जसवां परागपुर, साहिल ठाकुर। ग्राम पंचायतों में मामले की सुनवाई अदालत के समान होती है। गवाहों के बयानों को न्यायपीठ द्वारा नियम 51 के अनुसार लेखबद्ध किए जाने का प्रावधान है। सर्वप्रथम अभियोगी पक्ष के गवाहों के बयान तथा बाद में अभियुक्त पक्ष के गवाहों के बयान लिए जाएंगे। अभियुक्त को छोड़कर किसी व्यक्ति का परीक्षण करने से पूर्व शपथ दिलवाई जाती है। प्रत्येक पक्ष दूसरे पक्ष से जिरह कर सकते हैं। इस कार्यवाही के बाद धर्मासन दोनों पक्ष को बाहर भेजेगा और विचार-विमर्श करके सर्वसम्मति से निर्णय देगा। यदि मतभेद हो जाए तो निर्णय बहुमत से होगा। निर्णय मिसल पर लेख करके धर्मासन उस पर हस्ताक्षर करेगा और दोनों पक्षों को भीतर बुलाकर निर्णय सुनाया जाएगा।

धर्मासन प्रत्येक संभव तरीके से सच्चाई जानने की कोशिश करता है। सच्चाई जानने के लिए कुछ भी तय नहीं किया जा सकता है, यानी कोई ऐसा बना बनाया फार्मूला नहीं है अलग-अलग स्थिति में अलग-अलग ढंग अपनाए जा सकते हैं। सच्चाई जानने के लिए ग्राम पंचायत मौका-ए- वारदात पर भी जा सकती है। पंचायत उन सबूतों पर गौर करेगी, जो दोनों पक्षों द्वारा पेश किए जाते हैं। पंचायत इसके साथ और भी सबूत मांग सकती है। सारे केस की कानूनी रूप से जांच पड़ताल करने के बाद पंचायत अपना फैसला लिखित रूप में पारित करेगी। पंचायत अपने द्वारा पारित फैसले को बदल नहीं सकती है परंतु कोई लिखने में हुई भूल का सुधार किया जा सकता है।

पंचायत को यह भी अधिकार है कि अगर वह उचित समझे तो लागत सहित भी अपने फैसले को पारित कर सकती है, यानी वह दोषी पाई गई पार्टी को इस कार्यवाही का पूरा खर्च देने के लिए कह सकती है। परंतु यहां यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि पंचायत की शक्तियां उसी सीमा तक हैं जो हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के अनुसार उसे दी गई हैं।

हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम धारा 30 (2) अनुसार न्याय पंचायत की किसी भी कार्यवाही या सुनवाई के लिए कोरम या गणपूर्ति का होना अतिआवश्यक है। अगर कोरम न हो तो मामले की सुनवाई करना या फैसला देना गैरकानूनी होता है।

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Edited By: Rajesh Kumar Sharma