Bhishma Ashtami 2026: भीष्म पितामह को कब और कैसे मिला था 'इच्छा मृत्यु' का वरदान? यहां पढ़ें पौराणिक कथा
26 जनवरी को भीष्म अष्टमी मनाई जाती है, जो महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह को समर्पित है। माघ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर उन्हों ...और पढ़ें

भीष्म पितामह के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, 26 जनवरी को भीष्म अष्टमी है। यह दिन महाभारत के महान योद्धा भीष्म को समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर एकोदिष्ट श्राद्ध मनाया जाता है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर भीष्म पितामह ने अपने शरीर का त्याग किया था।

इससे पहले महाभारत के युद्ध मैदान में अुर्जन के बाणों से भीष्म पितामह घायल हो गए थे। हालांकि, सूर्य दक्षिणायन रहने के चलते भीष्म पितामह बाण शैय्या पर पड़े रहे। वहीं, सूर्य के उत्तरायण होने के बाद भीष्म पितामह ने प्राण का त्याग किया था।
लेकिन क्या आपको पता है कि महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था। इसके बावजूद भीष्म पितामह ने सूर्य उत्तरायण होने के बाद शरीर का त्याग किया था। भीष्म पितामह की मृत्यु के बाद पांडवों ने भीष्म पितामह का श्राद्ध और तर्पण किया था। इसके लिए हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर एकोदिष्ट श्राद्ध मनाया जाता है। आइए, भीष्म पितामह के इच्छा मृत्यु की कथा जानते हैं-
भीष्म पितामह कौन थे?
महाभारत के महान योद्धा भीष्म को गंगापुत्र भी कहा जाता है। उनकी माता देवी मां गंगा थी और पिता शांतनु थे। राजा शांतनु युद्धकला में बेहद कुशल और निपुण थे। भीष्म को देवव्रत और पितामह भी कहा जाता है। महाभारत में उनकी वीरता और पुरषार्थ का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। भीष्म पितामह अपने पिता की तरह शक्तिशाली और शूरवीर थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने कौरवों का नेतृत्व किया था। घायल होने से पूर्व भीष्म लगातार दस दिनों तक युद्ध किए थे।
कब और कैसे मिला इच्छा मृत्यु का वरदान? (Ichcha Mrityu Legend)
महाभारत में भीष्म पितामह के इच्छा मृत्यु की कथा पढ़ने को मिलता है। कहते हैं कि पिता की इच्छा पूर्ति के लिए भीष्म पितामह ने आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का संकल्प (Bhishma Pratigya) लिया। इससे प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्रदान किया था। कथा कुछ इस प्रकार है।
एक बार की बात है, जब राजा शांतनु आखेट (शिकार) करने वन गए थे। राह भटकने के बाद राजा शांतनु वन में भटकते रहे। तभी उन्हें वन में एक आश्रम दिखा। उस समय तक सूर्य ढल चुका था। आसान शब्दों में कहें तो शाम हो चुकी थी। यह देख राजा शांतनु के मन में आश्रम पर ठहरने का विचार आया। तब उन्होंने आश्रम के स्वामी यानी सत्यवती के पिता से सहायता मांगी। इसी दौरान उन्हें सत्यवती पसंद आ गई।
उस समय उन्होंने सत्यवती के पिता से उनका हाथ मांगा। तब सत्यवती के पिता ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि अगर आप मेरी पुत्री के पुत्र को राजा बनाने की सहमति देते हैं, तो आपका प्रस्ताव स्वीकार्य है। नहीं तो आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती है। अगले दिन पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए भीष्म पितामह ने अपने पिता को आजीवन विवाह न करने और सत्यवती के पुत्र को राजा बनाने का वचन दिया।
गंगा पुत्र के वचनों को सुनकर राजा शांतनु बेहद प्रसन्न हुए, उन्होंने तत्काल भीष्म पितामह से वरदान मांगने को कहा। हालांकि, भीष्म पितामह ने कोई भी इच्छा प्रकट नहीं की। उस समय राजा शांतनु ने भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान (King Shantanu Boon) दिया।
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