कभी पानी को तरसते थे, अब जल संरक्षण की बनी मिसाल...हिमाचल के इस गांव ने प्राकृतिक जलस्रोतों को संवारकर बुझाई प्यास
हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले की सिकांदर पंचायत ने जल संरक्षण के क्षेत्र में एक मिसाल कायम किया है। कभी पानी की किल्लत से जूझने वाले इस क्षेत्र ने प्राकृतिक जलस्रोतों को संवारकर अपनी प्यास बुझाई है। पंचायत ने खातरियां कुएं और बावड़ियों का निर्माण कराकर वर्षा जल का संग्रहण किया है। इस सफल पहल के लिए पंचायत को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जाएगा।

रणवीर ठाकुर, हमीरपुर। इच्छाशक्ति और हालातों को बदलने का जज्बा हो तो क्या कुछ नहीं हो सकता है। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के बमसन क्षेत्र में कभी पानी की बहुत समस्या थी। एक समय था, जब यहां लोग अपनी बेटियों की शादी इसलिए नहीं करना चाहते थे, क्योंकि यहां पर पानी का बहुत संकट रहता था।
इसी क्षेत्र में पड़ने वाली सिकांदर पंचायत ने इन हालातों को बदलने की ठानी। पंचायत ने यहां गांवों की तकदीर बदलने के लिए जल संकट का निदान करने को मुख्य प्राथमिकता बनाया और ठोस पहल की। पहाड़ी क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्त्रोतों जैसे खातरियां, कुंए व बावड़ियों को संरक्षित करने उन्हें संवारने का काम शुरू हुआ।
इस मुहिम को जलजीवन मिशन के तहत सरकार का साथ भी मिला है। नए नल कनेक्शन दिए गए व पाइपलाइन बिछाई गईं। इसके अलावा यहां पंचायत ने मनरेगा की मदद से कार्य कराया और साथ स्थानीय लोगों ने भी योगदान किया, जिससे 100 से ज्यादा खातरियां तैयार की गईं। वर्षा के जल को संग्रहित करने के लिए अलग से टैंक तैयार किए गए। इस मुहिम का असर अब गांव पर दिखता है। यहां पेयजल की समस्या दूर हो गई है। जल संरक्षण के लिए पंचायत ने जो प्रयास किए, वह अब दूसरों के लिए मिसाल बन रहे हैं।
जल संकट दूर करने में खातरियां बनी सहारा
खातरी पहाड़ी के निचले हिस्से में पथरीली जमीन (चट्टान) को खोदकर 10 बाई 12 फीट का गड्ढा कर बनाई जाती है। खातरी का मुंह काफी संकरा रखा जाता है और फिर उसे ढक दिया जाता है, ताकि उसमें गंदगी न जा सके। खातरी के आकार के हिसाब से इसमें 30,000-50,000 लीटर तक पानी एकत्रित किया जा सकता है। 50 से 75 हजार रुपये की लागत से इसे बनाया जा सकता है।
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खातरियां सैंकड़ों साल पुरानी व्यवस्था है। इनमें बारिश के पानी को इकट्ठा किया जाता है। फिर उस जमा किए हुए पानी को गर्मियों में पीने से लेकर दूसरे काम में इस्तेमाल किया जाता है। हमीरपुर के साथ लगते मंडी जिले के संधोल, टीहरा, गद्दीधार, समौर, सकलाना व कमलाह पंचायतों में भी 250 से ज्यादा परिवार खातरियों का पानी पीते हैं। यही खातरियां अब जल संकट को दूर करने में सबसे कारगर भूमिका निभा रही हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले हर परिवार की अलग-अलग खातरियां होती थीं। पूर्व के समय जब फ्रिज नहीं थे तो मेहमान आने पर तुरंत खातरी से ठंडा पानी लाकर पिलाया जाता था।
सिकांदर पंचायत को राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित
हमीरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूरी पर स्थित सिकांदर पंचायत का गठन वर्ष 1973 में हुआ। 11 दिसंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पंचायत को जल संरक्षण को लेकर किए गए उसके कार्यों के लिए दिल्ली में सम्मानित करेंगी।
पंचायत को बेहतर कार्य के लिए 75 लाख रुपये का पुरस्कार मिलेगा। पेयजल की समस्या को दूर करने के इस पंचायत के माडल को छह नवंबर 2024 को शिमला में राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने भी पुरस्कृत किया है। सिकांदर पंचायत में पांच वार्ड हैं। इसकी जनसंख्या 1,673 है।
सिकांदर पंचायत के प्रधान पवन शर्मा ने बताया कि पंचायत ने पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए सरकारी मदद और लोगों की भागीदारी के साथ खादरियां, कुंए और बावड़ियों का निर्माण कराया है। राष्ट्रपति के द्वारा मिलने वाली 75 लाख रुपये की पुरस्कार राशि को पंचायत में विकास कार्यों पर ही खर्च किया जाएगा।
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