अर्थ ने दिखाया था समाज को आईना, 43 साल बाद भी मस्ट वॉच बनी हुई है महेश भट्ट की फिल्म
बतौर फिल्ममेकर महेश भट्ट का कद हिंदी सिनेमा में काफी बड़ा है। इसकी बड़ा कारण अर्थ जैसी शानदार फिल्में रही हैं। आज हम आपको अर्थ के बारे में बताने जा रहे हैं, जो 43 साल बाद भी मस्ट वॉच मानी जाती है।

शबाना आजमी स्टारर फिल्म अर्थ (फोटो क्रेडिट- फेसबुक)
एंटरटेनमेंट डेस्क, मुंबई। शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, और कुलभूषण खरबंदा अभिनीत ‘अर्थ’ फिल्ममेकर महेश भट्ट की सेमी-आटोबायोग्राफिकल फिल्म थी। यह अभिनेत्री परवीन बाबी के साथ उनके विवाहेतर संबंधों पर आधारित थी। पुरुषवादी सिनेमा के दौर में महिलाओं के नजरिए से बनी ‘अर्थ’ पर स्मिता श्रीवास्तव का आलेख...
43 साल पहले तीन दिसंबर, 1982 को प्रदर्शित हुई फिल्म ‘अर्थ’ में एक दृश्य है जब फिल्म स्टार कविता (स्मिता पाटिल), पूजा (शबाना आजमी) से कहती है कि मैं इंदर (कुलभूषण खरबंदा) को चाहती थी… तुम्हारे पति को नहीं…। मैं अपना घर बसाना चाहती थी, तुम्हारा घर उजाड़ना नहीं चाहती थी। जिस पर पूजा जवाब देती है कि मेरा घर था ही नहीं इसलिए तुमने कुछ नहीं उजाड़ा।
अर्थ की कहानी
फिल्म ने उस कड़वी सच्चाई को दिखाया था कि विवाहेतर संबंध शुरुआत में लुभावने लग सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे यह रिश्ता आगे बढ़ता है, असुरक्षा की भावना, सामाजिक मान्यता पाने की चाहत, बिगड़ती मानसिक हालत कहीं न कहीं तनाव बढ़ाते हैं। फिर यह रिश्ता सिर्फ दर्द ही देता है। वास्तव में यह फिल्म पूजा की अपनी पहचान तलाशने की यात्रा पर है, जब उसका पति उसे दूसरी महिला के लिए छोड़ देता है।
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यह फिल्म उस वक्त आई थी, जब ‘डिस्को डांसर’ और ‘मर्द’ जैसी फिल्मों की कहानी पुरुषों के नजरिए से दिखाई जा रही थी, लेकिन ‘अर्थ’ की कहानी महिलाओं के नजरिए से कही गई थी। यह भले ही मार्केट के ढांचे में फिट न बैठती हो, लेकिन दर्शकों को पसंद आई थी। यह कोई राज नहीं है कि लेखक-निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी जिंदगी की कुछ वास्तविकताओं को काल्पनिकता के साथ जोड़कर ‘अर्थ’ बनाई थी।
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इसमें त्यागी गई पत्नी पूजा, मनचाही औरत कविता और टूटे हुए आदमी इंदर जैसे पात्रों के जरिए इंसानों की कमियों, पुरुषों के दोहरे मापदंड और रिश्तों की अस्थिरता की पड़ताल बारीकी से की गई थी। यह फिल्म महेश और उस समय शीर्ष पर रहीं अभिनेत्री परवीन बाबी के साथ उनके विवाहेतर संबंधों पर आधारित आत्मकथात्मक फिल्म थी। इन संबंधों के चलते महेश द्वारा पहली पत्नी किरण भट्ट उर्फ लोरेन ब्राइट को छोड़ने की आत्मग्लानि इस कहानी का आधार थी।
महेश भट्ट की क्रांतिकारी फिल्म
हिंदी फिल्मों में महिलाओं के चित्रण के संदर्भ में इसे क्रांतिकारी फिल्म माना जाता है। ‘अर्थ’ को बनाने के पीछे की कहानी दिलचस्प है। ‘अर्थ’ से पहले महेश भट्ट ने चार फिल्में ‘मंजिलें और भी हैं’(1974), ‘विश्वासघात’ (1977), ‘नया दौर’ (1978) और ‘लहू के दो रंग’ (1979) बनाईं, लेकिन वह बाक्स आफिस पर अपना प्रभाव छोड़ पाने में नाकाम रहीं। तब उन्हें अपनी उथल-पुथल भरी निजी जिंदगी को परदे पर उतारने का विचार आया। यहीं से ‘अर्थ’ को बनाने की शुरुआत हुई। फिल्म में कई दृश्य महेश की जिंदगी से जुड़े भी रहे।

उदाहरण के तौर पर जब पूजा को पता चलता है कि इंदर उसे कविता के लिए छोड़ना चाहता है, तो वह उससे आग्रह करती है कि वह उसे न छोड़े। साथ ही, वह सीन जब सोए हुए इंदर को कविता जगाने की कोशिश करती है तो वह पूजा का नाम लेता है। किस्सा यह भी है कि जब यह फिल्म बन रही थी तब स्मिता पाटिल और राज बब्बर असल जिंदगी में रिश्ते में थे। राज बब्बर शादीशुदा थे।
एक इंटरव्यू में महेश ने कहा भी था कि स्क्रीन पर दूसरी औरत का रोल करने से स्मिता पर असर पड़ रहा था। उन्होंने महेश से कहा था कि रात को तो मुझे ये दोहरी जिंदगी जीनी ही पड़ती है। अब दिन में भी यही शूट करना पड़ रहा है। मैं कहीं पागल न हो जाऊं। तुम अपने अतीत से लड़ रहे हो और मैं अपने सवालों से।
मैसेज देती है अर्थ
फिल्म के अंत में कविता की असुरक्षा और मानसिक रूप से अस्थिर प्रकृति अंततः इंदर को उससे दूर कर देती है। इंदर पश्चाताप के साथ पूजा के पास वापस आता है, लेकिन पूजा उसे अस्वीकार कर देती है, क्योंकि तब तक वह मजबूत और आत्मनिर्भर बन चुकी होती है और उसे एहसास होता है कि अपनी खुशी के लिए उसे किसी पुरुष की जरूरत नहीं है।
रिश्तों के जटिल पहलुओं को गहराई से छूने वाली इस फिल्म में परत दर परत महिलाओं के जज्बातों को बहुत बारीकी से दर्शाया गया। रिश्तों के भंवर में जिंदगी का अर्थ खोजती यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस वक्त थी!

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