लक्ष्मण से दूना कपि मोही... क्यों अनुज लक्ष्मण से भी ज्यादा हनुमान जी को प्रिय मानते थे रामजी? यहां पढ़ें भावुक प्रसंग
मंगलवार का दिन भगवान श्रीराम और हनुमान जी की पूजा के लिए विशेष है। श्रीरामचरितमानस के किष्किंधा कांड में वर्णित है कि सीता हरण के बाद श्रीर ...और पढ़ें

Ramcharitmanas Prasang: कब और कैसे हुआ भगवान राम का हनुमान जी से मिलन?
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Maryada Purushottam Ram: सनातन धर्म में मंगलवार का दिन बेहद खास और शुभ होता है। इस दिन भगवान श्रीराम संग हनुमान जी की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही मंगलवार का व्रत रखा जाता है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि मंगलवार के दिन भगवान श्रीराम की भेंट अपने परम सेवक हनुमान जी से हुई थी। इसके लिए हनुमान जी को मंगलवार का दिन प्रिय है।

अतः हर साल ज्येष्ठ माह के मंगलवार पर बुढ़वा या बड़ा मंगल का पर्व मनाया जाता है। इस दिन राम जी संग हनुमान जी की पूजा और भक्ति की जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि क्यों भगवान श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण से कहीं अधिक हनुमान जी को प्रिय मानते थे? आइए, इसके बारे में जानते हैं।
किष्किंधा कांड प्रेरक प्रसंग (Ramcharitmanas Prasang)
राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी काव्य रचना श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम की महिमा, लीला और उनके जीवन का पूरा वर्णन किया है। श्रीरामचरितमानस के किष्किंधा कांड में भगवान श्रीराम और उनके परम सेवक हनुमान जी के मिलन की जानकारी मिलती है।
सनातन शास्त्रों में निहित है कि सीता हरण के बाद भगवान श्रीराम और अनुज लक्ष्मण वन-वन भटकने लगे। इसी दौरान दोनों किष्किंधा पहुंचे। जहां उनकी भेंट हनुमान जी से हुई। इससे पहले जब दोनों ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुंचे, तो दोनों को देखकर वानरराज सुग्रीव डर गए। उन्होंने तत्क्षण हनुमान जी से कहा कि आप ब्राह्मण की वेश में जाकर दोनों सन्यासी से मिले और पता करें कि कहीं दोनों बालि के दूत तो नहीं है। अगर ऐसा है तो मैं ऋष्यमूक पर्वत छोड़कर चला जाऊंगा।
तब हनुमान जी ब्राह्मण वेश में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी से मिले और उनके आने का औचित्य पूछा। यह सुन भगवान श्रीराम बोले- मैं दशरथ पुत्र राम हूं और ये मेरा अनुज लक्ष्मण है। हम दोनों सीते को ढूंढ रहे हैं, जिसे दशानन रावण ने हर लिया है। इसके बाद भगवान श्रीराम ने आगे कहा-मैंने तो अपने बारे में बताया। अब आप ब्राह्मण देव बताएं कि आप कौन हैं?
यह सुन हनुमान जी, भगवान राम के चरणों में गिर पड़े और बोले-मुझे क्षमा करें, भगवन! मैं आपको पहचान न सका। धर्म अनुसार मैंने आपका परिचय पूछा। किंतु आप तो सर्वज्ञाता हैं, आपने क्यों नहीं मुझे रोका। मैं आपका परम सेवक हनुमान हूं। यह बोलते हुए हनुमान जी भावुक हो गए। उनके नयन से आंसू बहने लगे।
चौपाई
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥4॥
यह देख भगवान श्रीराम अपने परम सेवक हनुमान जी को हृदय से लगाकर बोले- हे हनुमान! तुम किंचित मात्र भी गलानि न करो। तुम मुझे अपने अनुज लक्ष्मण से अधिक प्रिय हो। मेरे लिए सब कहते हैं कि मैं सबको मानता हूं किंतु तुम्हें बता दूं कि तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो, क्योंकि तुम्हारा मेरे सिवा कोई और नहीं है। यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के किष्किंधा कांड में अंकित है।
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