बाघ-तेंदुओं की बढ़ती आबादी और घटते जंगल से बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष
Manav Vanya Jeev Sangharsh: जंगली जानवर आबादी की ओर आने लगे और वन्य जीव-मानव का संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। बाघ व तेंदुआ के प्राकृत्य वास और उनके क ...और पढ़ें
जागरण टीम, लखनऊ : दुधवा टाइगर रिजर्व समेत पूरी तराई बेल्ट के करीब 1230 वर्ग किलोमीटर के लंबे परिक्षेत्र में तेजी से बढ़ी बाघ और तेंदुआ की संख्या इंसानों के लिए बड़ा खतरा बनी है। जंगलों में इनका कुनुबा तेजी से बढ़ा, लेकिन जंगल बढ़ने के स्थान पर सिकुड़ गए। इसी कारण जंगली जानवर आबादी की ओर आने लगे और वन्य जीव-मानव का संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है।
बाघ व तेंदुआ के प्राकृत्य वास और उनके क्रिटिकल जोन में इंसानी दखल ने इस संघर्ष को बढ़ावा दिया। ऐसे में जंगल से बिल्कुल सटाकर गन्ने की खेती को ही बाघ और तेंदुए घास समझने लगे। बाघिन व मादा तेंदुआ ने इसे प्राकृतिक आवास समझ यहां बच्चे देना और उनको पालना शुरू कर दिया। उधर जंगल से सटे गन्ने को काटने जब ग्रामीण गए तो वहां उनकी बाघ और तेंदुओं से मुठभेड़ हो गई। आए दिन यही घटनाएं तेजी से बढ़ने लगीं।
सामान्य तौर पर एक बाघ 16 से 20 वर्ग किलोमीटर के दायरे को अपनी टेरेटरी मानता है उसमें वह कोई दखल स्वीकार नहीं करता। बाघों की बढ़ती संख्या में उनकी घटती टेरेटरी भी एक कारक है। मानव-वन्य जीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं पर विशेषज्ञों की राय लगभग समान ही है।
9300 हैक्टेयर वनभूमि पर अवैध कब्जा
दुधवा टाइगर रिजर्व के बफरजोन में करीब 9300 हैक्टेयर वनभूमि पर अवैध कब्जा है जिसको मुक्त कराने की कवायद चल रही है। जहां तक गन्ने की जगह उड़द की खेती का सवाल है तो यहां नीलगायों की अधिकता और बाढ़ग्रस्त क्षेत्र होने की वजह से यहां उड़द की खेती कम ही होती है। जिस इलाके में बाघ व तेंदुआ की अधिकता है, वह निचला और बाढ़ग्रस्त इलाका है।
बाघ व तेंदुओं की संख्या में तो खासा इजाफा
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर डा. एच राजामोहन कहते हैं कि बाघ व तेंदुओं की संख्या में तो खासा इजाफा तो हुआ है, लेकिन जंगल का क्षेत्र नहीं बढ़ा। अब जंगल में इंसान आएगा तो बाघ-बाघिन और तेंदुआ हरकत करेंगे। जंगल में उनका सिकुड़ता साम्राज्य और जंगल में बढ़ता इंसानी दखल ऐसी घटनाओं का मुख्य कारक है।

