चीन के बहकावे में आकर भारत से रिश्ते बिगाड़ने पर आमादा है पड़ोसी देश मालदीव
चीन की वजह से भारत और मालदीव के रिश्ते लगातार गिरावट की तरफ हैं। ऐसे में अगले माह वहां पर राष्ट्रपति चुनाव भी होना है।
नई दिल्ली (जागरण स्पेशल)। मालदीव और भारत के रिश्तों में आई गरमाहट अब लगातार कम हो रही है। इसकी वजह बना है चीन। चीन के बहकावे में आकर मालदीव की मौजूदा सरकार भारत से अपने रिश्ते न सिर्फ खराब कर रही है बल्कि खत्म करने की ओर बढ़ रही है। ये सबकुछ मौजूदा सरकार के कार्यकाल में तेजी से हुआ है। वहीं मालदीव में इसी वर्ष सितंबर में राष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं। मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन जहां चीन के काफी करीब हैं वहीं पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद भारत के काफी करीब रहे हैं। ऐसे में भारत की निगाह मालदीव में चुनाव पर भी है। मौजूदा सरकार के साथ भारत के संबंधों में आई तल्खी के चलते सरकार की नजर वहां के राजनीतिक घटनाक्रम पर बनी हुई है।
मालदीव की भौगोलिक स्थिति
मालदीव की भूगौलिक स्थिति की यदि बात करें तो भारत के लिए यह न सिर्फ रणनीतिक तौर पर काफी अहम है बल्कि कूटनीतिक तौर पर भी ये काफी मायने रखता है। वहीं चीन की यदि बात करें तो भारतीय नौसेना के जहाजों और पनडुब्बियों पर नजर रखने के लिए वह इस देश को सबसे अहम मानता है। यही वजह है कि नेपाल, पाकिस्तान, बर्मा, बांग्लादेश और श्रीलंका को अपने जाल में फंसाने के बाद चीन मालदीव को अपने वश में करना चाहता है। आपको बता दें कि मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन समर्थित हैं। यही वजह है कि उनके लिए भारत से अधिक पसंद चीन बना हुआ है। हिंद महासागर के इस देश पर चीन की काफी समय से नजर है। सामरिक दृष्टि से अहम मालदीव में सड़क, पुल और हवाई अड्डा और बंदरगाह का निर्माण करने में जुटा है।
हेलीकॉप्टर लौटाना चाहता है मालदीव
चीन के वश में आया मालदीव अब भारत के दिए हेलीकॉप्टर और वहां मौजूद भारतीय सैनिकों को अब अपने यहां पर नहीं रखना चाहता है। मालदीव चाहता है कि भारत उसके यहां से अपने सैन्य हेलीकॉप्टर और सैनिकों को वापस बुला ले। दोनों देशों का इस संबंध में करार जून में समाप्त हो चुका है। भारत में मालदीव के राजदूत अहमद मोहम्मद ने यह इच्छा जाहिर की है। गौरतलब है कि भारत ने वर्ष 2013 में भारत ने मालदीव को दो ध्रुव हेलीकॉप्टरों दिए थे। यह एक समझौते के तहत दिए गए थे। इनमें से एक को कोस्ट गार्ड तो दूसरे को भारतीय नौसेना इस्तेमाल में लाती है। मौजूदा समय की बात करें तो मालदीव में फिलहाल भारतीय नौसेना के 28 जवानों का दल मौजूद है।
भारतीयों को वीजा देने से इंकार
इससे पहले मालदीव भारतीयों को नौकरी के लिए वर्क परमिट और बिजनेस वीजा जारी करने से इंकार कर चुका है। इसकी वजह से कामगारों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो छुट्टी पर अपने घर वापस आए थे लेकिन अब वीजा न मिलने की वजह से वह वापस नहीं जा पाए। पिछले दिनों भारत ने मालदीव की तरफ से खड़ी की जा रहीं परेशानियों को कूटनीतिक तरीके से उठाया भी था। लेकिन इसका सकारात्मक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं दिया है। वहीं हेलीकॉप्टरों को लेकर सामने आई मालदीव के राजदूत की बात अपनी अलग कहानी बयां कर रही है।
भारतीयों को नौकरियों में आवेदन करने से इंकार
आपको यहां पर बता दें कि मालदीव इससे पहले भारतीयों को अपने यहां नौकरियों में आवेदन करने तक से इंकार कर चुका है। हालांक यह वहां की सरकार ने सीधेतौर पर न करके दूसरे तरीके से किया है। वहां पर नौकरियों के लिए निकले आवेदनों में साफतौर पर लिखा गया था कि भारतीय इसके लिए आवेदन न करें।
