52 साल तक इंसानों में ड्रैगन देखती रही ये महिला, वजह जानेंगे तो उड़ जाएंगे हाेश
नीदरलैंड्स से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सभी के होश उड़ा दिए हैं। जी हां वहां की एक महिला को इंसानों के चेहरे ड्रैगन जैसे दिखने लगे थे। उनमें चमकीली आंखें और बड़े-बड़े कान नजर आते थे। ये एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। इसका नाम प्रोसोपोमेटामॉर्फोप्सिया है। बताया जा रहा है कि महिला 52 साल तक लगातार इससे जूझ रही थी।

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए अगर आपको सभी इंसानों के चेहरे में ड्रैगन के चेहरे नजर आने लगें तो कैसा लगेगा? सुनकर आप चौंक तो जरूर गए होंगे, लेकिन कुछ ऐसा ही नीदरलैंड्स के शहर द हेग में रहने वाली एक महिला के साथ हुआ था। ये मामला साल 2011 में सामने आया था और बाद में इस पर सर्वे किया गया। इस रिपोर्ट को द लैंसेट (The Lancet) नाम के मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2011 जुलाई में 52 साल की एक महिला साइकोलॉजिस्ट के क्लीनिक पहुंची। उसे बचपन से ही लोगों के चेहरे बदलते हुए नजर आते थे। वो किसी को ठीक से पहचान तो लेती थी लेकिन कुछ ही मिनटों बाद उनके चेहरे उसे अजीब से लगने लगते थे। उन्हें हर किसी के चहरे में ड्रैगन नजर आता था।
चेहरे काले पड़ जाते थे, लंबे नुकीले कान निकल आते थे। थूथन (snout) बाहर निकल आता और त्वचा पर अजीब सी परत दिखाई देती थी। आंखें बड़ी और चमकीली हो जातीं थीं। जिसका रंग पीली, हरा, नीला या लाल होता था। महिला को दिन में कई बार दीवारों, कंप्यूटर स्क्रीन या बिजली के सॉकेट से भी ड्रैगन जैसे चेहरे निकलते हुए दिखाई देते थे। रात को अंधेरे में भी उसके साथ ऐसा ही होता था।
बचपन में कर देती थी इग्नोर
बचपन में उसे ये सब अजीब नहीं लगता था, लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ी होती गई, उसे समझ आया कि बाकी लोग ऐसा कुछ नहीं देखते। धीरे-धीरे वो अकेलापन महसूस करने लगी, डिप्रेशन का शिकार हो गई। उसने गलत आदतें अपना ली। दरअसल, डिप्रेशन को कम करने के लिए उसने शराब का सहारा ले लिया। अब आप सोच रहे होंगे कि ये समस्या आखिर क्या थी?
क्या थी ये बीमारी?
महिला को जिस समस्या का सामना करना पड़ा, उसे कहते हैं प्रोसोपोमेटामॉर्फोप्सिया (Prosopometamorphopsia)। ये एक बहुत ही दुर्लभ और अजीब न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। इसमें इंसान को दूसरों के चेहरे अजीब या डरावने से नजर आने लगते हैं। कभी चेहरा धुंधला लगता है तो कभी आंखें, नाक या होंठ अपनी जगह से हिले हुए दिखाई देते हैं। कभी चेहरा कार्टून की तरह खिंचा हुआ लगता है तो कभी शीशे में अपना चेहरा भी बिगड़ा हुआ नजर आने लगता है।
फेस ब्लाइंडनेस से अलग है ये बीमारी
लेकिन खास बात तो ये है कि इसमें इंसान पहचान सकता है कि सामने वाला कौन है। यानी पहचानने की क्षमता बनी रहती है, बस चेहरा सही से नजर नहीीं आता है। आपको बता दें कि ये बीमारी प्रोसोपेग्नोसिया (Prosopagnosia) यानी कि फेस ब्लाइंडनेस से अलग है। Prosopagnosia में लोग चेहरों को पहचान ही नहीं पाते, जबकि प्रोसोपोमेटामॉर्फोप्सिया में चेहरा पहचान में आता है, पर बिगड़ा हुआ दिखता है।
लक्षण कब नजर आते हैं?
- तनाव
- थकान
- रोशनी से परेशानी
- डर
- लोगों से दूरी बनाना
क्या है इलाज?
रिपोर्ट में बताया गया है कि महिला को शुरुआत में 300 एमजी वैल्प्रोइक एसिड (Valproic Acid) दी गई। इस दवा से उसे जिंदगी में पहली बार कुछ दिन बिना लक्षणों के मिले। लेकिन बाद में उसे नींद में अजीब आवाजें (तेज धमाके जैसे) सुनाई देने लगीं। इसके बाद दवा बदली गई और उसे 3 एमजी रिवास्टिगमिन (Rivastigmine) दी गई। इससे उसके लक्षण काफी हद तक कंट्रोल हो गए। इसके बाद वो अपनी जिंगदी साधारण तरीके से जीने लगी।
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Source-
- https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736%2814%2961690-1/fulltext
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