दुधवा नेशनल पार्क के जलाशय में पानी पीता बाघ...फाइल फोटो
वन्यजीवों के प्राकृत्यवास में कमी
सेवानिवृत्त वनक्षेत्राधिकारी अशोक कश्यप की राय में जंगल के अंदर वन्यजीवों के प्राकृत्यवास में कमी और भोज्य पदार्थों की दिक्कत की वजह से ये घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ग्रामीण मना करने के बाद पशुओं के एलार्म जोन, क्रिटिकल जोन व एक्सीडेंटल जोन में भी जाने से गुरेज नहीं करते। इसी कारण बाघ और तेंदुआ उन पर हमला करते हैं। कश्यप कहते हैं कि ऐसी घटनाओं को रोकने लिए वनविभाग को ग्रामीणों से मित्रवत होना होगा। उनको अपराधी समझना या मानना बंद करना होगा। उनका कहना है कि जंगल में मानवीय दखल अलग-अलग कारणों से बहुत ज्यादा है जिससे टकराव की नौबत आ रही है।
गढ़ा गया शब्द है मानव-वन्य जीव संघर्ष
अंतरराष्ट्रीय मैग्जीन दुधवा लाइव के संपादक और वन्यजीव विशेषज्ञ केके मिश्रा कहते हैं कि एक नया शब्द गढ़ा गया है मानव वन्य जीव संघर्ष। हालात आदमी ने स्वयं उत्पन्न किए, सदियों से आदमी जंगलों में रहता आया है। ग्रामीण जीवन भी इससे अछूता नहीं रहा, गांवों में चारों तरफ जंगल खेत खलिहान नदियां तालाब जहां वन्य जीव रहा करते थे। सहजीविता के मायने बदले, इंसान ने जंगल खत्म किए नदियों तालाबों को प्रदूषित किया। नतीजतन वन्य जीवों में असहजता आई। यदि टाइगर रिजर्व अथवा अन्य संरक्षित क्षेत्रों की बात करें तो एक अध्ययन की आवश्यकता है।
संख्या बढ़ने से जीवों व मानव में संघर्ष
सीतापुर: वन्य जीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद जंगलों में वन्य जीवों की संख्या बढ़ रही है। वर्ल्ड वाइड फंड फार नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के संयोजक मुदित गुप्त ने बताया कि संख्या बढ़ने के चलते वन्य जीवों में संघर्ष हो रहा है। इस वजह से कमजोर वन्य जीव जंगल छोड़कर आबादी के आसपास अपना ठिकाना बना रहे हैं। यहां उन्हें जीवन के जरूरी संसाधन मिल जाते हैं। इसके लिए सतर्कता के साथ मानव को सह अस्तित्व को अपनाना होगा।
जीवों का प्राकृतवास का प्रभावित
बलरामपुर : 452 वर्ग किलोमीटर में फैले सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग में तेंदुओं की बहुतायत है। यहां 200 से अधिक तेंदुए हैं, जबकि तीन बाघों की पुष्टि हुई है। सोहेलवा से सटे जंगलवर्ती गांवों में बढ़ रहे मानव वन्यजीव संघर्ष का प्रमुख कारण इनके प्राकृतवास का प्रभावित होना है। कारण, जंगल में तेंदुए व बाघ के भोज्य रूपी अन्य वन्यजीवों की कमी है। प्रभागीय वनाधिकारी गौरव गर्ग का कहना है कि जंगल के आसपास जो दायरा निर्धारित किया गया है, वहां ग्रामीण प्रवेश न करें। जंगल में वाटरहोल की संख्या बढ़ाई गई है। वन्यजीवों के प्राकृत्यवास से छेड़छाड़ न करके संघर्ष पर विराम लगाया जा सकता है।

नुकसान पहुंचाने पर भेड़िया आक्रामक
बहराइच: भेड़ियों के हमलावर होने के पीछे वन्य जीव विशेषज्ञ व जीपी सिंह ने बताया कि भेड़िया झुंड में रहने वाला होता है। इनमें बदला लेने की प्रवृत्ति होती है। अगर झुंड के एक सदस्य को कोई नुकसान हो तो वह आक्रामक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि गांव की ओर भेड़िये के आने के पीछे यह भी वजह मानी जाती की उन्हें गांव में आसानी से मुर्गा, बकरी व अन्य शिकार मिल जाता है। कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग का दायरा 551 वर्ग किलोमीटर जबकि बहराइच वन प्रभाग 1043 वर्ग किलोमीटर में फैला है। वन्य जीवों के लिए यह क्षेत्र पर्याप्त है। जंगल से सटे इलाके में गन्ने की खेती भी वन्य जीव संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं। बाघ व तेंदुआ अक्सर गन्ने के खेतों को जंगल समझकर रहने लगते हैं। ग्रामीणों के सामने आने पर संघर्ष की स्थिति बन जाती है।

जागरूकता ही संघर्ष से बचाव का मंत्र
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर डा. एच राजामोहन कहते हैं कि कि जंगल में टकराव रोकने का मुख्य साधन केवल और केवल जागरूकता ही है। वह कहते में नेपाल में भारी शोरगुल के बीच यहां पहुंचे सौ से ज्यादा हाथी अभी वापस नहीं गए। टस्कर मुसीबत बना है। बाघ के मूवमेंट की जानकारी भी पहले ही हो जाती है। उनके सभी क्षेत्राधिकारियों के वाहन पर लाउडस्पीकर बंधा है, जिससे संबंधित गावों में प्रचार कर अलर्ट किया जाता है। ज्यादातर जगहों के ग्रामीण बात मानकर सावधान हो जाते हैं, जहां नहीं मानते वहीं टकराव होता है। जंगल के हर इलाके में बाघमित्र भी जाकर लोगों को लगातार जागरूक कर रहे हैं।
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वर्किंग प्लान में शामिल है नया जंगल
डीएफओ संजय विस्वाल ने बताया कि जंगल में विशाल वृक्ष लगातार गिरते जा रहे हैं। जंगल को फिर से समृद्ध करने की योजना वन विभाग की दस वर्षीय वर्किंग प्लान में तो शामिल है पर अभी उसे टाइगर रिजर्व में लागू नहीं किया गया। नया जंगल उगाने की योजना है जल्दी ही उसे अमल में लाया जाएगा।

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