भारत की मदद को भूल गया मालदीव
आपको यहां पर ये भी बता दें कि मालदीव में वर्ष 2014 में पानी का संकट आया था तब भारत ही था जिसने सबसे पहले उसकी तरफ मदद का हाथ बढ़ाया था और उस वक्त भारत सरकार ने हजारों लीटर पानी मालदीव को मुहैया करवाया था। मालदीव में उस वक्त आए इस संकट की वजह वहां के वाटर प्लांट में लगी भयंकर आग थी जिसकी वजह देश की राजधानी भी प्यासी हो गई थी।
मालदीव भूल गया ऑपरेशन कैक्टस
मालदीव आज वर्ष 1988 के उस वाकये को भी भूल चुका है जब भारत ने ही उसपर कब्जा होने से बचाया था। इसके लिए चलाए गए ‘ आपरेशन कैक्टस’ को अभी तक विदेशी धरती पर भारत का सबसे सफल ऑपरेशन माना जाता है। इसके अलावा भारत का वहां के विकास कार्यों में काफी योगदान रहा है।
भारत का मालदीव पर प्रभाव
1965 में आजादी के बाद भारत मालदीव को मान्यता देने वाले देशों में शामिल था। इसके बाद भारत ने अपने संबंधों में प्रगाढ़ता लाते हुए वर्ष 1972 में राजधानी माले में अपना दूतावास भी स्थापित किया था। मालदीव में करीब 30 हजार भारतीय रहते हैं। मालदीव के एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित होने के बाद से ही भारत का यहां प्रभाव रहा है। मगर हालिया समय में यहां तस्वीर बदली है और चीन का दखल बढ़ा है। चीन पहले ही श्रीलंका, पाकिस्तान (ग्वादर) और ईरान में अपनी पैठ बना रहा है। ऐसे में सामरिक दृष्टि से महत्वूपर्ण 1200 द्वीपों वाले इस देश में भी चीन के दखल ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। दूसरी तरफ मालदीव की कारगुजारियों पर यदि नजर डालें तो पता चलता है कि सीरिया में मौजूद विदेश आतंकियों में सबसे ज्यादा संख्या इसी देश के नागरिकों की है। इसके अलावा उड़ी हमले के बाद पाक में सार्क बैठक का बहिष्कार करने के फैसले पर सिर्फ मालदीव ने आपत्ति जताई थी। यह सब कुछ भूलकर अब मालदीव पूरी तरह से चीन की गोद में बैठ चुका है।
मालदीव में चीन के बढ़ते कदम
मौजूदा समय में चीन वहां पर फ्रेंडशिप ब्रिज तैयार कर रहा है। इसके अलावा वह वहां पर बंदरगाहों का विकास भी करने में लगा है जो भविष्य में उसके काम आने वाले हैं। इसके अलावा अस्पताल का निर्माण भी चीन यहां पर कर रहा है। वहीं चीन मालदीव को ऋण देकर भी अपने साथ मिला रहा है। यामीन सरकार के बाद से ही यहां पर चीनी नौसेना के जहाजों की आवाजाही में इजाफा साफतौर पर दिखाई देता है। यहां के हवाई अड्डे से माले तक सड़क निर्माण करने के अलावा चीन यहां के एयरपोर्ट को भी अत्याधुनिक बनाने में लगा है। इतना ही नहीं वर्ष 2009 में चीन ने यहां पर अपना दूतावास खोला था, जबकि भारत यहां पर पहले से ही मौजूद है। मालदीव सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन) का सदस्य भी है। भारत के लिए इस क्षेत्र में अपना नेतृत्व बनाए रखने के लिए उससे बनाकर रखना भी अहम है।
यामीन सरकार के बाद से है संबंधों में तनाव
मालदीव में यामीन सरकार के आने के बाद से ही भारत के साथ उसके संबंधों में तनाव आया है। इसी वर्ष फरवरी में मालदीव की सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी करके जेलों में बंद विरोधी दलों के राजनीतिज्ञों को रिहा करने को कहा था। भारत ने मालदीव से इस आदेश का पालन करने को कहा था। मालदीव में आपात काल लागू करने के घटनाक्रम पर भी भारत ने अपनी कूटनीतिक आपत्ति जताई थी। लेकिन मालदीव सरकार ने न तो कोर्ट के आदेश का ही पालन किया और न ही विश्व बिरादरी की ही कोई इज्जत की।
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