण जरूरी  

गति फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल के अमुसार, सबसे पहले वाहनों से पैदा होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना जरूरी है। इसके लिए पेट्रोल/डीजल पंपों पर प्रदूषण जांच केंद्र खोले जाने चाहिए। जांच की व्यवस्था अभी प्रदेश में ध्वस्त नजर आती है।

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Posted By: Bhanu

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