भारत और चीन के बेहतर रिश्ते बदल सकते हैं वैश्विक समीकरण, लेकिन सतर्कता बेहद जरूरी

पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाकात सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हो रही है। यह मुलाकात बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और अमेरिका के साथ रिश्तों मे...और पढ़ें
विवेक तिवारी जागरण न्यू मीडिया में एसोसिएट एडिटर हैं। लगभग दो दशक के करियर में इन्होंने कई प्रतिष्ठित संस्थानों में कार् ...और जानिए
नई दिल्ली, विवेक तिवारी। भारत और चीन के रिश्ते एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल बाद चीन पहुंचे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हो रही है। यह मुलाकात महज़ शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के एजेंडे तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और अमेरिका के साथ रिश्तों में आई खटास के बीच नई कूटनीतिक बिसात के रूप में देखा जा रहा है। दिलचस्प यह है कि गलवान झड़प के बाद राजनीतिक तनाव और चीनी सामानों के बहिष्कार की आवाज़ों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है। हालांकि इस असंतुलन का सबसे बड़ा नुकसान भारत को उठाना पड़ा है। ऐसे में मोदी-जिनपिंग की यह मुलाकात महज़ एक औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक दिशा तय करने वाली कड़ी मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की टैरिफ वॉर के चलते एशिया के इन दो बड़े देशों का करीब आना काफी सकारात्मक कदम है। लेकिन भारत को चीन के साथ किसी भी तरह के रिश्तें को बेहतर बनाने के साथ ही बेहद सतर्क रहना होगा। भारत को ये देखना होगा कि चीन से कारोबारी रिश्ते बढ़ाने में उसे कितना फायदा है।
एक तरफ अमेरिका की टैरिफ नीति वैश्विक व्यापार को झकझोर रही है, तो दूसरी ओर भारत और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक घाटे और अनसुलझे सीमा विवादों ने रिश्तों को जटिल बनाया है। ऐसे में यह बैठक सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति समीकरणों को प्रभावित करने वाली मानी जा रही है। 99 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार घाटे के बीच पीएम मोदी का चीन दौरा और शी जिनपिंग से मुलाकात इस सवाल को और तीखा कर देती है कि क्या भारत वास्तव में अपने हित साध पा रहा है या फिर रिश्तों में ‘सॉफ्टनिंग’का फायदा चीन ही उठा रहा है।
भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल मोहन भंडारी कहते हैं कि चीन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ऐतिहासिक है। दोनों नेता आने वाले समय में दुनिया का ग्लोबल ऑर्डर बदलने की क्षमता रखते हैं। वहीं अपनी जनसंख्या की वजह से ये दोनों देश दुनिया के सबसे बड़े बाजार भी हैं। वहीं अमेरिका को भी ये संदेश मिल गया है कि भारत अब उनकी धमकियों से डरने वाला नहीं है। चीन में हो रही ये मीटिंग रशिया, चीन और भारत के आपसी सहयोग को और मजबूत करेगा। ये संभव है कि चीन में हो रही इस बैठक से कोई बहुत बड़ा ऐलान न हो लेकिन इस बैठक के बाद दी जाने वाली जॉइंट स्टेटमेंट्स से भविष्य में भारत और चीन के रिश्तों की गर्मी को महसूस किया जा सकेगा। लेकिन हमें चीन के साथ संबंध बेहतर बनाने के साथ ही हर कदम पर बेहद सतर्क रहना होगा। चीन पर पूरी तरह से भरोसा करना समझदारी नहीं होगी। हमें चीन के साथ भारत के रिश्तों को इतिहास को याद रखना होगा। 1952 से 1954 के बीच भारत और चीन के संबंध खराब होने शुरू हुए। 61 साल पहले लद्दाख के हॉट स्प्रिंग इलाके में चीनी सैनिकों ने धोखे से हमारे दस जवान मार डाले थे। इसी बीच चीन ने चुपके से ल्हासा से अक्साई चिन क्षेत्र से होते हुए एक सड़क बनाई है, जिसका नाम शिनजियांग-तिब्बत हाईवे या G219 राजमार्ग है, जो 1950 के दशक में बना था और 1962 के भारत-चीन युद्ध का एक प्रमुख कारण था। हिंदी-चीनी भाई-भाई के रिश्ते के बीच ही भारत पर चीन ने हमला किया था। हमें इसे नहीं भूलना चाहिए। आज भी भारत जॉनसन लाइन और मैकमहन लाइन को मानने की बात कहता है जबकि चीन इसे नहीं मानता। 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण दिए जाने से भी चीन भारत को दुश्मन के तौर पर देखता है। वहीं अरुणाचल को भी वो चीन का हिस्सा बताता रहा है। ऐसे में सीमा विवादों को ध्यान में रखते हुए भारत को चीन से किसी भी तरह के संबंध में सतर्क रहना होगा।
लेकिन आज पूरी दुनिया में जो आर्थिक समीकरण दिख रहे हैं चीन भारत के लिए मददगार साबित हो सकता है। भारत और चीन मिल कर अमेरिका को उसकी टैरिफ वॉर का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। रूस इन हालात में दोनों दोशों को और करीब आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। रूस लम्बे समय से रूस, भारत और चीन का एक एलायंस बनाने की बात कर रहा है जिसे आरआईसी नाम दिया जा रहा है।
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