लाल आतंक के 'गढ़' पर वार, पांच सालों से माओवादी आंदोलन में नहीं हुई जिले से कोई नई भर्ती
गढ़चिरौली के सिरोंचा तालुका में शिक्षा क्रांति ने माओवादी गतिविधियों को समाप्त कर दिया है। कभी लाल आतंक का गढ़ रहे इस क्षेत्र की आश्रमशालाओं में पढ़ने ...और पढ़ें

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ओमप्रकाश तिवारी, गढ़चिरौली: गढ़चिरौली के सिरौंचा तालुका की भौगोलिक विकटता का अनुमान मुंबई या दिल्ली में बैठकर नहीं लगाया जा सकता। इस तालुका की दूरी जिला मुख्यालय गढ़चिरौली से 285 किमी है, जबकि पड़ोसी राज्य तेलंगाना का जिला मंचेरियल सिर्फ 65 किमी दूर है।
बरसात के दिनों में जब छह महीने सिरौंचा का संपर्क करीब छह माह तक गढ़चिरौली से कटा रहता है, तो लोगों को मंचेरियल होकर ही गढ़चिरौली आना पड़ता है। ऐसी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में शिक्षा की क्रांति से बंदूकों का जुनून हार गया है।
शिक्षा क्रांति का कमाल
सिरौंचा तहसील जो कभी विकट माओवादी गतिविधियों के लिए जानी जाती थी, आज वहां की सरकारी आश्रमशालाओं में पढ़ रही बच्चियां ऐसी अंग्रेजी बोलती हैं, जिसे सुनकर दिल्ली-मुंबई के कांवेंट स्कूलों के बच्चे भी हैरान रह जाएं। बड़े सुनियोजित तरीके से लाई गई इसी शिक्षा क्रांति का कमाल है कि पिछले पांच वर्षों से माओवादी आंदोलन में जिले के किसी गांव से कोई नई भर्ती नहीं हुई है।
वनवासी समाज में शिक्षा की अलख जगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 2011 में अपने समाज कल्याण विभाग की तरफ से वांगेपल्ली (तालुका अहेरी), सिरौंचा और नवेगांव (तालुका गढ़चिरौली) में आवासीय विद्यालयों की शुरुआत की। इन्हें ‘आश्रमशाला’ नाम दिया गया।
आवागमन के साधन न होने के कारण सिर्फ स्कूल खोल देने से बच्चे नहीं आ सकते थे, इसलिए ऐसी आश्रमशालाओं की परिकल्पना की गई, जहां बच्चे रहकर शिक्षा ग्रहण कर सकें। 2014 में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने के बाद इन्हीं आश्रमशालाओं को और बेहतर सजाया-संवारा गया।
सामाजिक न्याय विभाग के सहायक आयुक्त डॉ. सचिन मडावी बताते हैं कि पहले इन आश्रमशालाओं में छठवीं कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या दसवीं तक पहुंचते-पहुंचते आधी हो जाती थी, लेकिन अब तीनों आश्रमशालाओं की दसवीं कक्षा में उनकी क्षमता भर, यानी 40-40 विद्यार्थी हैं।
पिछले वर्ष इन आश्रमशालाओं के सभी बच्चे न सिर्फ दसवीं में पास हुए, बल्कि एक ने तो 92 प्रतिशत अंक प्राप्त कर जिले में टॉप भी किया था। अब स्थिति यह है कि दो वर्षों से 200 बच्चों (प्रत्येक विद्यालय) की क्षमता वाले इन विद्यालयों में प्रवेश के लिए 500 से अधिक आवेदन आते हैं। लॉटरी से 200 बच्चों का चयन होता है। उसके बाद हाउसफुल का बोर्ड लगा दिया जाता है।

इंजीनियरिंग और मेडिकल में चयन
इन स्कूलों में पढ़ रहीं नौवीं-दसवीं की लड़कियां न सिर्फ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं, बल्कि इस वर्ष तो राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल परीक्षा ‘नीट’ में दो बच्चों का चयन भी हो चुका है। इन्हीं विद्यालयों से निकली एक लड़की रत्नागिरि के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस द्वितीय वर्ष की छात्रा है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए तो यहां से निकले एक दर्जन से अधिक बच्चों का चयन हो चुका है।
जिन बच्चों को समाज कल्याण विभाग के विद्यालयों में प्रवेश नहीं मिल पाता, उनके लिए आदिवासी विभाग की ओर से बड़ी संख्या में चलाए जा रहे आवासीय विद्यालयों का विकल्प भी खुला रहता है। वहां भी बच्चे विद्यालय के छात्रावास में ही रहकर पढ़ाई करते हैं। जिले के प्रत्येक गांव में प्रशासन की तरफ से पुस्तकालय भी शुरू किए गए हैं।
हवाई यात्रा कर इसरो गए थे बच्चे
बीते दो वर्ष से इन स्कूलों के 120 बच्चों को हवाई यात्रा करवाकर अंतरिक्ष केंद्रों पर ले जाया गया है। जून में जब ये बच्चे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) जाने के लिए बेंगलुरू की यात्रा पर निकले तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें छोड़ने नागपुर के डा. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विमानतल पर मौजूद थे। 2026 में बच्चों को राष्ट्रपति भवन व राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलवाने की योजना है।

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