लखनऊ (वेब डेस्क)। रामजन्म भूमि केस में मुस्लिम पक्ष के पैरोकार हाशिम अंसारी का निधन हो गया है। अंसारी 96 साल के थे। बताया जा रहा है कि अंसारी ने सुबह 4 बजे के करीब आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हाल ही में उनको लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एडमिट कराया गया था। 96 साल के अंसारी विवादित ढांचा मामले के सबसे बुजुर्ग पैरोकार थे। वे 1959 से इस मामले का मुकदमा अदालत में लड़ रहे थे। अंसारी का अयोध्या के महंतों से भी अच्छे रिश्ते थे। अभी ईद वाले दिन महंत ज्ञानदास ने उनके घर जाकर उन्हें ईद की मुबारकबाद भी दी थी।

महंत ज्ञान दास पहुंचे हाशिम के आवास रो पड़े महंत ज्ञान दास

महंत ज्ञान दास हाशिम के आवास पहुँचे श्रद्धांजलि दी और कहा मैंने अपना मित्र खो दिया।महंत ज्ञान दास बोलते बोलते रो पड़े । अयोध्या राम जन्म भूमि मुख्य पुजारी आचार्य सतेंद्र दास पहुचे हाशिम के घर । आचार्य का बयान हाशिम की मृत्यु राम लला के मसले के लिए हानिकारक । हाशिम साहसी मुस्लिम पक्षकार जिन्होंने राम लला के टेंट में रहते नहीं देखने की बात कही । हाशिम अयोध्या मसले में चाहते थे सुलह । हाशिम अपने जीवन में मसले का कहते थे हल । अयोध्या में शोक की लहर।

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जीवन परिचय

हासिम अंसारी 96 साल के थे ।इनके पिता का नाम करीम बख्श था। राम जन्मभूमि का मुकदमा 1949 में इन्होंने खुद दायर किया था । इनके परिवार में एक लड़का और एक बेटी है । लड़का इक़बाल ऑटो चलाकर घर का खर्चा चलता था । रामजन्मभूमि आंदोलन में इनकी अहम भूमिका रही है । समय -समय समझौते को लेकर ये काफी अहम भूमिका निभा रहे थे । मोदीजी की भी काफी तारीफ करते थे अपने जीते जी ये राममन्दिर विवाद का समाधान चाहते थे हाशिम अंसारी को शायद आज कोई नहीं जानता और पहचानता, अगर वह राम मंदिर विवाद के एक पैरोकार न होते, उनकी दुनियाभर में पहचान का यही सबसे बड़ा आधार है, यह मुद्दा सबसे ज्यादा 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद सुर्खियों में आया लेकिन 96 साल के अंसारी पिछले 60 सालों से इस केस को लड़ रहे थे।


हालांकि हाशिम अंसारी की आखिरी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। उनकी ख्वाहिश थी कि उनके जिंदा रहते राम मंदिर विवाद सुलझ जाए। अंसारी ने विवाद को लेकर राजनैतिक पार्टियों द्वारा की जा रही राजनीति पर भी रोष जताया था। गौरतलब है कि अयोध्या में राम मंदिर का विवाद कई सालों से चल रहा है। इसको लेकर पूरे देश में आंदोलन और लड़ाई भी हुए। लोगों का कहना है कि इस मामले में राजनीतिक दलों ने खूब रोटियां सेंकी लेकिन विवाद का रास्ता नहीं निकाला जा सका।अब सरकारों की ओर से मामला कोर्ट में होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है।

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हिन्दुओं में भी हाशिम अंसारी के प्रति उतना ही सम्मान है जितना मुसलमानों में

भले ही वे राम जन्मभूमि मामले में मुस्लिम समुदाय के सबसे बड़े पैरोकार हों लेकिन अयोध्या के हिन्दुओं में भी हाशिम अंसारी के प्रति उतना ही सम्मान है जितना मुसलमानों में 96 वर्षीय मोहम्मद हाशिम अंसारी अयोध्या के काजियाने मोहल्ले में रहते हैं। उनके घर के बाहर एक तख्ती लगी है जिस पर उनके नाम के साथ ही 'याचिकाकर्ता राम जन्मभूमि' लिखा है। पिछले साठ सालों से यही हाशिम अंसारी की मुख्य पहचान भी है। राम जन्मभूमि विवाद में वे ही सबसे पुराने और सबसे उम्रदराज याचिकाकर्ता हैं।

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1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने किया केस
1921 में पैदा हुए हाशिम अंसारी ने 1949 में पहली बार इस मामले में एक मुकदमा दर्ज करवाया था जब विवादिद ढांचे के भीतर कथित रूप से मूर्तियां रखी गई थीं, उनका कहना था कि लोगों के कहने के कारण ही उन्होंने ऐसा किया था। गौरतलब है कि 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस मामले में एक केस किया तब भी हाशिम अंसारी एक और पैरोकार बने।

इमरजेंसी में भी जेल में थे अंसारी
1975 में जब देश में इमरजेंसी लगाई गई थी तब भी हाशिम अंसारी को गिरफ्तार किया गया था और करीब 8 महीने वह जेल में रहे।

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कब और कैसे हुआ रामजन्म भूमि विवाद

6 दिसंबर, 1992: हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचा ढहा दिया। इसके बाद यहां एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया। उधर प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया।
8 दिस.1992: अयोध्या में कर्फ्यू, जन्मभूमि परिसर केन्द्रीय सुरक्षा बालों को सौंप दिया गया।
1 जन.1991: हरिशंकर जैन नामक की मांग पर न्यायालय भगवान् श्री राम के राग, भोग, पूजन की अनुमति दी
7जन. 1993: भारत सरकार ने विवादित ढांचें को घेरते हुए उसके चारो ओर की 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया।

16 दिसंबर, 1992: विवादित ढांचें के तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एम.एस. लिब्रहान आयोग का गठन हुआ.
जनवरी 2002: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।
अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।
मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। खुदाई कार्य हेतु विदेशों से विशेषज्ञ आये और सभी पक्षों के प्रतिनिधियों के साथ साथ प्रशासनिक देख रेख और वीडियोग्राफी में खुदाई कार्य किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि विवादित ढांचें के नीचे मंदिर के अवशेष होने के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। इससे सामान्य मुस्लिम समाज में भी इस स्थान को हिन्दुओं को सौंप देनें की मानसिकता पुख्ता होनें लगी।
जुलाई 2005: संदिग्ध इस्लामी आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी एक जीप का इस्तेमाल करते हुए विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षा बलों ने पांच आतंकवादियों को मार गिराया।
जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी विवादास्पद रिपोर्ट सौंपी।
28 सितंबर 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।
30 सितंबर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसे सभी पक्ष असहमत हुए।

Posted By: Ashish Mishra

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