साइबर अपराधियों की कारस्तानी से प्रयागराज के 3200 जन सेवा केंद्र संदेह के घेरे में, अब सत्यापन के फेर में फंसे
प्रयागराज में साइबर अपराधियों की कारस्तानी से 3200 जन सेवा केंद्र संदेह के घेरे में आ गए हैं। इनमें से 800 नए केंद्र पुलिस सत्यापन तक बंद कर दिए गए है ...और पढ़ें

प्रयागराज में साइबर अपराध से जन सेवा केंद्र संदेह के घेरे में हैं, पुलिस सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। साइबर अपराधियों की एक कारस्तानी ने जिले में संचालित करीब 3200 जन सेवा केंद्रों को संदेह के घेरे में ला दिया है। इनमें से सबसे ज्यादा रडार पर वह 800 केंद्र हैं, जो बीते दो साल के अंदर खोले गए हैं। वैसे तो कंपनी सभी 3200 केंद्रों का पुलिस वेरीफिकेशन करा रही है, लेकिन इन 800 केंद्रों को ही बंद कर दिया गया है। सत्यापन में सब कुछ ठीक मिलने के बाद ही यह संचालित हो सकेंगे।
साइबर अपराधियों ने क्या किया
जिस तरह से साइबर अपराधियों ने इस घटना को अंजाम दिया, उससे साफ है कि उन्होंने पूरी तैयारी पहले से ही कर ली थी। फर्जी मोबाइल नंबर व ई-मेल आइडी से बनी प्रिंस के केंद्र की आइडी में करीब 16 लाख रुपये थे। 24 नवंबर को कंपनी ने इस केंद्र की आइडी जारी की थी। इसके बाद 12 दिसंबर से इसका संचालन शुरू हुआ। पहले दिन ही 16,13,790 रुपये का वालेट में टाप-अप कराया गया है। इस टापअप के लिए अलग-अलग 35 लेन-देन किए गए थे।
पुलिस जांच में होगा राजफाश
यानी, साइबर अपराधियों ने हरियाणा के सुरेश नागर की तरह कई अन्य लोगों को अपना शिकार बनाया। हालांकि यह कह पाना मुश्किल है कि साइबर क्राइम के शिकार हुए इन पीड़ितों की संख्या कितनी होगी। इसका खुलासा तो पुलिस की जांच में ही होगा। इसके अलावा पुलिस की पड़ताल में कई अन्य राज खुलेंगे। संभावना है कि इस साइबर क्राइम के शिकार हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों व जनपदों से भी निकल आएं।
सभी केंद्र संचालकों को पुलिस वेरीफिकेशन का आदेश
फिलहाल कंपनी का पूरा फोकस जनपद में संचालित उनके अन्य केंद्रों पर है। कंपनी ने सभी 3200 केंद्र संचालकों को अपनी आइडी का पुलिस वेरीफिकेशन कराने का आदेश दिया है। इनमें से 800 केंद्रों की आइडी ही बंद कर दी गई हैं। क्योंकि, यह दो साल के अंदर खुले थे।
उपभोक्ता बने वालेट खाली करने का माध्यम
कंपनी से जुड़े अफसरों का कहना है कि वालेट को खाली करने के लिए साइबर अपराधियों ने बिजली के बिलों का प्रयोग किया। लगभग 100 से अधिक बिल जमा कराए गए। इससे उपभोक्ताओं का पैसा भी बिजली विभाग के खाते में पहुंच गया और जालसाजी से जुटाई गई जो रकम वालेट में फंसी थी, वह निकल आई।

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