यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 12, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Sawan 2025: पापों से मुक्त करती है भगवान शिव की आराधना
श्रावण मास में स्वामी अवधेशानन्द गिरि ने कहा कि सच्चे शिव भक्त स्वार्थ त्यागकर परोपकार करते हैं। भगवान शिव की ...और पढ़ें

स्वामी अवधेशानन्द गिरि (आचार्यमहामंडलेश्वर, जूनापीठाधीश्वर)। श्रावण मास में सज्ञान को मनन और ग्रहण करने का प्रयत्न करें, परमार्थ के पथ पर अग्रसर होने की चेष्टा से सर्वश्रेष्ठ संसार मे कुछ भी नहीं है। सच्चे शिव के उपासक वही हैं, जो अपने मन में स्वार्थ भावना को त्यागकर परोपकार की मनोवृत्ति अपनाते हैं। भगवान शिव की आराधना, साधना, उपासना से मनुष्य अपने पापों एवं संतापों से इसी जन्म में मुक्ति पा सकता है।
मुक्ति की अभिलाषा के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में 'महामृत्युंजय मंत्र' को सबसे उपयुक्त बताया गया है, जिसे 'त्रयंबकम् मंत्र' भी कहा जाता है। यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गई एक वंदना है। इस मंत्र में शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' (मृत्युंजय) बताया गया है।
महामृत्युंजय स्वरूप की विशेष पूजा
यह गायत्री मंत्र के समकक्ष हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है। 'श्री महामृत्युंजय महादेव मंदिर' दक्षनगरी कनखल के श्री हरिहर आश्रम में है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास में यहां भगवान शंकर के महामृत्युंजय स्वरूप की विशेष पूजा होती है। आश्रम प्रांगण में ही पारे (मर्करी) का शिवलिंग भी है।
यहीं पर सिद्धिदाता 'रुद्राक्ष वृक्ष' है, जिसके नीचे द्वादश ज्योर्तिलिंग के दर्शन भी होते हैं। भगवान महामृत्युंजय का स्वरूप अत्यंत सरल व ध्यान मुद्रा में है।
अष्ठ भुजाओं वाले
भगवान महामृत्युंजय अष्ठ भुजाओं वाले हैं। जिनके दो हाथों में अमृत कलश, चार हाथों में स्नान के लिए जल कलश, एक हाथ में रुद्राक्ष माला व दूसरे हाथ में ज्ञान मुद्रा है।
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है कल्याणकारी। शिव के नाम का उच्चारण करने से ही दुखों का निवारण हो जाता है।
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