Mahabharat Katha: सिर्फ दानवीरता ही नहीं, कर्ण की दोस्ती की भी दी जाती है मिसाल, यहां पढ़िए कारण
कर्ण महाभारत ग्रंथ के प्रमुख पात्रों में से एक रहा है। कर्ण केवल अपनी दानवीरता के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि लोग आज भी कर्ण की दोस्ती की मिसाल देते हैं ...और पढ़ें

Karna and Duryodhana friendship (AI Generated Image)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज भी कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती की मिसाल इसलिए दी जाती है क्योंकि कर्ण ने हर मुश्किल में दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा, भले ही वह जानता था कि दुर्योधन अधर्म के रास्ते पर चल रहा है। कर्ण को युद्ध से पहले ही इस बात का पता चल गया था कि वह कुंती का पुत्र व पांडवों का सबसे बड़ा भाई है, लेकिन इसके बाद भी उसने युद्ध में दुर्योधन का ही साथ दिया। आज हम आपको इसी से संबंधित कथा बताने जा रहे हैं।
इसलिए दिया दुर्योधन का साथ
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार रंगभूमि में कृपाचार्य ने कर्ण को सूत-पुत्र कहकर अपमानित किया और अर्जुन के साथ उसे द्वंद्व युद्ध करने से रोक दिया। तब दुर्योधन ने आगे बढ़कर पांडवों के सामने ही, शस्त्र-प्रतियोगिता के दौरान कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया। उस दिन कर्ण के केवल राज्य प्राप्त नहीं किया, उसे सम्मान भी मिला, जिसका वह अधिकारी था।
इसके बाद कर्ण उसके प्रति पूरी तरह निष्ठावान हो गया। इस प्रसंग से पता चलता है कि जब सभी लोग कर्ण के कौशल को नजरअंदाज करते हुए केवल उसके कुल को ही देख रहे थे, तब सिर्फ दुर्योधन ने ही उसका साथ दिया। यही कारण है कि गलत होने के बाद भी कर्ण ने दुर्योधन का ही साथ दिया।

(AI Generated Image)
ठुकरा दिया कृष्ण जी का प्रस्ताव
कथा के अनुसार, महाभारत का युद्ध होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को उनके जन्म का रहस्य बताते हुए कहा था कि कुंती के पुत्र और पांडवों के बड़े भाई हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण से यह भी कहा कि अगर वह दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों की ओर आ जाएं, तो वे चक्रवर्ती सम्राट बनेंगे और पांचों पांडव उनकी सेवा करेंगे।
दुर्योधन की दोस्ती के लिए कर्ण ने पांडवों के साथ शामिल होने के इस मौके को ठुकरा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कर्ण की दोस्ती के प्रति इस निष्ठा और समर्पण की प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण से कहा कि तुम जैसा मित्र पाना सौभाग्य की बात है और तुम्हारी यह मित्रता हमेशा याद रखी जाएगी।
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