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श्रीनगर, नवीन नवाज। अनुच्छेद 370 के खात्मे के साथ ही कश्मीर में बदलाव की बयार दिखी है। मीडिया का बड़ा तबका भी इससे अछूता नहीं है। कभी अलगाववादी और कट्टरपंथियों का मुखपत्र कहा जाने वाला कश्मीरी मीडिया अब जिहादी तत्वों से आजादी की सांस ले रहा है। यही वजह है कि मीडिया का यह वर्ग अब नए कश्मीर के निर्माण की उम्मीदें जगा रहा है।

स्थानीय मीडिया समूह

कश्मीर घाटी में मीडिया के एक बड़े वर्ग की संपादकीय नीतियां निरंतर सवालों के घेरे में रहीं। यह अखबार अलगाववादी तत्वों की बयानबाजी और सुरक्षाबलों पर आधारहीन आरोपों को ही तवज्जो देते दिखते थे। साथ ही कश्मीर के विलय जैसे संवेदनशील मसलों पर भी राष्ट्रविरोधी तत्वों को अधिक तवज्जो देते दिखते थे। ऐसे में पाकिस्तान और विदेशी मीडिया अकसर इनकी खबरों का हवाला देकर भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते थे। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि बहुत से स्थानीय मीडिया समूह अलगाववादी और आतंकी संगठनों और उनके सीमापार बैठे आकाओं के दबाव के कारण आतंक का खौफनाक चेहरा दिखाने से भी परहेज करते थे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर और पाक पोषित मानवाधिकारों के तथाकथित झंडाबरदारों के संरक्षण के चलते प्रशासन भी इन पर कार्रवाई से परहेज करता रहा। इस एजेंडे के पीछे आतंकियों का भय तो था ही, कुछ मामलों में सीमापार से फंडिंग के भी आरोप लगे। पर केंद्र के आतंक के खिलाफ कड़े कदमों और अनुच्छेद 370 पर बड़े फैसले ने इन मीडिया समूह को अलगाववादियों के एजेंडे से आजादी दिला दी। अब वह खुलकर कश्मीर के विकास और रोजगार जैसे मसलों पर बहस चला रहे हैं। अब राष्ट्रविरोधी तत्वों का एजेंडा इन समाचार पत्रों के पन्नों से गायब हो चुका है।

30 साल में पहली बार अखबारों में बदलाव 

एक पत्रिका व समाचारपत्र के संपादक रहे समाजसेवी रफी रज्जाकी ने कहा कि मैंने 30 साल में पहली बार अखबारों में इस तरह का बदलाव देखा है। पहली बार अखबारों में आम कश्मीरी के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास व मौलिक ढांचे से जुड़े मुद्दों पर लेख नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू हो या अंग्रेजी सभी की आवाज में बदलाव और बेहतरी की उम्मीद दिखाई पड़ती है।

भड़काऊ व अलगाववाद के बदले सदभाव और सौहार्द 

वर्ष 2016 में भड़काऊ और अलगाववाद पोषित रिपोर्टिंग के चलते प्रतिबंधित होने वाले एक अंग्रेजी दैनिक के लेखों में सदभाव और सौहार्द जैसे शब्द आ गए हैं। उसने अपने संपादकीय में लिखा कि हम कौन सा और कैसा जीवन जीते हैं, यह हमारे हाथ में है। जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए हमें एक संतु़लित सादी जिंदगी बसर करनी चाहिए, सभी के लिए सदभाव और सौहार्द की भावना होनी चाहिए। अन्य बड़े समाचार पत्रों में भी ऐसे बदलाव दिखे।

संपादकीय में आया बदलाव

चट्टान नामक एक उर्दू अखबार ने अपना संपादकीय बेरोजगारी के मसले पर केंद्रित रखा। इस अखबार के बारे में दावा किया जाता है कि 1990 में यह अलगाववादी विचारधारा को खुलकर प्रचारित करता था। रोजनामा घडि़याल नामक अखबार ने ग्रामीणों के शहर की तरफ पलायन पर संपादकीय छापा जबकि एक अंग्रेजी अखबार ने जैविक खेती पर लेख प्रकाशित किया। 

ब्राइटर कश्मीर के संपादक फारूक वानी ने कहा कि हमारा संपादकीय तटस्थ और जनता के सरोकारों से जुड़ा होना चाहिए, यही हमारा मकसद और काम है। उन लोगों को अपनी नीतियां बदलने की जरुरत है जो कश्मीरियों की अनदेखी कर किसी दूसरे के एजेंडे पर चलते रहे हैं।

टेरर फंडिंग से जुड़े रहे तार

कश्मीर मामलों के जानकार डा. अजय चुरुंगु ने कहा प्रेस की भूमिका बहुत अहम होती है। कश्मीर में कई अखबार तो जिहादियों का मुखपत्र बन चुके थे। इनमें अलगाववाद का प्रचार होता था। कुछ अखबारों ने जनमानस में राष्ट्रविरोधी भावनाओं का जहर भरने में अहम भूमिका निभाई है। कइयों के तार टेरर फंडिग और हवाला से भी जुड़े रहे। अब इन लोगों को हकीकत समझ आने लगी है।

आप कश्मीर के अखबार देखें तो आपको पता चल जाएगा कि अब कोई भी पुष्टि किए बिना खबरें नहीं छाप रहा है। अलगाववादी भावनाओं को प्रोत्साहित करने वाले लेख बंद हो चुके हैं। अगर यूं ही चला तो जल्द ही कश्मीर में जिहादी मानसिकता और अलगाववाद का सफाया हो जाएगा। 

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Posted By: Preeti jha

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